Thursday , December 2 2021

छोटी बहू

जीवन जीने की कला सिखाती कहानी – 22 

डॉ भूपेंद्र सिंह

प्रेरणादायक प्रसंग/कहानियों का इतिहास बहुत पुराना है, अच्‍छे विचारों को जेहन में गहरे से उतारने की कला के रूप में इन कहानियों की बड़ी भूमिका है। बचपन में दादा-दादी व अन्‍य बुजुर्ग बच्‍चों को कहानी-कहानी में ही जीवन जीने का ऐसा सलीका बता देते थे, जो बड़े होने पर भी आपको प्रेरणा देता रहता है। किंग जॉर्ज चिकित्‍सा विश्‍वविद्यालय (केजीएमयू) के वृद्धावस्‍था मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ भूपेन्‍द्र सिंह के माध्‍यम से ‘सेहत टाइम्‍स’ अपने पाठकों तक मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य में सहायक ऐसे प्रसंग/कहानियां पहुंचाने का प्रयास कर रहा है…

प्रस्‍तुत है 22वीं कहानी – छोटी बहू

बहुत पहले एक किसान के परिवार में किसान के दो बेटे थे। बड़े बेटे की बहू ज्यादा काम नहीं करती थी, घर में रहती थी।

कुछ साल बाद छोटे बेटे की शादी हुई और छोटी बहू घर आयी। छोटी बहू सबके साथ खेत में काम करने जाती थी।

एक साल बाद सब ने सोचा अब बारी-बारी से एक-एक साल दोनों बहुएं खेत में काम करने जाएंगी। अब छोटी बहू घर में रहेगी, बड़ी बहु हमारे साथ खेत में काम करने जाएगी। उसे यह अच्छा तो नहीं लगा, पर सबकी बात माननी पड़ी।

बड़ी बहू इतने साल घर में आराम से रहती थी। सबके जाने के बाद ज्यादा काम नहीं करती थी। कामचलाऊ काम करके आराम करती थी। दिन भर में बाहर जो भी खाने-पीने की चीजें बिकने आतीं, ले-ले कर खाती रहती थी। शाम को बहुत थक गई ऐसा दिखाती और जैसे-तैसे खाना बना कर रख देती, क्योंकि उसका पेट तो भरा रहता था।

 

लेकिन अब जब खेत में जाकर काम करती तो उसे खेत में मेहनत करना पसंद नहीं आ रहा था। इधर जब छोटी बहू घर में रहने लगी, तो उसने सब तरफ को घूमघूम कर देखा ।

एक कमरे में धान का भूसा भरा था। उसने देखा कि भूसे में बहुत से चावल के टुकड़े (कनकी) थे। वो भूसे को सूप में पछिन के (फटककर) कनकी निकाल लायी।

बाहर दही बेचने वाला आया तो धान के बदले उसने दही ले लिया, दही वाले ने कहा – बड़ी बहू तो दूध, घी भी लेती थी (क्योंकि वह लेकर खुद खा-पी लेती थी)। छोटी बहू ने अभी जरूरत नहीं है कह कर उसे जाने को कहा।

इसी प्रकार दिन भर सब्जी वाले, मिठाईवाले आदि आते रहे। सब आवाज़ देकर यही कहते कि बड़ी बहू तो रोज़ हमसे सामान लेती थीं।

अब छोटी बहु को पता चला कि दीदी तो सामान लेती थीं, लेकिन उनके आने से पहले ही खा-पीकर खत्म कर देती थीं।

उन सबके लिए जैसा-तैसा खाना बनाकर तबीयत ठीक न होने का बहाना बनाकर सो जाती थी।

छोटी बहू ने उनसे आवश्यकतानुसार सामान ले लिया। शाम को कनकी में दही डालकर कैथला (छत्तीसगढ़ का कनकी और दही से बना खिचड़ी जैसा व्यंजन) बनाया।

जब सब आये तो प्रेम से परोस कर खिलाया। सब खुश हो गए। उसके ससुर तो कहने लगे कितने साल बाद मैं कैथला खा रहा हूं। तुम्हारी सास बनाती थीं।

छोटी बहू मुस्कुराती रही। दिन भर हुई कोई भी बात किसी को नहीं बताई। बड़ी बहू के बारे में किसी से कुछ नहीं कहा।

दूसरे दिन उसने नाश्ते में कनकी को पीस कर रोटी बनायी।

वह रोज सबके जाने के बाद कुछ न कुछ काम करती रहती थी। घर को धीरे-धीरे लीप पोतकर चमका दिया।

कोठियों में धान भरा था। उसने साल भर के लिए जरूरत के हिसाब से धान रख कर बाकी को सबकी सलाह से बिकवा कर पैसा जमा करवा लिया। वे उस पैसे से घर के लिए जरूरी सामान ले लेते थे।

छोटी बहू रोज थोड़े-थोड़े भूसे से कनकी निकालकर नए-नए व्यंजन बनाती थी। सालों के भूसा एकत्र था। सब बड़े चाव से खाते और प्रशंसा करते।

बड़ी बहू को अच्छा तो नहीं लगता था, लेकिन वह कुछ भी कह नहीं पाती थी।

अड़ोसी-पड़ोसी भी छोटी बहु की तारीफ़ करते। अब वो बातें करते कि बड़ी बहू दिन भर यहां-वहां घूमती रहती थी। तरह-तरह की चीजें ले लेकर खाती और आराम करती थी।

इस प्रकार धीरे-धीरे छोटी बहू ने घर की व्यवस्था सही कर दी।

अपने ससुर जी के लिए धान के बेचने से मिले पैसे से एक दुकान खुलवा दी। उनकी उम्र भी खेत में मेहनत करने की नहीं थी। एक दुधारू गाय ले ली।

एक साल बीत गया अब बड़ी बहू के घर में रहने की बारी आयी। वह बहुत खुश थी, लेकिन सबने उसे खेत में ही काम करने को कहा और छोटी बहू को घर संभालने को।

बड़ी बहू को अब तक अपनी ग़लती का अहसास हो गया था। वह सबसे माफ़ी मांगने लगी। सबने उसे माफ़ कर दिया और दोनों बहुएं मिल-जुल कर घर और खेत का काम करने लगीं।

छोटी बहु ने अपनी मेहनत और सूझबूझ से घर को स्वर्ग बना दिया।