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ब्रिज कोर्स के माध्‍यम से ऐलोपैथ प्रैक्टिस की अनुमति के प्रस्‍ताव पर आईएमए भड़़की

कहा, ऐसा प्रस्‍ताव लागू हुआ तो होगा देशव्‍यापी विरोध

नई दिल्ली /लखनऊ। ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी से निपटने के लिए एक ब्रिज कोर्स के माध्यम से गैर एमबीबीएस को आधुनिक चिकित्सा पद्धति की अनुमति देने के सरकार के प्रस्ताव का इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने कड़ा विरोध किया है। इस प्रस्ताव को 9 अप्रैल को प्रधान मंत्री कार्यालय (पीएमओ) से मंजूरी मिल चुकी है। एसोसिएशन ने चेतावनी दी है कि अगर इस प्रस्‍ताव को लागू करने की कोशिश हुई तो देशव्‍यापी विरोध किया जायेगा।

 

डॉ शान्तनु सेन

आईएमए के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष डॉ शान्‍तनु सेन ने आरोप लगाया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में गैप डॉक्टरों को भरने के लिए ब्रिज कोर्स और मिड-लेवल चिकित्सकों का विचार एक मिथक है। उनका कहना है कि “देश में डॉक्टरों की कमी नहीं है। 63,250 एमबीबीएस स्नातक भारत के 494 मेडिकल कॉलेजों से निकलते हैं। भारत में केवल 23,729 पोस्ट ग्रेजुएट सीटें हैं। तथ्य यह है कि सरकार के पास बाकी को अवशोषित करने की क्षमता नहीं है, हर साल युवा मेडिकल स्नातकों के बीच बेरोजगारी एक बड़ी चिंता का कारण है।

 

डॉ आरवी अशोकन

एसोसिएशन के राष्‍ट्रीय महासचिव डॉ आरवी अशोकन का कहना है कि जब सरकार ने आयुष चिकित्सकों को आधुनिक चिकित्सा पद्धति का अभ्यास करने का प्रस्ताव दिया, तो राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक 2017 के तहत आईएमए और अन्य डॉक्टरों का एक समान विरोध सामने आया। “मध्यम स्तर के चिकित्सकों के माध्यम से नागरिकों को ‘हाफ बेक्ड’ चिकित्सा देखभाल प्रदान करने के सरकार के प्रयास खतरनाक हैं। उन्‍होंने कहा कि सरकार को 1,50,000 वेलनेस सेंटरों में एमबीबीएस ग्रेजुएट्स को स्थायी पोस्टिंग देनी चाहिए। एडहॉक पोस्टिंग अस्वीकार्य है। यह इन असहाय युवा स्नातकों के क्रूर शोषण के अलावा कुछ भी नहीं है,

 

डॉ अशोकन का कहना है कि “चिकित्सा के लिए प्रत्येक संबद्ध पेशे की एक विशिष्ट पहचान है और एक विशिष्ट उद्देश्य है। दंत चिकित्सक, नर्स, ऑप्टोमेट्रिस्ट और फार्मासिस्ट की भूमिका है और उन्हें संबंधित क्षेत्रों में अपनी सेवाओं में योगदान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि छह महीने के ब्रिज कोर्स के जरिए मिड लेवल के मेडिकल प्रैक्टिशनर्स को प्रैक्टिस का अधिकार देने के लिए मरीज की सुरक्षा और मरीज की देखभाल के प्रति उदासीनता बरती जा रही है।

 

डॉ अशोकन के अनुसार आईएमए ने यह भी सवाल उठाया है कि हर साल बड़ी संख्या में एमबीबीएस स्नातक जिन्हें स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया जाता है, उन्हें सरकार द्वारा रोजगार नहीं दिया जाता है। “बजट की बाधाओं के कारण नए पदों, नए सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) का पैदा न किया जाना एकमात्र कारण है। जीडीपी के 1.1% को लगातार सरकारों द्वारा खर्च के रूप में स्थिर करना, देश में हेल्थ केयर डिलीवरी की दयनीय स्थिति का एकमात्र कारण है।

 

डॉ ए मराठांडा पिल्‍लई

आईएमए एक्‍शन कमेटी के अध्‍यक्ष डॉ ए मराठांडा पिल्‍लई ने कहा कि भोर कमेटी 1946 में ही मिड लेवल मेडिकल प्रैक्टिशनर्स का प्रस्‍ताव ठुकरा चुकी है। कमेटी ने प्रैक्टिस करने के लिए एमबीबीएस को ही बेसिक लेवल माना है। उन्‍होंने चेतावनी दी कि अगर मिड लेवल प्रैक्टिशनर्स या ब्रिज कोर्स के जरिये एमबीबीएस का दर्जा देने का प्रस्‍ताव लागू करने की कोशिश हुई तो इसका देशव्‍यापी विरोध किया जायेगा। उन्‍होंने कहा कि स्‍वास्‍थ्‍य की देखभाल के लिए ऐसा दृष्टिकोण समाप्‍त होना चाहिये।

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