सलाह : कोविड माहौल से त्रस्‍त बच्‍चों को मैदान में खेलने की छूट दें लेकिन…

-प्रो प्रभात सिठोले ने कहा कि अभिभावक बच्‍चों को कोविड-19 से बचाव के बारे में जरूर बतायें

-मेडिकल एथिक्‍स पर आयोजित कार्यक्रमों की शृंखला में संजय गांधी पीजीआई में कार्यक्रम का आयोजन

सेहत टाइम्‍स ब्‍यूरो

लखनऊ। बाल मनोविज्ञान के क्षेत्र में महारत रखने करने वाले केजीएमयू के मनोचिकित्सा विभाग के भूतपूर्व विभागाध्यक्ष प्रो प्रभात सिठोले ने कोविड-19 महामारी के परिपेक्ष्य में बच्चों में होने वाले मनोवैज्ञानिक समस्याओं पर अपने विचार रखते हुए कहा है कि बच्चों को कुछ प्रतिबंधों के साथ मैदान में जाकर खेलने की छूट देनी चाहिए।

प्रो सिठोले ने संजय गांधी पीजीआई द्वारा मेडिकल एथिक्‍स पर आयोजित कार्यक्रमों की शृंखला में “कोविड 19 के समय में बच्चों के प्रबंधन में आने वाली चुनौतियों और नीतिपरक मुददों को समझना” विषय पर वीडियो कॉन्‍फ्रेंसिंग के जरिये अपने सम्‍बोधन में आगे कहा कि इस समय भारत के बच्चों के मनोवैज्ञानिक समस्याएं दिखाई नहीं पड़ रही हैं, किंतु स्कूल के बंद होने, घरों में बंद हो जाने और किसी प्रकार की शारीरिक गतिविधियों जैसे खेलकूद के न होने से उनमें चिंता अवश्य दिखाई पड़ रही है। ऐसे में यह अत्यंत आवश्यक है कि अभिभावक उन्हें कोविड-19 और इससे बचाव के विषय में अवश्य बताएं। ज्ञात हो उत्तर प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा और संसदीय मामलों के मंत्री सुरेश खन्ना के निर्देशों के अनुसार संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान द्वारा मेडिकल एथिक्‍स पर कार्यक्रमों की शृंखला का आयोजन किया जा रहा है।

इससे पूर्व कार्यक्रम की शुरुआत में संस्थान के निदेशक प्रोफ़ेसर आर के धीमन ने वक्ताओं का स्वागत किया। उन्‍होंने कहा कि कोविड-19 महामारी ने पूरे विश्व के समक्ष अभूतपूर्व नीतिपरक चुनौतियां प्रस्तुत की। यह चुनौतियां न केवल स्वास्थ्य कर्मियों के लिए थी,  बल्कि संपूर्ण विश्व के सभी प्रभावित देशों के हर व्यक्ति के लिए थी। बच्चे भी इस महामारी से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए।

इस विषय में बच्चों ने भी अपने विचार रखे। कक्षा 12 की छात्रा कीया सिंह और इंजीनियरिंग तीसरे वर्ष के छात्र मिहिर सुनील दबड़गांव ने कहा कि आरंभ में लॉकडाउन  बहुत ही आनंदित करने वाला था, लेकिन जैसे-जैसे छुट्टियां बढ़ती गई, ऑनलाइन क्लासेस उनके लिए बहुत कष्टदायी बन गया। ऑनलाइन टीचिंग  में लैब क्लासेस नहीं थी, और न ही सहमित्रों व सहपाठियों के साथ पढ़ने का आनंद था। इन विद्यार्थियों ने सभी से अपील की कि वे कोविड-19 महामारी को शीघ्रता से दूर करने के लिए सभी तरह की सावधानियां बरतें।

संस्थान के पीडियाटिक गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग की प्रोफेसर डॉ अंशु श्रीवास्तव व एंडोक्राइनोलॉजी विभाग की प्रोफेसर डॉ विजयलक्ष्मी भाटिया ने कोविड-19 महामारी के समय बच्चों में होने वाली नॉन कोविड  बीमारियों के प्रबंधन में आने वाली चुनौतियों की चर्चा की। डॉ अंशू ने कहा कि इस समय ऑनलाइन कंसल्टेशन समय की मांग है, किंतु ग्रामीण क्षेत्रों में और दूरदराज क्षेत्रों में रिपोर्ट पर विश्वसनीयता एक बड़ा मुद्दा है, क्योंकि इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं उतनी सुदृढ नहीं हैं जिनकी नगरीय क्षेत्रों में है। साथ ही बच्चों में होने वाले पेट की दर्द मे यह तय करना मुश्किल होता है कि यह किसी बीमारी की वजह से है अथवा कोविड 19 के समय में अकेलेपन व चिंता की वजह से। बच्चों के उपचार के संबंध में उन्होंने त्वरित उपचार की बात कही। डॉ विजयलक्ष्‍मी भाटिया  ने कहा कि डायबिटीज और हार्मोनल डिस्‍ऑर्डर  से पीड़ित बच्चों को नियमित रूप से उपचार की आवश्यकता होती है, किंतु अस्पताल में प्रवेश करने में भय के कारण इनकी संख्या में बहुत कमी आयी है। हीमैटौलाजी विभाग के डॉ अंशुल गुप्ता ने कोविड-19 के समय में कैंसर से ग्रस्त बच्चों की चिकित्सा की नैतिक जिम्मेदारी और चुनौतियों के चर्चा की। एंडोक्राइनोलॉजी विभाग की प्रो प्रीति दबडगंव ने कोविड पॉजिटिव बच्चों के चिकित्सा प्रबंधन में आने वाली चुनौतियों की चर्चा की। उन्होंने कोविड पॉजिटिव बच्चों के लिए एक अलग वार्ड की मांग पर जोर दिया।

संस्थान की बायोएथिक्स सेल की इंचार्ज प्रोफेसर विनीता अग्रवाल ने सत्र का संचालन किया। उत्तर प्रदेश राज्य के 52 मेडिकल कॉलेज और  संस्थान के स्टाफ भी वीडियो कॉन्‍फ्रेंसिंग  द्वारा इससे जुड़े।