सरकारी से लेकर प्राइवेट नर्सिंग होम तक हर जगह सर्जरी कर रहे हैं आयुर्वेद डॉक्‍टर, फि‍र विरोध क्‍यों ?

-इस समय भी जो सर्जरी कर रहे हैं उन्‍हीं को सरकार ने मान्‍यता दी

-विश्‍व आयुर्वेद परिषद पश्चिम बंगाल के कन्‍वीनर डॉ पवन कुमार शर्मा ने कहा, आईएमए का विरोध गलत

डॉ पवन कुमार शर्मा

सेहत टाइम्‍स ब्‍यूरो

लखनऊ। बड़ी संख्‍या में सरकारी हॉस्पिटल, प्राइवेट नर्सिंग होम हैं जहां आयुर्वेद डॉक्‍टर लम्‍बे समय से तैनात हैं,  शल्‍य चिकित्‍सा कर रहे हैं, लम्‍बे समय से चिकित्‍सा कर रहे हैं, कुछ नया नहीं होने जा रहा है, सरकार द्वारा उन्‍हें अब सिर्फ कानूनी रूप दिया गया है, इस पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा आखिर इतना विरोध क्‍यों किया जा रहा है, यह समझ में नहीं आ रहा है।  

यह कहना है प्रेसिडेंट इंडिपेंडेंट रिसर्च एथिक्स सोसाइटी, वाइस प्रेसिडेंट आयुर्वेदिक ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया वेस्ट बंगाल स्टेट व कन्वीनर, विश्व आयुर्वेद परिषद वेस्ट बंगाल डॉ पवन कुमार शर्मा का। एक विशेष वार्ता में उन्‍होंने कहा कि कि सुश्रुत की सर्जरी का डॉक्‍यूमेंटल प्रूफ है। हालांकि आयुर्वेद विधा तो इससे पूर्व देवताओं के समय भी थी देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमार थे। लेकिन चूंकि डॉक्‍यूमेंट सुश्रुत जी के समय के हैं इसलिए उन्‍हीं को फादर ऑफ सर्जरी माना जाता है। उन्‍होंने कहा कि एक्‍सीडेंट और युद्ध तो हर युग में होते रहे हैं, तो आखिर तब इनका इलाज कौन करता था, ऐलोपैथिक सर्जरी तो बाद में आयी है।

डॉ पवन कहते हैं कि आजकल कि अगर बात करें तो अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में ये आयुर्वेद के ही तो डॉक्‍टर हैं। इसी प्रकार नर्सिंग होम में भी आयुर्वेद डॉक्‍टर लगे हुए हैं, सर्जरी कर रहे हैं, और अच्‍छी सर्जरी कर रहे हैं।   उन्‍होंने कहा कि आज इस कोरोना काल में भारत में सबसे कम मृत्‍यु दर है, उसकी बड़ी वजह यह आयुर्वेद ही है, क्‍योंकि मसाले जो घर-घर में खाये जाते हैं, ये भी आयुर्वेद की ही देन हैं, आयुर्वेद एक पद्धति ही नहीं बल्कि पूरी जीवन शैली है।

मानवता के हित में जो जहां जरूरी हो, वहां इस्‍तेमाल करें  

नीमा शामली की ओर से भी अपील की गयी है कि अधिकांश नर्सिंग होम, अस्पतालों में आयुष चिकित्सक ही इमरजेंसी सेवाएं, आईसीयू, एनआईसीयू आदि में एक लंबे समय से सेवाएं दे रहे हैं। इसलिये सभी से निवेदन है कि मिक्‍सोपैथी, खिचड़ी, जुगाड़ू आदि शब्दों का इस्तेमाल करके अपना ही उपहास न बनवाएं। दोनों पद्धतियां अलग-अलग सिद्धांतों पर आधारित हैं व मानवता के हित में जहां जो सफल है उसका प्रयोग करना चाहिये।

आयुर्वेद में एमएस की डिग्री की सीट्स पूरे भारत भर में 150-200 के आसपास ही होंगी, जो कुल लगभग 9 वर्ष (बीएएमएस, एमएस (आयु.) के अध्ययन व प्रशिक्षण के बाद ही मिलती है। केंद्र सरकार ने केवल उन्हें ही गजट नोटिफिकेशन द्वारा गिनती की शल्य चिकित्सा के लिए अधिकृत किया है, जो वह पहले से कर रहे हैं। उसमें से अधिकांश लोग  विभिन्न सरकारी संस्थाओं में सेवाएं देते हैं।

अभी भी पूरे भारतवर्ष में एमएस (आयु.) की डिग्री वाले लोग बस कुछ हजार हैं तथा भविष्य में वर्ष भर में मुश्किल से 100 लोग ऐसे होंगे जो इन 58 प्रकार की सर्जरी करेंगे अधिकांश लोग सामान्यतः, प्रमुखता से एनोरेक्‍टल सर्जरी करते हैं।

अपील में कहा गया है कि जो लोग स्वयं भ्रमित होकर दूसरों को भ्रमित करते हुए हड़ताल आदि कर रहे हैं उपहास का पात्र न बनें, सर्जरी का अधिकार केवल उच्च शिक्षित व प्रशिक्षित एमएस (आयु.) को है, सामान्य बीएएमएस को नहीं। अगर कोई उन गिनती के लोगों को लेकर आशंकित है तो स्वयं अपना आकलन करें।