-चिकित्सक दिवस (1 जुलाई) पर विशेष प्रस्तुति
-होम्योपैथी में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम रोशन किया है डॉ गिरीश गुप्ता ने


सेहत टाइम्स
लखनऊ। कोई चलता पद चिन्हों पर, कोई पद चिन्ह बनाता है। कुछ ऐसा ही जज्बा रखते हैं गौरांग क्लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्योपैथिक रिसर्च के संस्थापक और मुख्य परामर्शदाता डॉ गिरीश गुप्ता। होम्योपैथिक दवाओं की वैज्ञानिकता को साक्ष्य सहित प्रस्तुत करना, प्राइवेट चिकित्सक होते हुए भी अपने संसाधन जुटाकर शोध कार्य करना, शोध कार्यों के लिए सरकारी पदों को अस्वीकार कर देना जैसी कई बातें ऐसी हैं जो उन्हें विशिष्ट बनाती हैं। चिकित्सक दिवस (1 जुलाई) के मौके पर ‘सेहत टाइम्स’ ने उनके बारे में कुछ खास जानकारियां जुटायीं और इस पर एक रिपोर्ट तैयार की है।
केजीएमसी के प्रोफेसर के तंज ने बनाया शोधार्थी
डॉ गिरीश द्वारा लिखी पुस्तक ‘एक्सपेरिमेंटल होम्योपैथी’ जिसका विमोचन जून 2022 में नयी दिल्ली में तत्कालीन केंद्रीय आयुष मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने किया था। यह पुस्तक डॉ गिरीश के शोध कार्यों पर प्रकाश डालती है। पुस्तक में बताया गया है कि यह वर्ष 1979 की बात है जब वे लखनऊ में नेशनल होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज में चौथे वर्ष के छात्र थे। एक दिन उन्होंने लखनऊ से प्रकाशित अंग्रेजी के समाचार पत्र ‘दि पायनियर’ में एक समाचार पढ़ा, जिसमें उस समय के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज (अब केजीएमयू) के मेडिसिन विभाग के एक नामचीन प्रोफेसर ने होम्योपैथी पर कमेन्ट्स करते हुए इसकी प्रामाणिकता पर सवाल उठाये थे। इन चिकित्सक ने होम्योपैथी को प्लेसिबो थेरेपी, एक्वा थेरेपी और साइको थेरेपी की संज्ञा दी थी। उन्होंने यह भी कहा था कि एक चुटकी साधारण नमक अगर हरिद्वार में गंगाजी में डालो तो वह कानपुर पहुंचकर 30 पोटेंसी और इलाहाबाद में 200 पोटेंसी हो जायेगा। इसके अलावा भी इन चिकित्सक ने होम्योपैथी को लेकर अनेक व्यंग्यात्मक टिप्पणियां की थीं।
जुनूनी मिजाज वाले डॉ गिरीश अखबार में छपी इस रिपोर्ट को पढ़कर आहत हुए, इसके बाद पहले तो बड़ी कोशिशों के बाद होम्योपैथी के सिद्धांतों की वैज्ञानिकता की व्याख्या दि पायनियर में ही छपवाने में सफल हुए, साथ ही होम्योपैथिक दवाओं की वैज्ञानिकता प्रमाणित करने के लिए राष्ट्रीय संस्थान नेशनल बॉटीनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट में निकोटियाना ग्लूटिनोसा Nicotiana glutinosa पौधे पर लगने वाले टोबेको मोसाइक वायरस tobacco mosaic virus पर शोध कर होम्योपैथिक दवाओं का असर साबित करते हुए दिखाया कि दवाएं प्रभावी हैं और इसे साइको थैरेपी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि पौधों में नर्वस सिस्टम नहीं होता है। उनकी यह रिसर्च भारत ही नहीं विदेशों में भी काफी चर्चित रही।
