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Research : ट्रांसजेंडर के मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य को मजबूत करने में ‘एम्‍प्‍टी चेयर टेक्‍नीक’ कारगर

इंडियन जर्नल ऑफ पॉजिटिव साइकोलॉजीमें प्रकाशित हुई है यह स्‍टडी

सावनी गुप्‍ता व आयुषी गौर

धर्मेन्‍द्र सक्‍सेना

लखनऊ। शादी-विवाह और अन्‍य शुभ कार्यों में अचानक पहुंच कर ढोलक बजाकर, नाच-गाकर अपना नेग मांगने वाले हिजड़ों से आप बखूबी वाकिफ होंगे। पारम्‍परिक तौर पर दूसरों की खुशियों में शरीक होकर अपना और अपने जैसों का जीवनयापन करने वाले हिजड़ा समुदाय के लोगों को ट्रांसजेंडर भी कहा जाता है। यह तो हुई सामान्‍य सी बात जो लगभग सभी जानते हैं, लेकिन शायद यह बात सब नहीं जानते हैं कि इन ट्रांसजेंडर का अपना जीवन कितना कष्‍टप्रद है क्‍योंकि समाज में इनकी स्‍वीकार्यता दूसरों की तरह नहीं है, हालांकि अदालत के हस्‍तक्षेप के बाद से इनकी अलग पहचान दी गयी है, इनके अधिकारों को भी सुरक्षित बनाया गया है, लेकिन मेंटल ट्रॉमा के जिस दौर से ये गुजरते हैं  जिन तथा उपे‍क्षाओं का इन्‍हें सामना करना पड़ता है, उसके लिए अभी बहुत कुछ किये जाने की आवश्‍यकता है।

इन ट्रांसजेंडर्स पर की गयी स्‍टडी में सामने आया है कि इनके मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य को मजबूत करने के लिए मनोविज्ञान की दुनिया में बहुत कुछ है, स्‍टडी के अनुसार एक विशेष थैरेपी ‘एम्‍प्‍टी चेयर टेक्निक’ के प्रयोग से यह सामने आया है कि ट्रांसजेंडर के मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य को बेहतर और मजबूत बनाया जा सकता है, जिससे कि वे अपने साथ होने वाले भेदभाव, उत्‍पीड़न की स्थिति का सामना बेहतर ढंग से कर सकते हैं।

ट्रांसजेंडर पर यह स्‍टडी अलीगंज स्थित सेंटर फॉर मेंटल हेल्‍थ- ‘फेदर्स’ की क्‍लीनिकल साइकोलॉजिस्‍ट सावनी गुप्‍ता ने की है, इसमें सावनी की मदद एमिटी यूनिवर्सिटी की मनोविज्ञान विभाग की प्रोफेसर आयुषी गौर ने की है। इस स्‍टडी का विषय है दि इफेक्टिवनेस ऑफ एम्‍प्‍टी चेयर टेक्‍नीक ऑन साइकोलॉजिकल वेल बीइंग एमंग ट्रांसजेंडर (The Effectiveness of Empty Chair Technique on Psychological Well-being among Transgenders). यह स्‍टडी पिछले दिनों इंडियन एसोसिएशन ऑफ हेल्‍थ रिसर्च एंड वेलफेयर के प्रतिष्ठित ‘इंडियन जर्नल ऑफ पॉजिटिव साइकोलॉजी’ में वर्ष 2022 के एडीशन 13 (2) में छपी है।    

कौन होते हैं ट्रांसजेंडर

साधारण भाषा में समझा जाये तो ट्रांसजेंडर की श्रेणी में आने वाले लोग कहीं न कहीं जन्‍म से ही जेनेटिक डिस्‍ऑर्डर से ग्रस्‍त होते हैं। जैसे-जैसे ये बड़े होने लगते हैं, तब इनके अनुभव करने और इनके व्‍यवहार से पता चलता है कि ये ट्रांसजेंडर हैं। इनका बायोलॉ‍जिकली सेक्‍स फीचर ज्‍यादातर पुरुष का और बहुत कम संख्‍या में स्‍त्री का होता है, लेकिन ये अंदर से अपनी पहचान बायोलॉजिकली सेक्‍स से विपरीत महसूस करते हैं, यानी ट्रांसजेंडर्स में पुरुष का जननांग होने के बावजूद अपने अंदर स्त्रियों वाले गुण इन्‍हें महसूस होते हैं, और ये गुण इनके व्‍यवहार में परिलक्षित होते हैं, जिसे दूसरे लोग भी आसानी से समझ ले‍ते हैं।

सावनी बताती हैं कि इनके व्‍यवहार के सामने आते ही शुरू होती हैं इनकी मुश्किलें। वह बताती हैं कि उनके उठने-बैठने का ढंग, पहनने का ढंग, बात करने का ढंग सब अलग तरीके से होता है। समाज में इन्‍हें अलग-थलग करके देखा जाता है, इन्‍हें सब उपेक्षित तरीके से देखते हैं, बहुत बार ये लोग एब्यूज, मेंटल ट्रॉमा के शिकार हो जाते हैं, जिससे दुखी होने के बावजूद ये अपनी बात किसी से कह नहीं पाते हैं। यही नहीं उपेक्षा के चलते ही इनकी शिक्षा भी बहुत कम रह जाती है।

