Thursday , June 30 2022

फेफड़े के एक्स-रे में दिखता हर धब्बा टीबी नहीं होता : डॉ. सूर्यकांत

-प्रदूषण के चलते प्रतिवर्ष बढ़ रहे फेफड़ों के कैंसर के मरीज

-विश्‍व लंग कैंसर दिवस पर केजीएमयू ने आयोजित की संगोष्‍ठी

सेहत टाइम्‍स ब्‍यूरो

लखनऊ। विगत वर्षों में बढ़ता हुआ प्रदूषण, कीटनाशक दवाओं का अत्यधिक उपयोग एवं अन्य मुख्य कारणों में धूम्रपान, घरों के चूल्हों से निकला हुआ धुआं व परोक्ष धूम्रपान के चलते फेफड़े के कैंसर के मामले प्रतिवर्ष बढ़ते जा रहे हैं।

यह बात आज विश्व लंग कैंसर दिवस पर किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग ने वर्चुअल संगोष्ठी में कही गयी। इस संगोष्‍ठी में देश के प्रमुख लंग कैंसर विशेषज्ञों द्वारा विगत वर्षों में लंग कैंसर की जांच एवं इलाज में हुए विकास के बारे में विस्तार से बताया गया।

इस कार्यक्रम का आयोजन रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग, यू.पी.चैप्टर इन्डियन चेस्ट सोसायटी, आईएमए- एकादमी ऑफ़ मेडिकल स्पेशियलिटीज एवं इंटरनेशनल एसोसियेशन फॉर द स्टडीज ऑफ़ लंग कैंसर के तत्वावधान में सफलतापूर्वक लंग कैंसर रोग के विशेषज्ञों की उपस्थिति में वर्चुअल रूप से संपन्न हुआ। इस अवसर पर इन्डियन सोसायटी ऑफ़ लंग कैंसर के अध्यक्ष डॉ. डी.बेहरा मुख्य अतिथि और वक्ता रहे।

केजीएमयू रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष तथा आईएमए- एकादमी ऑफ़ मेडिकल स्पेशियलिटीज के नेशनल वाइस चेयरमैन डॉ. सूर्यकांत ने बताया कि देश में लंग कैंसर के मरीजों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। देश में लगभग एक लाख लंग कैंसर के मरीज हैं जिनमें पुरुषों की संख्या लगभग 70 हजार एवं महिलाओं की संख्या 30 हजार है, जिसका मुख्य कारण विगत वर्षों में बढ़ता हुआ प्रदूषण, कीटनाशक दवाओं का अत्यधिक उपयोग एवं अन्य मुख्य कारणों में धूम्रपान, घरों के चूल्हों से निकला हुआ धुआं व परोक्ष धूम्रपान (धूम्रपान करने वाले लोगों के आस-पास रहने वाले लोगों में जो धुआं का सेवन होता है, उसे परोक्ष धूम्रपान कहते हैं। आम जनमानस में लंग कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए लंग कैंसर के लक्षणों के बारे में बताया जिसमें लगातार खांसी आना, सांस फूलना, खांसी के साथ खून का आना, सीने में दर्द, वजन कम होना और बार-बार लंग इन्फेक्शन होना। डा. सूर्य कान्त ने बताया कि लंग कैंसर के लक्षण और टीबी के लक्षण मिलते जुलते हैं।  अतः कई बार प्रारम्भिक अवस्था में ऐसे रोगियों को एक्स-रे में धब्बे के आधार पर टीबी का इलाज दे दिया जाता है। इसलिए डा. सूर्य कान्त पिछले 25 सालों से लगातार लंग कैंसर के जागरूकता कार्यक्रमों में कहते आये हैं कि जैसे – हर चमकती चीज सोना नहीं होती, वैसे ही एक्स-रे का हर धब्बा टीबी नहीं होता|” अतः लंग कैंसर की जाँच के लिए केवल एक्स-रे पर्याप्त नहीं है इसकी जांच के लिए सीटी-स्कैन, ब्रोंकोस्कोपी, बायोप्सी एवं हिस्टोपैथोलोजिकल एक्सामिनेशन कराने की भी जरूरत पड़ती है।

इस मौके पर डा. बेहरा ने बताया- लंग कैंसर महिलाओं एवं पुरुषों में मुख्य 5 प्रकारों में से एक है। उन्होंने बताया- भारत में स्क्वैमास सेल लंग कार्सिनोमा कैंसर मरीजों की संख्या कम हो रही है, वहीं दूसरी तरफ एडिनोकार्सिनोमा लंग कैंसर के मरीजों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। इसका उपचार 4 तरीकों से किया जाता है – सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी और इम्युनोथेरेपी। उन्होंने लंग कैंसर के इलाज की प्रमुख समस्या के बारे में बताया कि 90 फीसद रोगी कैंसर की अंतिम अवस्था में चिकित्सकों के पास पहुंचते हैं जिससे उनका इलाज संभव नहीं होता है |

ज्ञात हो कि रेस्परेटरी मेडिसिन विभाग अपना 75 वां प्लेटिनम जुबली स्थापना वर्ष (1946 में स्थापित ) मना रहा है।  अतः इस अवसर पर  रेस्परेटरी मेडिसिन विभाग में 75 शैक्षणिक एवं सामाजिक कार्यक्रम आयोजित करने का निश्चय किया गया है | यह वर्चुअल संगोष्ठी भी इस श्रृंखला की एक कड़ी है | आयोजन की अध्यक्षता डा. राजेंद्र प्रसाद एवं डा.राजीव गर्ग ने की एवं आयोजन सचिव डा. अजय वर्मा ने धन्यवाद प्रस्तुत किया | आयोजन उपसचिव डा. ज्योति बाजपेयी ने संगोष्ठी का समापन किया | डा. अंकित कुमार एवं रेस्परेटरी मेडिसिन विभाग, के जीएमयू लखनऊ के सभी संकाय सदस्यों और रेजिडेंट चिकित्सकों ने प्रतिभाग किया |

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