Sunday , November 8 2026

क्या वाहनोंं की हेडलाइट के रिफ्लेक्शन से होने वाली बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रहे हैं हम ?

-दोपहिया, चार पहिया वाहनों की हेडलाइट हमेशा अपर बीम पर रखना आदत बना रखी है लोगों ने

-मोटर वाहन अधिनियम होने के बावजूद इसका पालन नहीं करा पा रहा है यातायात विभाग

लखनऊ। यहां अलीगंज में 22 जून को हुए अग्निकांड में हुई मौतों के बाद सभी तरफ इस पर चर्चा हो रही है, जाहिर सी बात है, अत्यन्त दु:खद हादसे को लेकर सभी की आंखें नम होंगी ही। लेकिन अगर आप गौर करें तो दुर्घटना होने का इंतजार करना हमारी नियति बन चुकी है, जान जोखिम में डालने वाले कार्यों को धड़ल्ले के साथ होने देना बहुत सामान्य हो गया है। हादसा होने पर एक-दूसरे पर दोषारोपण करके हम खुद को पाक-साफ दिखाने की कोशिश करते हैं, लेकिन एक ईमानदार कोशिश करने की प्रवृत्ति विकसित नहीं करते हैं कि इस प्रकार की लापरवाही न हों।

दुर्घटना का इंतजार नियति बन गयी है हमारी

जैसा कि मैंने कहा कि दुर्घटना होने का इंतजार करना हमारी नियति बन चुकी है, इसे मैं एक उदाहरण के साथ रख रहा हूं। एक बड़ी संख्या में लोग दोपहिया, चौपहिया जैसे वाहनों को चलाते समय हेडलाइट को अपर बीम मोड पर रखते हैं, इससे होता यह है कि सामने से आने वाले वाहन के चालक की आंखों में जब रोशनी पड़ती है तो उसकी आंखें चुंधिया जाती हैं और कुछ सेकंड्स के लिए व्यक्ति ब्लाइंड हो जाता है, इसका नतीजा आमने-सामने की जोरदार टक्कर या किसी भी चीज से टकराने की संभावना को बढ़ा देता है। यहां यह भी ध्यानाकर्षित करना चाहता हूं कि अगर वाहन चालक चश्मा लगाता है तो यह चौंध उसको और ज्यादा परेशान करती है। यही नहीं आजकल बहुत से वाहनों में सफेद चकाचौंधयुक्त एलईडी लाइट लगवायी जा रही हैं, इनकी चमक और चौंध और ज्यादा होती है।

सड़क दुर्घटनाओं की बड़ी संख्या की वजह है रिफ्लेक्शन

दुर्घटनाओं के शिकार लोगों की केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर में जटिल से जटिल सर्जरी करने का लम्बा अनुभव रखने वाले प्रो समीर मिश्रा बताते हैं कि वाहनों की हेडलाइट की रोशनी से आंखों में रिफ्लेक्शन के चलते होने वाली दुर्घटनाओं का प्रतिशत काफी है। एक अनुमान के अनुसार लगभग सिर्फ अपनी ही गलती से लगभग 40 फीसदी एक्सीडेंट होते हैं, डिवाइडर वाली सड़कों पर भी मुख्य मार्गों पर डिवाइडर से टकराने, खड़े वाहन में गाड़ी टकराने, आगे चल रहे वाहन में पीछे से टक्कर लगने जैसी दुर्घटनाओं की बड़ी वजह भी लाइट का रिफ्लेक्शन होता है। डॉ समीर ने इसे स्पष्ट करते हुए बताया कि जैसे ही आप 60 किलोमीटर से ज्यादा की रफ्तार से गाड़ी चलाते हैं तो आंखों का रिफ्लेक्शन 1/5 कम होने लगता है। इसीलिए कहा जाता है कि जैसे-जैसे आप वाहन की स्पीड बढ़ायें वैसे-वैसे आगे जा रहे वाहन से अपने वाहन की दूरी भी बढ़ाते रहें।

