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यूपी में सबसे कम वजन के नवजात को बचाने की उपलब्धि डॉ आशुतोष वर्मा के नाम

-23 अप्रैल, 2026 को 26 सप्ताह की गर्भावस्था में जन्मी 480 ग्राम की फीमेल बेबी

-दस वर्ष पहले भी 624 ग्राम वजन के नवजात को बचा चुके हैं डॉ आशुतोष 

सेहत टाइम्स

लखनऊ। मात्र 26 सप्ताह की गर्भावस्था में जन्म लेने वाली 480 ग्राम की अत्यन्त कम वजन वाली बच्ची को 84 दिन तक नवजात गहन चिकित्सा इकाई (एनआईसीयू) में रखने के बाद खतरे से बाहर लाकर वरिष्ठ नवजात एवं शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. आशुतोष वर्मा ने महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की है। यह बच्ची उत्तर प्रदेश में अब तक की सबसे कम वजन वाली जीवित नवजात हो गयी है, अभी तक यह आंकड़ा 520 ग्राम था। ज्ञात हो सामान्य तौर पर नवजात का जन्म गर्भावस्था के 37 से 42 सप्ताह के बीच होता है तथा जन्म के समय वजन 3 किलो के आसपास होता है।

यह उपलब्धि हासिल करने वाले चिल्ड्रेन मेडिकल सेंटर के मेडिकल डाइरेक्टर डॉ आशुतोष वर्मा ने आज 17 जुलाई को यहां होटल सिलवेट में आयोजित पत्रकार वार्ता में बताया कि बीती 23 अप्रैल, 2026 को यहां के एक निजी हॉस्पिटल में पलिया, लखीमपुर के रहने वाले गोविन्द बंसल की पत्नी अर्चना बंसल ने एक बच्ची को जन्म दिया। मात्र 26 सप्ताह की प्रेगनेंसी के बाद जन्मी इस नवजात का वजन सिर्फ 480 ग्राम था। शिशु के इलाज में बताये गये भारी भरकम खर्च की चिंता और संतान सुख को लेकर पूर्व की नाकामियों और भविष्य की आशंकाओं के चलते घरवालों के सामने सबसे बड़ी चुनौती नवजात को स्वस्थ रखने की थी।

डॉ आशुतोष ने बताया कि तभी घरवालों को किसी ने उनसे (डॉ आशुतोष से) मिलने की सलाह दी, क्योंकि दस वर्ष पूर्व भी उन्होंने 624 ग्राम वजन के जन्मे नवजात को स्वस्थ रखने में सफलता हासिल की थी। उन्होंने बताया कि जैसे ही मुझसे इस बारे में पूछा गया तो मैंने पूर्व में हासिल सफलता को याद किया तथा खर्च की ओर अधिक ध्यान न देते हुए इसे चुनौती मानकर नवजात का इलाज करने की हामी भर दी।

किस प्रकार किया इलाज

उन्होंने कहा कि नवजात को जब उनके अस्पताल लाया गया तो उसे कई प्रकार की दिक्कतें थीं, सबसे बड़ी दिक्कत थी कि उसके फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं थे। एनआईसीयू में भर्ती करते हुए चार दिन वेंटीलेटर पर रखा। फेफड़ों को मजबूत करने के लिए द्रव्य सरफैक्टेंट Surfactant दिया गया। इसके बाद उसे वेंटीलेटर से हटा लिया। उन्होंने बताया कि वेन में वीगो नहीं लग सकता था तो हम लोगों ने नाभि के रास्ते एक नली डालकर उसे आहार देना शुरू किया, जिसे टीपीएन Total Parental Nutrition कहते हैं। इससे बच्चे का वजन बढ़ना शुरू हुआ, जब वजन की वृद्धि पॉजिटिव आने लगी तब मां का दूध निकालकर नली से देना शुरू किया, जिसे वह हजम करने लगी। इस पूरी प्रक्रिया में लगभग दो माह का समय लग गया। इस बीच उसे दो बार ब्लड भी चढ़ाना पड़ा, दो बार उसे प्रोटीन भी देना पड़ा। कुल मिलाकर दो महीने 12 दिन बच्ची को एनआईसीयू में रखा गया। उसके बाद उसे बाहर भी रखा गया।

उन्होंने बताया कि इन सभी चुनौतियों को पार करते हुए दो ढाई महीनों में माता-पिता और चिकित्सकों की सहन शक्ति, टीम की अथक मेहनत का नतीजा है कि हमें सफलता मिली। अब बच्ची आराम से रूम ऑक्सीजन पर हर तीन घंटे में 15 मिलीलीटर मां का दूध पी रही है, और उसका वजन लगभग 800 ग्राम हो गया है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि इलाज में कुल साढ़े चार से पांच लाख रुपये का खर्चा आया, इसमें 84 दिनों में डॉक्टर की फीस, वेंटीलेटर का खर्च, दवाओं का खर्च, नर्सिंग चार्जेज शामिल है।

डॉ वर्मा ने बताया कि उत्तर प्रदेश के इतिहास में आजतक इतने कम वजन का जन्मा बच्चा जीवित नहीं रहा है। यूपी में अब तक का रिकॉर्ड 520 ग्राम का था, उससे पहले हमारा ही 624 ग्राम का रिकॉर्ड था। अब इस बच्ची का वजन 480 ग्राम था। उन्होंने कहा कि यूपी में हम प्रथम स्थान पर, भारत में पांचवें और विश्व में दसवें स्थान पर हैं। विश्व का सबसे कम वजन (212 ग्राम) के नवजात का रिकॉर्ड विकसित देश सिंगापुर का है। उन्होंने कहा​ कि बड़ी बात यह है कि जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं, उनके मन में भी यह विश्वास आयेगा कि यहां भी ऐसा हो सकता है।