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सड़क के किनारे से शुरू होती है इमरजेंसी देखभाल, EMS की और मजबूती जरूरी

-कुलपति ने इमरजेंसी विभाग को बताया अस्‍पताल का चेहरा, प्राथमिकता के आधार पर इलाज जरूरी

-अंतर्राष्‍ट्रीय इमरजेंसी मेडिसिन दिवस पर केजीएमयू ने आयोजित किया जागरूकता कार्यक्रम

सेहत टाइम्‍स  

लखनऊ। इमरजेन्सी देखभाल सड़क के किनारे से शुरू होती है, क्योंकि इमरजेन्सी मामलों में परिवार के सदस्य या अन्‍य जन पहले प्रतिक्रियाकर्ता होते हैं, उसके बाद इमरजेन्सी प्रणाली यानी एम्बुलेंस और पैरामेडिक्स और फिर अस्पताल। इसलिए आवश्‍यकता समग्र प्रयास किये जाने की है जिससे समय रहते (गोल्‍डन आवर या प्‍लेटिनम मिनट में) समुचित उपचार कर मरीज की जान बचायी जा सके।

यह बात किंग जॉर्ज चिकित्‍सा यूनिवर्सिटी के इमरजेंसी मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रो हैदर अब्‍बास ने आज अंतर्राष्‍ट्रीय इमरजेंसी मेडिसिन दिवस (27 मई) के अवसर पर जागरूकता के लिए जूम माध्‍यम से ऑनलाइन आयोजित कार्यक्रम इमरजेंसी मेडिसिन के महत्‍व पर चर्चा करते हुए अपने सम्‍बोधन में कही।  उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने देश भर के सभी मेडिकल कॉलेजों में इमरजेन्सी मेडिसिन विभाग होना अनिवार्य कर दिया है।

कुलपति लेफ्टिनेंट जनरल डॉo बिपिन पुरी, समारोह के मुख्य अतिथि थे, उन्होंने मृत्यु दर को कम करने के लिए इमरजेन्सी में शीघ्र हस्तक्षेप के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने जोर देकर कहा कि इमरजेन्सी अस्पताल का चेहरा है, मरीजों को प्राथमिकता के आधार पर इलाज मिलना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि ओपीडी के अलावा इमरजेंसी ही ऐसी जगह है जहां से होकर मरीज अस्‍पताल में भर्ती होता है।

कार्यक्रम के आयो‍जन अध्‍यक्ष व विभागाध्यक्ष प्रोo हैदर अब्बास ने गोल्डेन आवर के दौरान इलाज की आवश्यकता पर जोर दिया, जिसके दौरान कई लोगों की जान बचाई जा सकती है, उन्होंने कहा कि EMS (ईएमएस) यानी इमरजेंसी मेडिकल सिस्‍टम को जितना ज्‍यादा एक्टिव किया जायेगा, मरीज की जान बचाना उतना ही आसान होगा। उन्‍होंने इसे विस्‍तारपूर्वक समझाते हुए कहा कि सर्वप्रथम दुर्घटनास्‍थल से या घर पर तबीयत बिगड़ने पर मरीज की देखभाल करने वाले जनता के लोग या घरवाले होते हैं, ये ही लोग मरीज को अस्‍पताल ले जाने की तैयारी करते हैं, इसलिए आमजन में लगातार यह प्रचार किये जाने की आवश्‍यकता है कि मुख्‍य रूप से हार्ट अटैक आने पर, स्‍ट्रोक पड़ने पर या सड़क दुर्घटना होने पर उन्‍हें मरीज के साथ किस तरह पेश आना है, इसके बाद नम्‍बर आता है कि शीघ्रातिशीघ्र अगर वहां एम्‍बुलेंस पहुंच जाये तो एक तरह से इलाज एम्‍बुलेंस में ही शुरू हो जाता है, इसके बाद अस्‍पताल पहुंचने पर वहां की इमरजेंसी में विधिवत तरीके से मरीज का इलाज हो सकता है।

डॉ अब्‍बास ने जानकारी देते हुए बताया कि इमरजेंसी मेडिसिन विभाग रिससिटेटिव इमरजेंसी मेडिसिन में पीडीसीसी कोर्स शुरू कर रहा है। उन्‍होंने बताया कि विभाग में छह वेंटिलेटर हैं, इसे और बढ़ाया जाएगा। विभाग ने कई पेपर प्रकाशित किए हैं। डॉo हैदर अब्बास ने बताया कि हम आपातकाल या लाल बत्ती से न्यू इमरजेन्सी मेडिसिन के रूप में विकसित हुए हैं।

यूoएसoएo से जुड़े डॉo सुनील आहूजा ने बताया कि यह इमरजेंसी मेडिसिन शाखा बहुत पुरानी नहीं है और विकासशील देशों में अभी बढ़ ही रही है। उन्होंने बताया कि विदेशों और भारत के विशेषज्ञों की बैठक से शोध के अधिक अवसर पैदा होंगे।

आयोजन सचिव केजीएमयू के एसोसिएट प्रोफेसर डॉo प्रेमराज सिंह ने  इमरजेन्सी मेडिसिन के बारे में मेडिकल छात्रों में रुचि पैदा करने के लिए चर्चा की। उपकुलपति प्रोo विनीत शर्मा कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि थे। इस दौरान सोसाइटी ऑफ इमरजेंसी मेडिसिन इंडिया, यूपी के अध्यक्ष डॉo सुजीत सिंह, निजाम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, हैदराबाद की प्रोo आशिमा शर्मा, मेदांता अस्पताल, लखनऊ के डॉo लोकेंद्र गुप्ता ने भाग लिया। धन्यवाद ज्ञापन डॉo उत्सव आनंद एवं डॉo मुकेश कुमार दिया।

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