सरकारी नौकरी नहीं, रिसर्च का रास्ता चुना
उस समय डॉ गुप्ता सीडीआरआई में एसआरएफ के रूप में कार्य कर रहे थे, कार्य करते हुए तीन माह ही हुए थे कि एक ऐसी स्थिति आ गयी जिसने उनको असमंजस में डाल दिया। डॉ गुप्ता के पास होम्योपैथी डाइरेक्ट्रेट से नियुक्ति पत्र आया जिसमें उन्हें स्टेट डिस्पेंसरी में मेडिकल ऑफीसर के रूप चयनित होने की जानकारी दी गयी थी। अब डॉ गुप्ता के सामने दो रास्ते थे या तो रिसर्च वर्क छोड़ें या नौकरी का प्रस्ताव ठुकरा दें…उहापोह की स्थिति में डॉ गुप्ता विचार-विमर्श करने लगे और अंतत: फैसला लिया कि नौकरी को भूल जाना है, रिसर्च कार्य को ही करना है।
दूसरे चिकित्सकों को करते हैं मोटीवेट
डॉ गिरीश कई सम्मेलनों में युवा चिकित्सकों, छात्रों से कहते हैं कि अपने किये हुए कार्य का रिकॉर्ड रखिये, रिकॉर्ड से आपको स्टडी यानी शोध करने में मदद मिलेगी। वे कहते हैं कि डॉ हैनीमैन के बताये हुए सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक मरीज के शारीरिक और मन से जुड़े लक्षणों की हिस्ट्री लेकर मरीज के मिजाज के अनुसार एक दवा का चुनाव करें। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि शोध कार्यों से प्रसिद्धि पाये डॉ गिरीश सफलता को लेकर आत्मकेंद्रित न रहकर सभी चिकित्सकों से सफलता की नयी ऊंचाइयां छूने का आह्वान करते हैं। आपको बता दें कि डॉ गिरीश के गौरांग क्लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्योपैथिक रिसर्च में इंटर्न/चिकित्सकों द्वारा सेवाएं देने का क्रम बरकरार रहता है। यही नहीं खुले मन से रिसर्च पेपर्स में उनका नाम भी शामिल करते हैं।
इलाज को लेकर पारदर्शिता
कभी-कभी ऐसा होता है कि क्लीनिक पर पहली बार आने वाले मरीज की हिस्ट्री देखकर यदि उन्हें लगता है कि इस रोग के उपचार के परिणाम अच्छे आने की कोई उम्मीद नहीं है तो वह उसी समय मरीज से स्थिति क्लीयर करते हुए उचित सलाह देते हैं साथ ही उसकी पूरी फीस भी वापस कर देते हैं।
सही को सही, गलत को गलत कहने में परहेज नहीं
डॉ गिरीश गुप्ता का स्पष्ट मानना है कि होम्योपैथी को ऑल्टरनेटिव कहना सही नहीं है, वह तर्क देते हैं कि होम्योपैथी ऑल्टरनेटिव कैसे हो गयी, और अगर है, तो ऐलोपैथी भी ऑल्टरनेटिव है क्योंकि कुछ रोगों का इलाज होम्योपैथी में नहीं है, लेकिन ऐलोपैथी में है, और कुछ रोगों का उपचार ऐलोपैथी में नहीं है, लेकिन होम्योपैथी में है। उन्होंने कहा कि उपचार की सभी पद्धतियों में कुछ न कुछ खासियत है, इसे स्वीकार करना चाहिये। जिस रोग का जिस पद्धति में इलाज सर्वोत्तम हो, मरीज को उसी इलाज के लिए प्रेरित करना चाहिये। उनका मानना है कि सभी विधाओं के चिकित्सकों को आपस में समन्वय बनाये रखते हुए अपनी-अपनी विधा के गुणों से लोगों को स्वस्थ बनाये रखने में अपना योगदान देना चाहिये, यही योग्यता का सच्चा पैमाना है।

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