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छोटे बच्‍चे के हाथ में मोबाइल थमाने का मतलब… वर्चुअल ऑटिज्‍म

-क्‍लीनिकल साइकोलॉजिस्‍ट सावनी गुप्‍ता की महत्‍वपूर्ण सलाह

सावनी गुप्‍ता, क्‍लीनिकल साइकोलॉजिस्‍ट

सेहत टाइम्‍स

लखनऊ। कहीं आप अनजाने में अपने बच्‍चे को वर्चुअल ऑटिज्‍म का शिकार तो नहीं बना रहे हैं ?  पिछले कुछ समय से बीमारी का एक नया टर्म आया है वर्चुअल ऑटिज्‍म, इस बीमारी का कारण छोटे बच्‍चों को मोबाइल, टैबलेट जैसे गैजेट्स देने से जुड़ा है।

2 अप्रैल को विश्‍व ऑटिज्‍म दिवस मनाया जाता है, इसलिए ऑटिज्‍म के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए पूरे अप्रैल माह को जागरूकता माह के रूप में भी मनाया जाता है। इस जागरूकता माह में सेहत टाइम्‍स ने अलीगंज स्थित सेंटर फॉर मेंटल हेल्‍थ ‘फेदर्स’ की क्‍लीनिकल साइकोलॉजिस्‍ट सावनी गुप्‍ता से विशेष वार्ता की। सावनी बताती हैं कि ऑटिज्‍म की बीमारी करीब सौ बच्‍चों में से एक को होती है, इसके कारणों की बात करें तो जेनेटिक्‍स और एन्‍वायरमेंटल सहित विभिन्‍न प्रकार के कारण शामिल हैं, अभी तक की रिसर्च में ऑटिज्‍म का कोई एक कारण सामने नहीं आया है।

खुद को फ्री रखने के लिए बच्‍चों को थमा देते हैं मोबाइल फोन

उन्‍होंने कहा कि जहां तक वर्चुअल ऑटिज्‍म की बात की जाये तो यह ऐसी बीमारी है जिसे माता-पिता जागरूक रह कर पूरी तरह से रोक सकते हैं क्‍योंकि इसके कारण को न होने देने में माता-पिता की ही विशेष भूमिका है। सावनी ने बताया कि यह देखा गया है कि जो माता-पिता बहुत व्‍यस्‍त रहते हैं, अपने बच्‍चों के साथ बहुत सम्‍पर्क नहीं रख पाते हैं, या बहुत बार खुद को फ्री रखना चाहते हैं, ऐसे माता-‍पिता बच्‍चे को मोबाइल पकड़ा देते हैं। यहां तक कि बच्‍चे को जो कविता, गीत जैसी चीजें सिखानी है उसे मोबाइल या टैबलेट से ही सिखाते हैं, जोकि सही नहीं है। उन्‍होंने बताया कि तीन वर्ष तक की आयु में यदि बच्‍चे का स्‍क्रीन टाइम चार घंटे से ज्‍यादा है तो इसका असर बच्‍चे के ब्रेन में न्‍यूरो ट्रांसमीटर पर पड़ने लगता है,  जिसकी वजह से बच्‍चे का बोलना, बच्‍चे का दूसरों के साथ सम्‍पर्क रखना जैसी चीजें प्रभावित होती हैं।

इस उम्र में सबसे ज्‍यादा सीखते हैं बच्‍चे

सावनी ने बताया कि दरअसल तीन वर्ष तक की यह उम्र बच्‍चे की सबसे ज्‍यादा सीखने की उम्र होती है, इसी उम्र में वह लोगों द्वारा अपना नाम पुकारने पर अपना नाम सीखता है कि मेरा नाम यह है, घर के सभी सदस्‍यों का परिचय जानता है ये सब करने से उसका घरवालों के साथ कनेक्‍शन बनता है। सावनी कहती हैं कि बच्‍चा बहुत सी बातें जो चीजों को छूकर सीखता है, लेकिन ज्‍यादातर स्‍क्रीन के सम्‍पर्क में रहने से भौतिक रूप से वह चीजों को सीखने से वंचित रहता है। जो बातें उसके विकास के लिए आवश्‍यक होती हैं उन्‍हें वह सीख नहीं पाता है। उन्‍होंने बताया कि उदाहरण के लिए जैसे स्‍क्रीन पर उसने देखा कि जिस चीज से धुआं निकल रहा है वह गर्म है, लेकिन उसका तापमान क्‍या है, गर्म क्‍या होता है इसे वह तभी सीखेगा जब महसूस करेगा।

