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गर्भावस्‍था में थैलेसेमिया की जांच जल्‍द शुरू होगी केजीएमयू में

वार्षिक थैलेसेमिया अपडेट 2019 का आयोजन

सेहत टाइम्‍स ब्‍यूरो

लखनऊ। गर्भावस्‍था के दौरान शिशु की थैलेसेमिया की जांच जल्‍दी ही केजीएमयू स्थित क्‍वीनमैरी हॉस्पिटल में शुरू होगी। अभी तक थैलेसेमिया से ग्रस्‍त बच्‍चों का उपचार बाल रोग विभाग में किया जा  रहा है। गर्भ में शिशु की थैलेसेमिया जांच होने से इस रोग के उन्‍मूलन में काफी मदद मिलेगी।

यह जानकारी आज वार्षिक थैलेसेमिया अपडेट में आयोजन सचिव डॉ नीतू निगम ने दी। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के कलाम सेंटर में सेंटर फॉर एडवांस रिसर्च विभाग (सी0एफ0ए0आर, साइटोजेनेटिक्स लैब), बाल चिकित्सा विभाग, पैथोलॉजी विभाग, प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग, थैलेसेमिक्स इंडिया सोसाइटी, लखनऊ के सहयोग से सी0एफ0ए0आर0 विभाग ने वार्षिक थैलेसेमिया अपडेट 2019 का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन चिकित्सा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 एम0एल0बी0 भट्ट ने किया। इस अवसर पर प्रो0 अब्बास अली मेहदी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

थैलेसे‍मिया के उपचार और निदान के लिए अधिक शोध की जरूरत

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए चिकित्सा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 एम0एल0बी0 भट्ट ने कहा कि थैलेसेमिया रोग से पीड़ित मरीज पूरे विश्वभर में है और लगभग 28 मिलियन लोग इस बीमारी से पीड़ित है और इसकी रोकथाम के लिए नेशनल हेल्थ मिशन के साथ ही राज्य सरकार भी काफी सहयोग कर रही है । इसके साथ ही उन्होंने इस बीमारी के उपचार एवं निदान के लिए और अधिक शोध किया जाने पर जोर देते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम के माध्यम से इस बीमारी के प्रति आमजन को जागरूक किए जाने की आवश्यकता है।

10 से 15 साल बाद सामने आते हैं दुष्‍परिणाम

इस अवसर पर स्टेट एपिडेमीओलॉजिस्ट डॉ ओमेश कुमार भारती ने बताया कि थैलेसेमिया खून की एक गंभीर बीमारी है, इस बीमारी से ग्रस्त बच्चे को 3 महीने से 1 साल की उम्र के बीच खून की कमी होने लगती है। थैलेसेमिया के कारण होने वाली खून की कमी को रक्त चढ़ाकर पूरा किया जाता है। खून हर 2-3 हफ्ते में एक बार देना पड़ता है और उम्र भर यह इलाज करना पड़ता है। अगर खून की मात्रा 10 ग्राम प्रतिशत तक रहे तो बच्चा स्वस्थ महसूस करता है और शारीरिक विकास कुछ हद तक सही रहता है। लेकिन खून बार-बार चढ़ाने से शरीर में लोहे की मात्रा बढ़ने लगती है जो जिगर, हृदय, तिल्ली में जमा होने लगता है। इसके दुष्परिणाम 10-15 साल बाद सामने आने लगते है। बार-बार खून देने से लोहे की बढ़ती मात्रा को कम करने के लिए डेस्फराल या केल्फर या डेफेरीसिराक्स नामक दवा शुरू करनी पड़ती है।

उक्त कार्यक्रम में मेडिसिन विभाग, लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज, नई दिल्ली के प्रोफेसर अनुपम प्रकाश ने बताया कि थैलेसेमिया मेजर एक प्रकार की अनुवांशिक बीमारी है।

क्‍या है बीटा थैलेसेमिया बीमारी

इस अवसर पर एसजीपीजीआई लखनऊ की मेडिकल जेनेटिक्स विभाग की प्रो0 सरिता अग्रवाल ने बीटा-थैलेसेमिया बीमारी के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि हीमोग्लोबिन बनाने वाली बीटा-ग्लोबिन  जीन की खराबी होती है जिससे हीमोग्लोबिन सही मात्रा मे नहीं बन पाता है। यह बीमारी तभी होती है जब बच्‍चे के जीन की दोनों प्रतियों (माता और पिता से मिली एक-एक प्रति) में खराबी हो। यह तब ही संभव है जब माता-पिता में एक बीटा-ग्लोबिन जीन खराब हो। ऐसा व्यक्ति जिसमें जीन की एक प्रति खराब हो उसे कैरियर कहते है।

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