-एनोरेक्सिया नर्वोसा और बुलिमिया नर्वोसा दोनों की बीमारियों की दवायें होम्योपैथिक में मौजूद
-ईटिंग डिसऑर्डर अवेयरनेस वीक पर डॉ गौरांग गुप्ता से विशेष वार्ता

सेहत टाइम्स
लखनऊ। चिन्ता एक ऐसी चीज है जो बच्चों से लेकर वयस्कों तक को अपनी चपेट में लिये रहती है, फर्क सिर्फ इतना है कि चिन्ता की वजहें अलग-अलग उम्र में अलग-अलग होती हैं। इन चिंताओं के चलते कुछ लोग ईटिंग डिस्ऑर्डर यानी खानपान सम्बन्धी विकार का शिकार हो जाते हैं। ईटिंग डिसऑर्डर अवेयरनेस वीक 2026 (EDAW 2026) 23 फरवरी से 1 मार्च 2026 तक मनाया जा रहा है, जिसका मुख्य उद्देश्य खाने संबंधी विकारों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। इस खास अवसर पर ‘सेहत टाइम्स’ ने गौरांग क्लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्योपैथिक रिसर्च के परामर्शदाता डॉ गौरांग गुप्ता से विशेष वार्ता की।
डॉ गौरांग ने बताया कि ईटिंग डिसऑर्डर दो प्रकार का होता है पहला एनोरेक्सिया नर्वोसा (anorexia nervosa) और दूसरा बुलिमिया नर्वोसा (bulimia nervosa) भारत में एनोरेक्सिया नर्वोंसा ज्यादा होता है, इस बीमारी में गहरी चिंता में डूबे व्यक्ति को भूख नहीं लगती है, कुछ खाने का मन नहीं करता हे, खाने के प्रति रुचि समाप्त हो जाती है, यहां तक कि जो चीज व्यक्ति को पसंद होती है वे भी खाने की इच्छा नहीं होती है।
इसे सबसे कॉमन देखा गया है बच्चों में, जो बच्चे पढ़ाई के प्रति गंभीर होते हैं, जो अच्छे अंक प्राप्त करते हैं, ऐसे कई बच्चों में परीक्षाएं नजदीक आने पर चिन्ता ज्यादा बढ़ जाती है, जो टॉपर होते हैं, उन पर टॉप पर बने रहने का प्रेशर होता है, चिन्ता के चलते उनका खानपान कम हो जाता है, उन्हें लगता है कि जितना समय हम खाने में लगायेंगे वह समय बर्बाद हो जायेगा। इसी तरह बहुत से लोग होते हैं जो इंटरव्यू के लिए जाने पर ज्यादा ही चिंतित रहते हैं। इसके अतिरिक्त जैसे आजकल वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर क्लोसिंग चल रही है, ऐसे में लेखा कार्य से जुड़े नौकरीपेशा लोगों का टेंशन बढ़ जाता है, कई बार माता-पिता, जो अपने बच्चों का विवाह करने जा रहे होते हैं, उनमें विवाह होने तक चिंता व्याप्त हो जाती है, कि सब कुछ अच्छे से निपट जाये।
परफॉर्मेंस अच्छी बनाये रखने का दबाव भी करता है चिंतित
डॉ गौरांग ने बताया कि उनके पास ऐसे मरीज भी आते हैं जो प्राइवेट सेक्टर में अच्छी नौकरी और अच्छे पैकेज पर कार्य करते हैं लेकिन उन पर खुद की परफॉर्मेंस अच्छी बनाये रखने का दबाव होता है, कहीं टार्गेट पूरा करने का दबाव रहता है, दरअसल इनकी समस्या यह होती है कि इस परफॉर्मेंस को अगर बनाये नहीं रखा तो कहीं नौकरी न चली जाये।
डॉ गौरांग ने कहा कि ये सब वे कारण हैं जो बहुत सामान्य हैं, और लगभग सभी के साथ होते हैं लेकिन जिनका नर्वस सिस्टम कमजोर होता है, उन पर यह समस्या रोग के रूप में हावी हो जाती है।
उन्होंने कहा कि दूसरे टाइप की समस्या बुलिमिया नर्वोसा (bulimia nervosa) के बारे में बात करें तो भारत में यह कम पाया जाता है। इसमें भी कारण तो वही होते हैं जो एनोरेक्सिया नर्वोसा में होते हैं, लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि बुलिमिया नर्वोसा में व्यक्ति खाना कम नहीं करता है बल्कि ज्यादा खाने लगता है। चिंता के चलते उनको कुछ-कुछ समय बाद कुछ न कुछ खाने को मन करता है, कोई भी काम कर रहे हैं उसके बीच में भी ये लोग चिप्स, मूंगफली, फिंगर चिप्स, दालमोठ, आइसक्रीम, चॉकलेट, टॉफी जैसी चीजें खाते रहते हैं।
डॉ गौरांग ने बताया कि यहां तक कि एक ऐसी भी स्थिति हो जाती है कि यदि व्यक्ति अपनी फिगर को लेकर गंभीर है, तो वह यह तो चाहता है कि मेरा वजन न बढ़े, मेरा पेट न निकले आदि-आदि लेकिन चिंता के चलते ज्यादा खाने की आदत से भी जूझ रहा होता है तो वह बीच का रास्ता निकालने का प्रयास करता है, यानी अपने मन की चीजें खा तो लीं लेकिन बाद में जब अफसोस हुआ कि इन चीजों से मेरा वजन बढ़ जायेगा तो वह पचने से पूर्व मुंह में उंगली डालकर या कोई चीज खाकर उल्टी जैसे तरीकों से इसे शरीर के अंदर से बाहर निकालने की कोशिश करता है।
डॉ गौरांग बताते हैं कि ऐसे लोगों और उनके परिजनों से मुझे यही बताना है कि होम्योपैथिक में इन दोनों ही बीमारियों को दूर करने की दवायें हैं। उन्होंने कहा कि जैसा कि साफ है इन दोनों बीमारियों का कारण चिन्ता होना है, और होम्योपैथी में मन को प्रभावित करने वाली स्थितियों की बहुत ही सटीक दवायें हैं, बस जरूरत होती है व्यक्ति विशेष के लिए उचित दवा का चुनाव करने की। होम्योपैथी में व्यक्ति के उपचार में उसके शारीरिक लक्षणों के साथ उसकी मन:स्थिति, उसकी पसंद-नापसंद, उसकी प्रकृति को गहराई से समझ कर ही उस रोगी के लिए दवा का चयन किया जाता है, यानी कई लोगों को रोग एक जैसा हो सकता है लेकिन उन सभी के लिए दवा एक हो, यह आवश्यक नहीं है।

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