चिकित्‍सा क्षेत्र में क्रांति लाने वाली खबर, शरीर की एक कोशिका से दोबारा बन सकेंगे आवश्‍यक अंग

 

इन्‍ड्यूस्‍ड प्‍लूरीपोटेन्‍ट विधि खोजने वाले नोबल पुरस्‍कार विजेता जापानी वैज्ञानिक के साथ काम करने वाले डॉ रजनीश वर्मा ने दी महत्‍वपूर्ण जानकारियां, केजीएमयू में होगा इस दिशा में कार्य

 

लखनऊ। अभी तक आपने शरीर के लिए आवश्‍यक नकली अंगों को बनवाने के बारे में तो सुना होगा, प्‍लास्टिक सर्जरी के जरिये एक जगह की खाल दूसरी जगह लगाकर उस अंग की रिपेयरिंग के बारे में सुना होगा लेकिन अगर आपको यह पता चले कि अंग का रीप्‍लेसमेंट करके दूसरा अंग हूबहू बन सकता है वह भी आपकी ही कोशिका से तैयार करके, तो निश्चित रूप से आप चौंक जायेंगे। लेकिन यह सच है। ऐसा संभव हुआ है जापान के महान वैज्ञानिक सीनिया यामाहाका की लगन और सच्‍ची साधना से। सीनिया यामाहाका को वर्ष 2012 में इस कार्य के लिए नोबल पुरस्‍कार से सम्‍मानित भी किया जा चुका है।

 

आपको बता दें कि सोमवार को किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी पहुंचे जापान के क्‍योटो विश्‍वविद्यालय के सेंटर फॉर आईपीएस रिसर्च एंड एप्‍लीकेशन (सीआईआरए) में प्रोग्राम स्‍पेसिफि‍क रिसर्चर डॉ रजनीश वर्मा का कलाम सेंटर में आईपीएससी टेक्‍नोलॉजी मूविंग फ्रॉम लैब टू क्‍लीनिकल एपलीकेशन्‍स विषय पर एक अतिथि व्‍याख्‍यान आयोजित किया गया था। इसका आयोजन केजीएमयू के क्‍लीनिकल हिमैटोलॉजी विभाग द्वारा किया गया।

 

इस बारे में क्‍लीनिकल हिमैटोलॉजी विभाग के विभागाध्‍यक्ष डॉ एके त्रिपाठी ने बताया कि डॉ रजनीश महान वैज्ञानिक सीनिया यामाहाका की लैब में कार्यरत हैं। डॉ त्रिपाठी ने इस जादूई तकनीक के इतिहास के बारे में बताया कि मनुष्‍य में शरीर में खरबों कोशिकाएं होती हैं। हर कोशिका अपने आप में पूर्ण है यानी ब्रह्मा, विष्‍णु, महेश है। कहने का तात्‍पर्य यह है कि प्रत्‍येक कोशिका में यह ताकत होती है कि वह अंग का निर्माण(ब्रह्मा जी का कार्य) उसकी कार्यक्षमता बनाये रखना (विष्‍णु जी का कार्य) तथा कोशिका का निर्वाण(शिव जी का कार्य) करती है। और जब कोई कोशिका अगर नष्‍ट नहीं होती है तो कैंसर बन जाती है। उन्‍होंने बताया कि प्रत्‍येक कोशिका अपने आप में पूर्ण है इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि गर्भ में जब शिशु आता है तो दो कोशिकाएं ही तो होती हैं एक पुरुष की और एक स्‍त्री की। लेकिन उसके बाद इन्‍हीं दो कोशिकाओं से दर्जनों, सैकड़ों, हजारों, लाखों, अरबों, खरबों कोशिकायें बनती जाती हैं, और साथ ही इनसे बनते जाते हैं शरीर के अलग-अलग अंग और फि‍र तैयार हो जाता है पूरा शरीर।

 

प्रो त्रिपाठी ने बताया कि महत्‍वपूर्ण बात यह थी कि इन कोशिकाओं का परिवर्तन अंगों में कैसे और किस तरह से होता है शुरुआत कहां से होती है, इसी को जानने के लिए सीनिया यामाहाका को सत्‍य का अहसास हुआ और अदृश्‍य शक्तियों को खोज निकाला। इन्‍होंने इस सत्‍य को जागृत किया और यह समझा कि कोशिका से किस तरह से मनचाहा अंग बनवाया जा सकता है। प्रो त्रिपाठी ने बताया कि उन्‍होंने चमड़ी की कोशिका निकाली उस कोशिका में कुछ ऐसे केमिकल डाले तो उसमें वह क्षमता आ गयी कि वह अपनी पहली वाली स्थिति में यानी सूक्ष्‍म शरीर (शुरुआती बचपन रूप वाली) में पहुंच गयी तो वह चमड़ी वाली कोशिका चमड़ी बनाना भूल गया और वह अंग बनाने लगा, जो आप उससे बनवाना चाहते हैं। इस खोज को इन्‍ड्यूस्‍ड प्‍लूरीपोटेन्‍ट (सर्वक्षमता जागृत करना) कहा गया। यह रिसर्च सीनिया यामाहाका ने 2006-07 में की। बाद में इसी रिसर्च को लेकर 2012 में इन्‍हें नोबल पुरस्‍कार मिला। प्रो त्रिपाठी ने बताया कि इन्‍हीं की लैब में काम करने वाले डॉ वर्मा के बारे में पता चला कि वह लखनऊ आये हुए हैं तो उनका सोमवार को केजीएमयू में अतिथि व्‍याख्‍यान रखा गया।

 

डॉ वर्मा ने अपने व्‍याख्‍यान में बताया की उपरोक्त तकनीक से हम शरीर के किसी भी कोशिका को स्टेम सेल में बदल सकते है और उस सेल से हम शरीर के किसी भी अंग को बना सकते है। इस तकनीक से  के प्रयोग से बाहर से स्टेम सेल लेने की आवश्यकता नही पड़ती है। इस तकनीक से माध्यम से शरीर की कोशिकाओं को उनके बचपन में ले जाते है और फिर उससे जैसा चाहें वैसा काम लिया जा सकता है। इस तकनीक का हार्ट, ब्रेन, ब्लड कैंसर, कैंसर आदि विभिन्न प्रकार के रोगो एवं जेनेटिक रोगो में के उपचार में प्रयोग किया जा सकता है। यह तकनीक किसी अंग के खराब होने जैसे लिवर सिरोसिस आदि में हो जाने पर भी उस अंग की कोशिकाओं को फिर से ठीक कर सकता है। इसे रिजनरेशन मेडिसिन कहते है। इस तकनीक के माध्यम से कृत्रिम ब्लड भी बनाया जा सकता है, जिसे Bio-reactore  कहते है। अभी इस तकनीक से प्लेटलेट्स बनाने का प्रयोग चल रहा है।

 

व्याख्यान सुनकर कुलपति प्रो एमएलबी भट्ट ने तकनीक की सराहना करते हुए कहा कि इस तकनीक को चिकित्सा विश्वविद्यालय में लाने की सम्भावनाओं को तलाशा जाएगा। प्रो0 त्रिपाठी,  विभाग द्वारा कहा गया की विभाग में Sickle cell, Thalassemia के मरीजो पर यह तकनीक काफी कारगर होगी। इसलिए विभाग में  इस तकनीक के माध्यम से उपचार की सम्भावनाओं पर कार्य किया जाएगा।