Wednesday , October 5 2022

सस्ती आयुष चिकित्सा पद्धतियां क्यों नहीं बनतीं चुनावी मुद्दा

लखनऊ। राजनीतिक दलों के लिए  ऐलोपैथी के मुकाबले सस्ती आयुष चिकित्सा पद्धतियां चुनाव का मुद्दा नहीं बन पाती हैं जबकि यदि इन पद्धतियों पर सरकारों द्वारा ध्यान दे दिया जाये तो आम आदमी को इलाज मिलने में काफी सुविधा हो जायेगी क्योंकि सरकार द्वारा दी जा रही ऐलोपैथी चिकित्सा सभी के लिए पूरी नहीं पड़ पाती है।
‘सेहत टाइम्स’ से एक खास मुलाकात में यह विचार केन्द्रीय होम्योपैथिक परिषद के सदस्य डॉ अनुरुद्ध वर्मा ने व्यक्त किये। डॉ वर्मा ने बताया कि देश को सस्ती, सरल और निरापद तथा जनता की पहुंच वाली चिकित्सा सुविधाओं की आवश्यकता है क्योंकि देश की अधिकांश जनता गरीब है और गरीब व्यक्ति महंगी ऐलोपैथी चिकित्सा का खर्च वहन नहीं कर सकता है। डॉ वर्मा ने बताया कि सरकारें ऐलोपैथी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं करा पा रही हैं लेकिन इन्हीं सरकारों को चाहिये कि आयुष पद्धतियों पर ध्यान देकर कम बजट में भी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध करायी जा सकती हैं।
डॉ वर्मा कहते हैं कि राजनीतिक दल जब चुनाव के लिए घोषणा पत्र तैयार करते हैं तो उसमें अन्य मुद्दे तो होते हैं लेकिन जन स्वास्थ्य के सरोकार से जुड़ी आयुष पद्धतियां मुद्दा नहीं बन पातीं।  डॉ वर्मा बताते हैं कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े प्रदेश की ही अगर बात की जाये तो आयुर्वेद के लगभग ३००० से ऊपर चिकित्सालय हैं। इसी प्रकार करीब तीन-चार सौ यूनानी के चिकित्सालय है और करीब १६०० होम्योपैथी के चिकित्सालय हैं। इन चिकित्सालयों में ज्यादातर के अपने भवन नहीं हैं और ये किरायेे के भवनों में चल रहे हैं, ज्यादातर चिकित्सालयों में चिकित्सकों और दवाओं का अभाव है। डॉ वर्मा ने बताया कि पिछले सात सालों से आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी चिकित्सालयों की स्थापना नहीं हुई है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में इन अस्पतालों की कोई भूमिका नहीं है। इन चिकित्सा पद्धतियों के विकास के लिए राज्य सरकार की कोई विकास नीति नहीं है। ये चिकित्सा पद्धतियां राज्य सरकार की उपेक्षा का शिकार हैं। डॉ वर्मा ने बताया कि राज्य में सात होम्योपैथी के मेडिकल कॉलेज हैं जो शिक्षकों, संसाधनों के अभाव से जूझ रहे हैं, इनमें शिक्षा और प्रशिक्षण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। होम्योपैथी अस्पतालों की बात की जाये तो करीब ६०० अस्पतालों में चिकित्सक नहीं हैं जबकि ३०० अस्पतालों में फार्मासिस्ट नहीं हैं। डॉ वर्मा का कहना है कि अगर राजनीतिक दलों द्वारा थोड़ा सा भी ध्यान दिया जाये तो जनता को इन सस्ती और कारगर पद्धतियों का फायदा मिल सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

ten + eleven =

Time limit is exhausted. Please reload the CAPTCHA.