-मन का सीधा प्रभाव पड़ता है शरीर पर, कई प्रकार की शारीरिक बीमारियों की वजह होती है मन:स्थिति

सेहत टाइम्स
लखनऊ। विभिन्न कारणों के चलते लोग मानसिक बीमारियों के शिकार होते जा रहे हैं, जिससे उनकी दिनचर्या, कमाई, शिक्षा सबकुछ प्रभावित हो रहा है, भारत में सर्वाधिक पाई जाने वाली मानसिक बीमारियों में अवसाद (डिप्रेशन) और चिंता विकार शामिल हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष अवसाद के 5.6 करोड़ तथा चिंता विकारों के 3.8 करोड़ मामले सामने आते हैं। बढ़ते मानसिक रोगों के आंकड़े जहां हमें परेशान करते हैं, वहीं यह जानकारी हमें सुकून भी देती है कि होम्योपैथिक दवाओं के सेवन से इनसे निपटना संभव है। यहां प्रस्तुत है देश-दुनिया में अपने विभिन्न शोधों के माध्यम से विशिष्ट पहचान बनाने वाले ख्यातिलब्ध होम्योपैथिक चिकित्सक, गौरांग क्लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्योपैथिक रिसर्च (जीसीसीएचआर) के संस्थापक डॉ गिरीश गुप्ता से विशेष बातचीत।
डॉ गिरीश ने बताया कि मस्तिष्क हमारे शरीर का संचालन करता है। कई बार छोटी-बड़ी बातें मूड को प्रभावित करने का कारण बन जाती हैं, ये बातें अगर लम्बे समय तक मस्तिष्क में बैठ जायें तो अवसाद, दुष्चिंता जैसी मानसिक बीमारियों का रूप ले लेती हैं। गुस्सा, घबराहट, अवसाद, चिंता, किसी बात से आघात पहुंचना, डर लगना, परेशान करने वाले सपने देखना, दबी हुई इच्छा रह जाना, प्रताड़ना सहना, प्यार में धोखा खाना, भ्रम जैसे अनेक कारण हैं जो मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। इन परेशानियों से ग्रस्त लोगों के लिए होम्योपैथी किसी वरदान से कम नहीं है।
डॉ गिरीश गुप्ता ने बताया कि स्थितियां जहां व्यक्ति को मानसिक रूप से बीमार बनाती हैं वहीं कई बार ये शरीर के दूसरे अंगों में होने वाली व्याधियों का कारण बन जाती हैं। उदाहरण के लिए महिलाओं में होने वाले यूट्राइन फायब्रॉयड, ओवेरियन सिस्ट, पॉलिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम, ब्रेस्ट लीजन्स, नेबोथियन सिस्ट, सर्वाइकल पॉलिप जैसे रोगों का कारण भी मन:स्थिति से जुड़ा है।
उन्होंने बताया कि इसी प्रकार अनेक प्रकार के त्वचा रोगों जैसे विटिलिगो यानी ल्यूकोडर्मा (सफेद दाग), सोरियासिस (परतदार चकत्ते), एलोपीशिया एरियटा (बाल झड़ना), लाइकिन प्लेनस (बैंगनी कलर के दाने) आदि के कारणों में भी मन:स्थिति की भूमिका अहम है।
डॉ गिरीश बताते हैं कि इन सभी रोगों का सफल इलाज होम्योपैथिक दवाओं से किया जाना संभव है। यहां यह बात ध्यान में रखना जरूरी है कि सभी रोगियों की प्रकृति एक सी हो, यह संभव नहीं है। दवा का चुनाव करने से पूर्व जब मरीज की हिस्ट्री ली जाती है तो उसकी शारीरिक दिक्कतों के साथ उसके मन पर प्रभाव डालने वाले लक्षणों के बारे में भी पूछा जाता है। होम्योपैथिक उपचार का मूल सिद्धांत कहता है कि रोगी विशेष की प्रकृति के साथ शारीरिक और मानसिक दोनों स्थितियों को केंद्रबिन्दु में रखकर ही सटीक दवा का चुनाव करना चाहिये।

डॉ गिरीश गुप्ता ने लिखी हैं तीन पुस्तकें
ज्ञात हो डॉ गिरीश गुप्ता द्वारा विभिन्न प्रकार के रोगों के होम्योपैथिक उपचार के लिए किये गये शोधों को देश-विदेश के प्रतिष्ठित जर्नलों में प्रकाशित किया जा चुका है। इलाज से पूर्व और इलाज के पश्चात की जांच रिपोर्ट जैसे वैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ मरीजों का रिकॉर्ड रखने वाले डॉ गिरीश ने स्त्री रोगों पर Evidence based Research of Homoeopathy in Gynaecology, त्वचा रोगों पर Evidence-based Research of Homoeopathy in Dermatology किताबें लिखी हैं। इसके अतिरिक्त एक किताब उन्होंने Experimental Homoeopathy लिखी है, यह होम्योपैथिक जगत में अपनी तरह की पहली पुस्तक है जो विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित डॉ. गिरीश गुप्ता के विभिन्न प्रायोगिक शोध पत्रों का संकलन है। यह पुस्तक मुख्यतः दो खंडों, वायरोलॉजी और माइकोलॉजी में विभाजित है। इस पुस्तक में दिये गये शोधों के प्रायोगिक कार्य डॉ गिरीश गुुप्ता द्वारा राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई), लखनऊ, केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (सीडीआरआई), लखनऊ और राष्ट्रीय संरक्षण अनुसंधान प्रयोगशाला (एनआरएलसी), लखनऊ के वैज्ञानिकों की देखरेख में किये गये हैं।



