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सुप्रीम कोर्ट से हरी झंडी, लखनऊ में भारत की पहली नाइट सफारी बनने का रास्ता साफ

-अगस्त में परियोजना का शिलान्यास करा सकती है उत्तर प्रदेश सरकार

-1,510 करोड़ रुपए की लागत से 855 एकड़ क्षेत्र में किया जायेगा निर्माण

-कृत्रिम चांदनी जैसा होगा प्रकाश, जिससे जानवरों की जैविक घड़ी न हो प्रभावित

सांकेतिक तस्वीर

सेहत टाइम्स

लखनऊ। लम्बे इंतजार के बाद अंतत: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कुकरैल रिजर्व फॉरेस्ट में प्रस्तावित देश की पहली नाइट सफारी के निर्माण का रास्ता साफ हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को मंजूरी दे दी है। ज्ञात हो यह परियोजना पिछले चार वर्षों से कानूनी और पर्यावरणीय जांच के विभिन्न चरणों से गुजर रही थी। बताया जा रहा है कि अब प्रदेश सरकार अगले माह अगस्त में परियोजना का शिलान्यास करा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले पर सुनवायी करते हुए कहा कि जब केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (CZA), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी (CEC) परियोजना को आवश्यक शर्तों के साथ मंजूरी दे चुके हैं, ऐसे में राज्य सरकार को परियोजना को लागू करने से रोकने का कोई कारण नहीं है।

समय-समय पर निरीक्षण करेगी सीईसी

निर्माण को मंजूरी देने के साथ ही सु्प्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार को CEC, CZA और पर्यावरण मंत्रालय द्वारा तय की गई प्रत्येक शर्त का अक्षरशः पालन करना होगा। यही नहीं अदालत ने समय-समय पर सीईसी को परियोजना का निरीक्षण करने का निर्देश भी दिया है, निरीक्षण में देखा जायेगा कि इस निर्माण को लेकर जिन शर्तों का पालन करने को कहा गया है, उनका उल्लंघन न होने पाये। CEC ने परियोजना के मूल डिजाइन में कई बदलाव सुझाए थे। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि जंगल का अधिकतम हिस्सा सुरक्षित रहे और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर न्यूनतम प्रभाव पड़े। इन बदलावों को माने जाने के बाद ही परियोजना को अंतिम स्वीकृति मिली है।

यह था विरोध

सुनवाई के दौरान परियोजना का विरोध करने वाले पक्ष का तर्क था कि रिजर्व फॉरेस्ट को पर्यटन केंद्र में बदलना पर्यावरण के लिए उचित नहीं होगा। इस पर अदालत ने यह टिप्पणी की कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन जरूरी है तथा आधुनिक वन्यजीव संरक्षण की अवधारणाओं को भी अपनाना होगा। बताया जा रहा है कि अगस्त में शिलान्यास कराने की तैयारी है। परियोजना के पहले चरण के लिए 631 करोड़ रुपए स्वीकृत हो चुके हैं जबकि निर्माण कार्य के लिए 206 करोड़ रुपए जारी किए जा चुके हैं। विभाग ने परियोजना का पहला चरण दो वर्षों मेंं पूरा किये जाने का लक्ष्य रखा है।

पहले चरण में नाइट सफारी और इको-टूरिज्म जोन

855 एकड़ क्षेत्र में बनने वाली इस परियोजना में करीब 1,510 करोड़ रुपए व्यय होंगे। इसे दो चरणों में बनाया जाएगा। पहले चरण में नाइट सफारी और इको-टूरिज्म जोन तैयार होगा जबकि दूसरे चरण में आधुनिक डे जू का निर्माण किया जाएगा। इस परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक रात्रिकालीन व्यवहार के दौरान देखा जा सकेगा। यहां विशेष ‘मूनलाइट सिमुलेशन’ यानी कृत्रिम चांदनी जैसी प्रकाश व्यवस्था बनाई जाएगी, जिससे जानवरों की जैविक घड़ी प्रभावित न हो और पर्यटक उनके वास्तविक व्यवहार का अनुभव कर सकें। पूरे सफारी क्षेत्र में बैटरी चालित वाहनों से भ्रमण कराया जाएगा।

इस पर्यटन स्थल पर विदेशों और भारत के विविध वन्यजीव परिदृश्यों पर आधारित थीम जोन विकसित किए जाएंगे। प्राकृतिक घास के मैदान, वेटलैंड, चट्टानी क्षेत्र, स्थानीय वृक्षों से युक्त जंगल और जलाशयों को ऐसे तैयार किया जायेगा कि यहां रहने वाले जानवर कृत्रिम बाड़ों में नहीं बल्कि प्राकृतिक परिवेश में दिखाई दें। परियोजना में एशियाई शेर, बंगाल टाइगर, तेंदुआ, लकड़बग्घा, उड़ने वाली गिलहरी, घड़ियाल सहित कई प्रजातियों के लिए विशेष आवास बनाए जाएंगे।

गुफा की आकृति में तैयार होगा मुख्य प्रवेश द्वार

नाइट सफारी के मुख्य प्रवेश द्वार को गुफा की आकृति में तैयार किया जाएगा, जिसमें कृत्रिम झरनों और प्राकृतिक वातावरण का अनुभव मिलेगा। इसके अतिरिक्त संरक्षण प्रजनन केंद्र, वन्यजीव शिक्षा केंद्र, रिसर्च लैब, 7-डी थिएटर, ऑडिटोरियम, कैफेटेरिया और इंटरप्रिटेशन सेंटर जैसी सुविधाओं को भी विकसित किया जायेगा। यहां लगभग एक किलोमीटर लंबी सड़क, 200 वाहनों की पार्किंग और उच्चस्तरीय पर्यटक सुविधाएं विकसित की जाएंगी। बताया जाता है कि टिकट की संभावित कीमत 500 से 1000 रुपए के बीच रखी जा सकती है।

पर्यटन के साथ ही नहीं, संरक्षण और रिसर्च का भी केंद्र बनने का दावा

ज्ञात हो प्रदेश सरकार इस परियोजना को केवल पर्यटन परियोजना नहीं बल्कि संरक्षण आधारित आधुनिक वन्यजीव केंद्र के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जिससे वन्यजीव संरक्षण, वैज्ञानिक अनुसंधान, संरक्षण प्रजनन, पर्यावरण शिक्षा और इको-टूरिज्म को एक मंच पर लाया जा सके। कुकरैल रिजर्व फॉरेस्ट पहले से ही देश के सबसे महत्वपूर्ण घड़ियाल संरक्षण केंद्रों में से एक है। वर्ष 1975 में यहां स्थापित घड़ियाल पुनर्वास केंद्र ने पिछले पांच दशकों में हजारों घड़ियालों का संरक्षण और प्रजनन किया है। यहां तैयार किए गए घड़ियाल देश की विभिन्न नदियों में छोड़े जाते रहे हैं।