उन्‍होंने बताया कि दरअसल अधिकतर केस में घरवाले ही ऐसे बच्‍चे को अलग कर देते हैं, जिससे इनकी परेशानी और बढ़ जाती है। जो बच्‍चे माता-पिता से तिरस्‍कृत हो जाते हैं, उन्‍हें हिजड़ा कम्‍युनिटी स्‍वयं पालने का जिम्‍मा उठाती है, कम्‍युनिटी के लोग उसकी शिक्षा के साथ ही उसकी  पूरी पर‍वरिश करते हैं।

क्‍या होती है एम्‍प्‍टी चेयर टेक्निक 

एम्‍प्‍टी चेयर टेक्निक के तहत जब थैरेपी दी जाती है तो उसमें व्‍यक्ति के सामने एक खाली कुर्सी रखी जाती है, और उससे कहा जाता है कि वह कल्‍पना करे कि जिससे उसे शिकायत है, या जिससे वह अपने मन की बात कहना चाहता है, वह उसके सामने कुर्सी पर बैठा है, और उसके साथ उसका वार्तालाप चल रहा है। चूंकि असलियत में तो खाली चेयर पर कोई बैठा नहीं है, ऐसे में वह व्‍यक्ति अपने सवालों का जवाब भी अपनी कल्‍पना में चेयर पर बैठे व्‍यक्ति की ओर से स्‍वयं ही देता है, जिससे उसे यह अहसास होता है कि उस व्‍यक्ति के स्‍थान पर अगर वह होता तो उसकी प्रतिक्रिया क्‍या होती, और प्रश्‍नों का वह क्‍या उत्‍तर देता, साथ ही उसे यह भी अहसास होता है कि उसकी बात से दूसरे को कितनी खुशी हो रही है और कितना दुख।  

अपनी स्‍टडी के बारे में सावनी ने बताया कि एम्‍प्‍टी चेयर टेक्निक के तहत थैरेपी देने के लिए हमें ऐसे ट्रांसजेंडर्स का चुनाव करना था जो थैरेपी में सहयोग कर सकें, इसमें मुख्‍य रूप से ट्रांसजेंडर का शिक्षित होना आवश्‍यक था। उन्‍होंने कहा कि लखनऊ से ही इनका चुनाव करने के लिए हमने 100 से ज्‍यादा ट्रांसजेंडर्स की स्‍क्रीनिंग की, इस स्‍क्रीनिंग के तहत स्‍टडी के लिए आवश्‍यक नॉर्म्‍स, जैसे शिक्षा कम से कम कक्षा 8, किसी मानसिक रोग का इलाज न चल रहा हो और न ही कभी पहले हो चुका हो, आयु 20 से 40 वर्ष के बीच हो, लखनऊ का निवासी हो, आदि को पूरा करने वाले ट्रांसजेंडर्स को छांटा गया, इनमें सिर्फ पांच ऐसे ट्रांसजेडर मिले जो नॉर्म्‍स पूरा कर रहे थे। इनमें से एक ट्रांसजेंडर बाद में छोड़ कर चला गया। इस प्रकार चार ट्रांसजेंडर्स का प्रश्‍नोत्‍तरी के जरिये मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य का परीक्षण किया गया, इस प्रश्‍नोत्‍तरी के लिए प्रश्‍न जिन विषयों से लिये गये थे उनमें, 1.सकारात्मक आत्म-धारणा, 2.दूसरों के साथ सकारात्मक संबंध, 3.पर्यावरण की महारत, 4.स्वायत्तता, 5.जीवन में उद्देश्य और ऐसी भावनाएं, जो किसी व्यक्ति के स्वस्थ होने पर ध्यान केंद्रित करती हैं, विषय शामिल थे।

सावनी ने बताया कि प्रश्‍नोत्‍तरी के उत्‍तर के आधार पर एक स्‍कोर आया जो कि सामान्‍य की श्रेणी से कम था। (यह स्‍कोर सामान्‍य से कम की कैटेगरी में आने पर ही थैरेपी की जरूरत होती है)। प्रश्‍नोत्‍तरी के आधार पर किया गया यह परीक्षण थैरेपी से पहले किया गया और फि‍र 45-45 मिनट के 10 सेशन की थैरेपी देने के बाद पुन: वही मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य का विश्‍लेषण-परीक्षण किया गया, जिसमें पाया गया कि बाद में उनके द्वारा हासिल किया गया स्‍कोर पहले से बेहतर था।

सावनी कहती हैं कि इस प्रकार स्‍टडी के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि जब 10 सेशन में उनके साथ यह चेंज दिखे हैं तो अगर एम्‍प्‍टी चेयर टेक्निक वृहद रूप से सामाजिक स्‍तर पर की जायेगी तथा समाज में इस तरह की जागरूकता और सहयोग रहा तो ट्रांसजेंडर्स के मानसिक, शारीरिक स्‍वास्‍थ्‍य के साथ ही रिलेशनशिप में लाभ दिखेगा। इस प्रकार उन्‍हें कष्‍टप्रद मानसिक अवस्‍था की स्थिति से बचाया जा सकता है।

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