कुछ पलों के लिए चालक हो जाते हैं दृष्टिहीन

उन्होंने बताया कि शहीद पथ जैसे मार्गों में डिवाइडर वाली जगहों पर पेड़ लगाये जाने का मकसद भी यही है कि दूसरी ओर से आने वाले वाहनों की हेडलाइट पेड़ों में छिप जाये, विपरीत दिशा से आ रहे वाहन चालक की आंखों पर न पड़े। प्रो समीर बताते हैं कि इसी प्रकार शहरों के अंदर बिना डिवाइडर वाले मार्गों पर यह दिक्कत और ज्यादा बढ़ जाती है। उन्होंने बताया कि जो लोग ज्यादा चकाचौंध वाली लाइट का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें सामने की सड़क अच्छी प्रकार से दिखायी देती है, जिसके फलस्वरूप वह तेज स्पीड में वाहन चलाते हैं, ऐसे में अगर सामने से आने वाले वाहन में भी ज्यादा चकाचौंध वाली लाइट होती है तो कुछ पल के​ लिए दोनों ही वाहन चालक दृष्टिहीन हो जाते हैं, जिससे दुर्घटना की संभावना और बढ़ जाती है।

जिम्मेदारों का इस तरफ ध्यान क्यों नहीं ?

अब सोचिये इन कारणों से होने वाले हादसों के लिए जिम्मेदार किसे ठहरायेंगे, यातायात व्यवस्था के जिम्मेदारों को यह दिक्कत क्यों नहीं दिखायी देती है, यातायात विभाग के कैमरे मे कैद होने वाली छोटी-छोटी बातें कैमरे में कैद करने वाले यातायात विभाग के कैमरों में कैद इस लापरवाही को नियमों का उल्लंघन क्यों नहीं माना जाता है। यह स्थिति डिवाइडर वाले मार्गों के साथ कम चौड़ाई वाले सम्पर्क मार्गों पर दिखना बहुत आम बात हो गयी है। यह हाल तब है जब इसके लिए कानून बना हुआ है।

क्या हैं नियम

भारत में मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) और केंद्रीय मोटर वाहन नियमों (CMVR) के तहत वाहनों में अपर (High Beam) और डिपर (Low Beam / Dipped Beam) लाइट के उपयोग के लिए स्पष्ट नियम हैं। इनका मुख्य उद्देश्य रात में सामने से आने वाले ड्राइवरों को चकाचौंध (Glare) से बचाना और हादसों को रोकना है। नियम में स्पष्ट है कि शहर में गाड़ी चलाते समय, घनी आबादी वाले क्षेत्रों में या जहाँ स्ट्रीट लाइट उपलब्ध हो, हमेशा डिपर लाइट (Low Beam) का ही इस्तेमाल करना चाहिए। हाई-बीम या अपर लाइट (High Beam) का उपयोग केवल अंधेरे, सुनसान राजमार्गों (Highways) पर या लंबी दूरी तक देखने के लिए किया जाना चाहिए। नीली, लाल या बहुत तेज रोशनी वाली लाइट (जो ड्राइवर को अंधा कर दे) अवैध मानी जाती हैं।

नियम बताते हैं कि वाहन की हेड लाइट में एलईडी लाइट लगाना कानूनी रूप से मान्य तो है, लेकिन इसके लिए आरटीओ (RTO) और मोटर वाहन अधिनियम के कुछ सख्त नियम भी हैं। आप कंपनी द्वारा स्वीकृत और सही तरीके से एलाइन की गई एलईडी का ही इस्तेमाल कर सकते हैं। यदि आप आफ्टर-मार्केट (बाहर से) बहुत तेज और चकाचौंध पैदा करने वाली एलईडी लाइट लगाते हैं, तो ट्रैफिक पुलिस आपका चालान काट सकती है। अगर हैलोजन के लिए बने रिफ्लेक्टर में एलईडी बल्ब लगाया जाता है, तो रोशनी बिखर जाती है और सामने से आ रहे ड्राइवरों की आंखों में चुभती है, जो कि गैर-कानूनी है। आमतौर पर हेडलाइट्स के लिए अधिकतम 70 वॉट और 3000 लुमेन (RTO-अनुमोदित) की सीमा तय होती है।