कोरोना में सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण है बीमारी का पहला दिन जानना और डॉक्‍टर को बताना

-लक्षण आने वाले दिन को ही मानें पहला दिन, यही जानकारी चिकित्‍सक को भी दें

-पहला दिन पहचानने में चूक होने का मतलब है सही दवा का चुनाव न हो पाना

-संजय गांधी पीजीआई के इमरजेंसी मेडिसिन के डॉ ओपी संजीव ने दी अहम जानकारी

डॉ ओपी संजीव

धर्मेन्‍द्र सक्‍सेना

लखनऊ। कोरोना की मौजूदा दूसरी लहर में संक्रमित होने वालों लोगों को सबसे ज्‍यादा खास बात यह ध्‍यान देनी है कि उनके अंदर कोरोना के लक्षण कब से आना शुरू हुए, इसका महत्‍व मरीज के इलाज में बहुत है लक्षण के बाद के पहले हफ्ते, दूसरे हफ्ते, तीसरे हफ्ते होने वाली  जटिलतायें अलग-अलग होती हैं, इसीलिए इसमें दी जाने वाली दवायें भी अलग-अलग हैं, साथ ही कौन सी जांच कब करानी है इसका निर्धारण भी अलग-अलग है। विशेष रूप से सही दिशा में इलाज के लिए दूसरा हफ्ता सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण होता है।

यह जानकारी संजय गांधी पीजीआई के इमरजेंसी मेडिसिन विभाग के असिस्‍टेंट प्रोफेसर डॉ ओपी संजीव ने देते हुए बताया कि मैं स्‍वयं कोविड का शिकार हो चुका हूं, तथा होम आईसोलेशन में रहने वाले करीब 150 मरीजों के इलाज को मॉनीटर किया जिसमें एक बात यह सामने आयी है कि मरीज की बीमारी का पहला दिन सही तरह से पहचानना बहुत महत्‍वपूर्ण है।

डॉ संजीव बताते ने बताया कि कोरोना बीमारी को अगर चार भागों में बांटें तो पहले भाग के तहत शुरुआत होती है मरीज की नाक या मुंह के रास्‍ते से कोरोना वायरस के प्रवेश से। वायरस जब शरीर में प्रवेश कर जाता है फि‍र वहां वह अपनी संख्‍या बढ़ाना शुरू करता है, अपनी संख्‍या बढ़ाने में वायरस को 3 से 5 दिन का समय लगता है। यह अवधि इनकुबेशन पीरियड, या एसिम्‍प्‍टोमेटिक स्थिति कहलाती है।

इसके बाद दूसरे भाग में मरीज के अंदर लक्षण आने शुरू होते हैं, यानी अब सिम्‍प्‍टोमेटिक पीरियड शुरू हो जाता है। एक सप्‍ताह की इस अवधि वाले दूसरे भाग में बुखार, गले में खराश, तेज बदन दर्द, डायरिया, उल्‍टी जैसे लक्षण जब आना शुरू हों तो उस तारीख को मरीज को नोट कर लेना चाहिये। यही पहला दिन माना जाता है। यह सिलसिला करीब एक सप्‍ताह चलता है और ये लक्षण समाप्‍त होने लगते हैं, और रोगी ठीक हो जाता है।

डॉ संजीव बताते हैं कि अगर मरीज ठीक नहीं हुआ तो अब शुरू होने वाला सप्‍ताह यानी लक्षण दिखने के बाद से 8 से 14वें दिन तक का यह समय पल्‍मोनरी फेज कहलाता है, क्‍योंकि अगर लक्षण समाप्‍त नहीं हुए, या बुखार दोबारा आ गया या दूसरे लक्षण दोबारा उभर आये तो व्‍यक्ति को सावधान हो जाना चाहिये, क्‍योंकि इसका अर्थ है कि अब फेफड़े में न्‍यूमोनिया हो सकता है। डॉ संजीव बताते हैं कि यही फेज बहुत महत्‍वपूर्ण होता है और इस पर बारीकी से नजर रखना जरूरी है। इस फेज में ऑक्‍सीमीटर से दिनभर में 4-5 बार ऑक्‍सीजन नाप लेना चाहिये, दिन भर में तीन से चार बार बुखार नाप लें। इसके साथ ही छह मिनट चल कर देख लें कि इससे ऑक्‍सीजन लेवल गिर तो नहीं रहा है। अगर ऑक्‍सीजन लेवल तीन प्रतिशत से ज्‍यादा गिर गया हो तो चिकित्‍सक से सम्‍पर्क करना चाहिये।

उन्‍होंने बताया कि इसके बाद तीसरा सप्‍ताह जो होगा वह रिकवरी वीक होगा या लेट पल्‍मोनरी वीक होगा। इसमें भी जो आप मेजरमेंट ऑक्‍सीजन का, बुखार का करते रहे हैं उसे जारी रखना चाहिये, अगर मेजरमेंट के परिणाम सही आ रहे हैं, मुंह का स्‍वाद जो चला गया था वापस आने लगा है, बाकी सुधार भी हो रहे हैं इसका अर्थ है कि रिकवरी हो रही है और अगर बुखार, ऑक्‍सीजन लेवल के परिणाम सही नहीं आ रहे हैं तो इसका अर्थ है कि अभी आगे के इलाज की जरूरत है, जो अस्‍पताल में भर्ती होकर ही होगा।