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सही समय पर परेशान व्‍यक्ति के साथ सही संवाद से रुक सकती हैं आत्‍महत्‍या की घटनायें

विश्‍व मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य दिवस पर आईएमए में डॉ अलीम सिद्दीकी ने की पत्रकार वार्ता
डॉ जेडी रावत व डॉ अलीम अहमद सिद्दीकी

सेहत टाइम्‍स ब्‍यूरो

लखनऊ। किसी भी व्‍यक्ति द्वारा की गयी आत्‍महत्‍या से सिर्फ उसी व्‍यक्ति का जीवन ही नहीं समाप्‍त होता है, बल्कि परिजनों की परेशानियां बढ़ती हैं, साथ ही समाज का भी नुकसान होता है। संतोष की बात यह है कि यह समस्‍या लाइलाज नहीं है, आत्‍महत्‍या की इस प्रवृत्ति को रोकना पूरी तरह संभव है, बस जरूरत है दूसरे लोगों द्वारा ऐसे व्‍यक्तियों के लक्षणों को पहचानने की और उनसे बात कर उनका दुख बांटने की। आज आवश्‍यकता इस बात की है कि सही समय पर सही सुझाव अगर परेशान व्‍यक्ति को मिल जाये तो आत्‍महत्‍या के प्रत्‍येक केस को रोका जा सकता है।

यह बात इंडियन मेडिकल एसोसिएशन लखनऊ के तत्‍वावधान में आईएमए भवन में विश्‍व मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य दिवस पर आयोजित पत्रकार वार्ता में आईएमए लखनऊ के ऐडिटर व मनोचिकित्‍सक डॉ अलीम अहमद सिद्दीकी ने कही। डॉ अलीम ने कहा कि विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में प्रति 40 सेकंड में एक व्‍यक्ति आत्‍महत्‍या कर लेता है जबकि भारत में यह दर प्रति पांच मिनट में एक है।

डॉ अलीम ने बताया कि विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने विश्‍व मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य दिवस की इस बार की थीम आत्‍महत्‍या की ‘रोकथाम और जागरूकता’ है। इस बारे में डॉ अलीम ने बताया कि आजकल की जीवन शैली जिसमें व्‍यायाम का अभाव है, खानपान भी अलग है और सबसे बड़ी बात है कि व्‍यक्ति समस्‍याओं में घिरा रहता है। उन्‍होंने कहा कि हालांकि कोई भी समस्‍या ऐसी नहीं है जिसका हल न हो, और यह भी सही है कि किसी भी समस्‍या का हल आत्‍महत्‍या नहीं है, क्‍योंकि इससे समस्‍यायें खत्‍म नहीं होती हैं, बल्कि बढ़ जाती हैं।

उन्‍होंने बताया कि लोगों को चाहिये कि अगर उनके घर में, मित्र, रिश्‍तेदार या कोई और जानपहचान वाला अगर कभी निराशाजनक बातें कहते हुए यह कहे कि …भाई बहुत परेशानी है, इससे अच्‍छा है कि मर जायें।… डॉ अलीम ने बताया कि इसी समय जिस व्‍यक्ति से यह बात परेशान व्‍यक्ति ने कही है, वह पलटकर उससे उसकी समस्‍या पूछते हुए उसके समाधान के प्रति उसे समझाये, यही नहीं यह भी समझाये कि आत्‍महत्‍या किसी परेशानी का हल नहीं है। उन्‍होंने कहा कि परेशान व्‍यक्ति भी इस बात को आसानी से समझ लेता है क्‍योंकि आत्‍महत्‍या के विचार थोड़े ही समय के लिए आते हैं।

डॉ अलीम ने बताया कि अगर किसी को लगे कि कोई व्‍यक्ति ज्‍यादा ही दुखी है, और वह आत्‍महत्‍या की बात अपनी तरफ से नहीं कह रहा है तब भी उससे स्‍वयं पूछे कि क्‍या तुम्‍हारा मन आत्‍महत्‍या करने का तो नहीं कर रहा है ? डॉ अलीम ने बताया कि बहुत से लोग सोचते हैं कि अपनी तरफ से आत्‍महत्‍या की बात पूछने पर उस व्‍यक्ति को आत्‍महत्‍या का विचार आ सकता है, तो यह गलत सोचते हैं, यह सिद्ध हो चुका है कि ऐसा करने से आत्‍महत्‍या को रोकने में मदद मिलती है।

डॉ अलीम ने बताया कि मानसिक रूप से परेशान लोगों को पहचानने के लिए कुछ बातों का ध्‍यान रखें जैसे कोई व्‍यक्ति अकेले रहना ज्‍यादा रहना पसंद कर रहा है, चुप-चुप रहता है, लगातार फोन पर ही अपना समय बिता रहा है, घर में भी आपस में बात कम हो रही है तो ऐसे व्‍यक्ति से आत्‍मीयता से बात करना बहुत आवश्‍यक है।

उन्‍होंने बताया कि घर में माहौल ऐसा रखें कि आपस में एक-दूसरे से सदस्‍य अपनी परेशानी साझा कर सकें, उन्‍होंने कहा कि बहुत से परिवार मे ऐसा भी होता है कि अगर व्‍यक्ति अपनी परेशानी बता भी रहा है तो गुस्‍से में कहा जाता है कि अरे तुम तो ऐसा ही सोचते हो, ऐसा कतई नहीं करना चाहिये, बल्कि प्‍यार के साथ उसकी परेशानी को समझना चाहिये।

डॉ अलीम ने कहा कि आत्‍महत्‍या की घटनायें बढ़ रही हैं, इन पर लगाम लगाने की जरूरत है। उन्‍होंने बताया कि एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2005 में जहां आत्‍महत्‍या करने वालों की संख्‍या 1 लाख 13 हजार थी वहीं 2015 में यह संख्‍या बढ़कर 1 लाख 33 हजार हो गयी। उन्‍होंने कहा कि इसलिए आज आवश्‍यकता इस बात की है कि सही समय पर सही सुझाव अगर परेशान व्‍यक्ति को मिल जाये तो आत्‍महत्‍या के प्रत्‍येक केस को रोका जा सकता है। पत्रकार वार्ता में आईएमए लखनऊ के सचिव डॉ जेडी रावत भी उपस्थित रहे।

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