मोबाइल फोन के इर्द-गिर्द घूमने लगती है बच्‍चे की दुनिया

इसके विपरीत बच्‍चों को इन बातों को न सिखाये जाने व किये जाने या बहुत कम किये जाने के स्‍थान पर अगर उसे मोबाइल फोन पकड़ा दिया जाये तो ऐसे में बच्‍चा जो भी सीखता-समझता है वह उसी फोन से समझता है, इसके साथ ही बच्‍चा अपने मस्तिष्‍क में एक वर्चुअल इन्‍वॉयरमेंट क्रियेट कर लेता है। इसका नतीजा यह होता है कि धीरे-धीरे बच्‍चे की दुनिया उसी फोन के इर्द-गिर्द घूमने लगती है, और बच्‍चा उसी दुनिया में रहने का आदी हो जाता है, बच्‍चा बोलता नहीं है, अपनी धुन में रहता है जबकि उसे जो बातें माता-पिता द्वारा इस उम्र में सिखानी चाहिये थी उन्‍हें सीखने से वह वंचित रहता है जिस कारण लोगों के साथ उसका इंट्रेक्‍शन नहीं हो पाता बल्कि उसका अटेन्‍शन सिर्फ फोन पर ज्‍यादा रहता है।

जब जबरदस्‍ती छीनते हैं बच्‍चे से मोबाइल

सावनी कहती हैं कि जब माता-पिता को महसूस होता है कि उनका बच्‍चा हमेशा मोबाइल पर ही लगा रहता है, तो वे उससे जबरदस्‍ती मोबाइल छीनना शुरू करते हैं, ऐसे में बच्‍चा जो उसी मोबाइल की दुनिया का आदी हो चुका होता है, उसे यह बात बुरी लगती है, और वह जिद करता है, रोता है, चिल्‍लाता है, उसकी नींद पर असर पड़ता है, वह अवसाद महसूस करता है तो ऐसे में देखा जाये तो चूक वहां हुई जब माता-पिता ने बच्‍चे को मोबाइल फोन पकड़ा दिया था।

बच्‍चे को खुद का समय दें

सावनी ने सलाह दी कि आदर्श स्थिति यह है कि माता-पिता को अपने बच्‍चे को समय देना चाहिये, कोशिश करें कि कम से कम दो साल तक उसे स्‍क्रीन से दूर रखें यानी मोबाइल, टैबलेट, टीवी जैसी चीजों को न दिखायें, इसके बदले तरह-तरह के खेलों द्वारा खुद समय देते हुए बच्‍चे के विकास का रास्‍ता तैयार करें। उन्‍होंने कहा कि यदि माता-पिता बच्‍चे को पूरा समय देकर उसकी प‍रवरिश कर रहे हैं और उसके बावजूद उनको लगता है कि बच्‍चा नहीं बोल रहा है, या आंख से आंख मिलाकर बात नहीं करता है तो बहुत से माता-पिता यह सोचते हैं कि अभी तो छोटा है, अभी छह माह बाद कर लेगा लेकिन ऐसा न सोचें उसे समय रहते चिकित्‍सक, बाल रोग विशेषज्ञ, चाइल्‍ड साइकोलॉजिस्‍ट को दिखा दें।

उन्‍होंने बताया कि ऐसा ही एक बच्‍चा पिछले दिनों से उनके पास आ रहा है, उसे यहां बिहैवियर थेरेपी के तहत बहुत तरह की एक्टिविटीज के माहौल में रख कर बच्‍चे का उपचार किया जा रहा है, जिससे उसके व्‍यवहार में आशातीत बदलाव आ रहा है। उन्‍होंने कहा कि बिहैवियर थैरेपी में बच्‍चे-बच्‍चे पर निर्भर करता है कि उसे किस प्रकार की थेरेपी दी जाये जिससे वह ठीक हो सके। उन्‍होंने कहा कि बच्‍चे के साथ माता-पिता को समझाया जाता है कि उन्‍हें बहुत धैर्य रखना है, जो चीज बतायी जाती है उसे रेगुलर कराना है।