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होम्योपैथिक उपचार से पूर्ण रूप से ठीक हुआ गॉल ब्लेडर पॉलिप, ‘केस सीरीज’ स्टडी प्रकाशित

-जीसीसीएचआर के डॉ गिरीश गुप्ता के शोध कार्यों में शामिल हुई एक और उपलब्धि

-गॉल ब्लेडर पॉलिप के पूरी तरह से ठीक होने के साक्ष्यों के साथ की गयी पहली स्टडी

डॉ गिरीश गुप्ता

सेहत टाइम्स

लखनऊ। डॉक्टरी की पढ़ाई के समय से ही होम्योपैथी के दम को विज्ञान की कसौटी पर खरा साबित कर आलोचकों का मुंह बंद करने वाले लखनऊ के वरिष्ठ होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ गिरीश गुप्ता के शोधों की कामयाबी के गुलदस्ते में एक और पुष्प शामिल हो गया है। डॉ गिरीश गुप्ता द्वारा किये गये गॉल ब्लेडर पॉलिप पर शोध का प्रकाशन ‘सह-रुग्णताओं सहित पित्ताशय के पॉलिप का होम्योपैथिक उपचार : एक केस सीरीज़’ (Homeopathic Treatment of Gall Bladder Polyp with Comorbidities : A Case Series) शीर्षक से होम्योपैथिक जर्नल ‘एडवांसमेंट्स इन होम्योपैथिक रिसर्च’ Advancements in Homoeopathic Research के फरवरी 2026 से अप्रैल 2026 के अंक में किया गया है। ज्ञात हो गॉल ब्लेडर पॉलिप के पूरी तरह से ठीक होने के साक्ष्यों के साथ की गयी यह पहली स्टडी है।

डॉ गिरीश गुप्ता, जो यहां अलीगंज स्थित गौरांग क्लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्योपैथिक रिसर्च (जीसीसीएचआर) के संस्थापक व मुख्य परामर्शदाता हैं, से इस विषय पर ‘सेहत टाइम्स’ ने बात की। उन्होंने बताया कि गॉल ब्लैडर पॉलिप में पित्त की थैली में अंदर की दीवार पर बहुत छोटा दाना (सरसो के दाने की तरह) हो जाता है, इसमें दर्द नहीं होता है, न ही इसके कोई लक्षण दिखायी देते हैं, यही वजह है कि इनकी डायग्नोसिस ज्यादातर दूसरे सह रोगों के उपचार के लिए कराये गये अल्ट्रासाउन्ड मेें होती है। डॉ गुप्ता ने बताया कि आधुनिक चिकित्सा यानी ऐलोपैथी में चिकित्सक इसका एकमात्र इलाज सर्जरी बताते हैं।

उन्होंने बताया कि प्रकाशित इस केस सीरीज़ में चार मरीजों पर हुए सफल शोध के बारे में जानकारी दी गयी है। इस रोग को ठीक करने के लिए कोई एक दवा निर्धारित नहीं है, बल्कि होम्योपैथिक की मूल अवधारणा के अनुसार मरीजों के स्वभाव, पसंद-नापसंद जैसी व्यक्तिगत जानकारियों की विस्तार से ली गयी हिस्ट्री (holistic basis) के बाद दवा का निर्धारण किया गया। उन्होंने बताया कि जैसा कि मैंने बताया कि इस बीमारी का पता सह रोगों के उपचार के दौरान हुई जांच से चलता है, इन चारों रोगियों को भी अलग-अलग प्रकार के सह रोग थे। पहले केस में 26 वर्षीया अविवाहित महिला को पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस) व गर्भाशय ग्रीवा में नेबोथियन सिस्ट की शिकायत थी। दूसरे केस में 25 वर्षीया विवाहित महिला (दो बच्चों की मां) को मांसपेशियों में दर्द और हाईपोथायरॉयडिज़्म की शिकायत थी, तीसरे केस में 41 वर्षीया विवाहित को यूट्राइन फाइब्रॉयड की शिकायत थी तथा चौथे केस में 22 वर्षीया विवाहित महिला को जीबीपी, हेमरेजिक ओवेरियन सिस्ट और टीनिया इन्फेक्शन की ​शिकायत थी।

डॉ गुप्ता के अनुसार चारों मरीजों का समग्र दृष्टिकोण (holistic basis) के आधार पर चुनी गई होम्योपैथिक दवाओं से उपचार किया गया। इलाज के बाद, क्लिनिकल और अल्ट्रासोनोग्राफिक सबूतों के आधार पर उनकी स्थिति पर नज़र रखी गई। हर फॉलो-अप पर मरीज़ का मूल्यांकन करने के लिए ‘दैनिक जीवन पर प्रभाव के संबंध में परिणाम’ (ORIDL) नामक मरीज़-रेटेड टूल का उपयोग किया गया। इसके अलावा, होम्योपैथिक इलाज से गॉल ब्लैडर पॉलिप के गायब होने में होम्योपैथी की सकारात्मक भूमिका (causal attribution) सुनिश्चित करने के लिए ‘होम्योपैथी के लिए संशोधित नारंजो मानदंड’ (MONARCH) स्कोरिंग की गई।

उन्होंने बताया कि चारों मरीज़ों में गॉल ब्लैडर पॉलिप पूरी तरह से ठीक हो गया, इसकी पुष्टि अल्ट्रासाउन्ड रिपोर्ट से होती है। उन्होंने बताया कि इलाज के बाद, चारों मामलों में व्यक्तिपरक और वस्तुनिष्ठ परिवर्तनों के लिए ORIDL स्कोर +4 आया, जिसका अर्थ है कि मरीज़ दोनों ही पहलुओं में अपनी सामान्य स्थिति में लौट आए थे। इसी प्रकार ‘होम्योपैथी के लिए संशोधित नारंजो मानदंड’ (MONARCH) स्कोरिंग चारों मामलों में +8 आई, जो होम्योपैथी की सकारात्मक भूमिका को दर्शाती है।