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रोग, जिनकी अनदेखी से चली जाती हैं हजारों जानें या हो जाती है दिव्यांगता

-विश्व एनटीडी दिवस पर अनेक जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा

लखनऊ। विश्व एनटीडी दिवस 30 जनवरी के मौके पर उत्तर प्रदेश में जागरूकता संबंधी अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। एनटीडी (नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिज़ीज़ेज़) वे बीमारियां होती हैं जिनका इलाज संभव है लेकिन फिर भी इलाज न किए जाने के कारण भारत में प्रतिवर्ष हजारों लोग लोगों की या तो मृत्यु हो जाती है या वे दिव्यांग हो जाते हैं।

राज्य के वेक्टर बोर्न डिज़ीज़ेज़ अधिकारी डॉ. वी.पी.सिंह के अनुसार विश्व एनटीडी दिवस पर बच्चों द्वारा निबन्ध लेखन, पेन्टिंग प्रतियोगिता , स्वयं सहायता समूह की महिलाओं द्वारा जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन, विभिन्न मीडिया संस्थाओं द्वारा विभिन्न प्रकार के जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि एनटीडी में लिम्फैटिक फाइलेरिया (हाथीपांव), विसेरल लीशमैनियासिस (कालाज़ार), लेप्रोसी (कुष्ठरोग), डेंगू, चिकुनगुनिया, सर्पदंश, रेबीज़ मिट्टी संचारित कृमिरोग   शामिल होते हैं, जिनकी रोकथाम संभव है।

उन्होंने बताया कि भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन के एनटीडी रोडमैप (2021-2030) के अनुसार एनटीडी से मुकाबले के लिए अब पूरी तरह से तैयार है, तो ऐसे में उत्तर प्रदेश ने पुनः अपनी प्रतिबद्धता प्रकट की है कि वह सुनिश्चित करेगा कि एनटीडी उन्मूलन के भारत के लक्ष्य पूरे हों। एनटीडी की चुनौती से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश के संकल्प के बारे में डॉ. वी.पी.सिंह ने कहा, ’’हम प्रतिबद्ध हैं कि भारत वर्ष 2030 से पहले एनटीडी उन्मूलन के लक्ष्य को प्राप्त कर ले।

प्रदेश में, एनटीडी की रोकथाम और नियंत्रण को राष्ट्रीय रोग नियंत्रण कार्यक्रमों के माध्यम से प्राथमिकता दी जा रही है। इन नियंत्रण कार्यक्रमों को वैश्विक रणनीतियों पर चलाया जाता है और इनके लिए एक तय सालाना बजट भी रहता है। इसी क्रम में आगामी 1 मार्च 2021 से उत्तर प्रदेश के 12 जनपदों में एमडीए/ आईडीए (ट्र्पिल ड्र्ग थेरेपी) कार्यक्रम का शुभारम्भ होना है भारत में कालाज़ार और हाथीपांव के उन्मूलन की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। भारत ने कालाज़ार के 97 प्रतिशत स्थानिक प्रखंडों में इस बीमारी को काफी कम कर दिया है। इन प्रखंडों में हर 10,000 की आबादी पर कालाज़ार के एक से भी कम मामले हो चुके हैं |

हाथीपांव रोग से ग्रस्त देश के 272 जिलों में से 98 जिलों में रोग संचरण को रोक दिया गया है और मास ड्रग ऐडमिनिस्ट्रेशन भी सफल परिणामों के बाद बंद कर दिया गया है। तीव्र भौगोलिक फैलाव की वजह से डेंगू चुनौती बना हुआ है लेकिन 2008 के बाद से भारत ने इस से होने वाली मौतों की दर को 1 प्रतिशत से कम पर रखा हुआ है। एनटीडी समेत सभी बीमारियों के लिए जनस्वास्थ्य प्रणाली द्वारा सेवाएं दी जाती हैं। हाथीपांव, कालाज़ार, मिट्टी से संचारित कृमिरोग एवं कुष्ठरोग के लिए प्लेटफॉर्म बनाए जा रहे हैं ताकि जहां भी संभव हो मामलों का पता लगाने, वेक्टर कंट्रोल, मास ड्रग ऐडमिनिस्ट्रेशन आदि प्रयासों का समन्वय किया जा सके। वेक्टर कंट्रोल के लिए विभिन्न क्षेत्रों के बीच समन्वय मजबूत करने से डेंगू, हाथीपांव और कालाज़ार के मामलों में लाभ हुआ है।

उत्तर प्रदेश में एनटीडी जनस्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौतियां बने हुए हैं। किंतु, प्रदेश इन रोगों के खिलाफ ठोस कदम उठा रहा है। कोविड-19 की वजह से संसाधन और ध्यान एनटीडी आदि अहम मुद्दों से हट कर कोविड-19 की तरफ चले गए; परंतु प्रदेश ने शीघ्रता से एनटीडी संबंधी गतिविधियों को विश्व स्वास्थ्य संगठन के मार्गदर्शन के साथ पुनः आरंभ कर दिया। एनटीडी के खिलाफ किये जा रहे प्रयासों के बारे में डॉ. सिंह ने कहा “उत्तर प्रदेश के 51 फाइलेरिया प्रभावित जनपदों में कुल 76674 हाथीपांव एवं 29228 हाइड्रोसील से प्रभावित लोगों को चिन्हित किया गया है। इसके साथ ही कुल 6 कालाजार प्रभावित जनपदों में 55 कालाजार एवं 34 पी.के.डी.एल. से प्रभावित लोगों को चिन्हित करते हुए उनका उपचार किया गया है।

उन्होंने कहा कि, हमें विश्वास है कि हम सबकी कोशिशें भारत में एनटीडी मुक्त पीढ़ी के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेंगी।