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अब जनवरी से शुरू होने वाला साल पहले आरंभ होता था 25 मार्च से

-18वीं शताब्‍दी से अंग्रेजों ने पहली जनवरी से की थी नये वर्ष की शुरुआत 
डॉ अजय दत्‍त शर्मा

सेहत टाइम्‍स ब्‍यूरो

लखनऊ। चारों ओर नववर्ष की धूम चल रही है, विशेषकर 31 दिसम्‍बर को शुरू हुआ यह सिलसिला 1 जनवरी को पूरे शबाब पर रहा, हालांकि शुभकामनाओं का आदान-प्रदान एक सप्‍ताह तक चलता ही रहता है। ऐसा चलन हम लोग अपने जीवनकाल में हमेशा से देखते आ रहे हैं। इसी चलन के तहत मैंने भी लोगों को शुभकामना संदेश देने की जिम्‍मेदारी निभायी। इसी क्रम में जब मैंने आयुर्वेदाचार्य डॉ अजय दत्‍त शर्मा को बधाई दी तो उन्‍होंने इस नये साल के इतिहास के बारे में अनेक जानकारियां दीं। उन्‍होंने बताया कि किस प्रकार इसकी शुरुआत 1 जनवरी से होने लगी और किस तरह से पहले यह नया साल 25 मार्च से शुरू होता था।

डॉ अजय दत्‍त शर्मा ने बताया कि भारत में ईस्वी संवत् का प्रचलन अंग्रेजी शासकों ने 1752 में किया। 1752 से पहले ईस्वी सन् 25 मार्च से शुरू होता था किन्तु 18वीं शताब्दी से इसकी शुरुआत एक जनवरी से होने लगी।

जनवरी से जून रोमन के नामकरण रोमन जोनस, मार्स व मया इत्यादि के नाम पर हैं। जुलाई और अगस्त रोम के सम्राट जूलियस सीजर तथा उसके पौत्र आगस्टन के नाम पर तथा सितम्बर से दिसम्बर तक रोमन संवत् के मासों के आधार पर रखे गये हैं। आखिर क्या आधार है इस काल गणना का? यह तो ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति पर आधारित होनी चाहिए।

नेहरू के आग्रह पर ग्रेगेरियन कैलेण्‍डर को राष्ट्रीय केलेण्डर माना गया

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात नवम्बर 1952 में वैज्ञानिकों और औद्योगिक परिषद के द्वारा पंचांग सुधार समिति की स्थापना की गयी। समिति ने 1955 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में विक्रम संवत को भी स्वीकार करने की सिफारिश की, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू के आग्रह पर ग्रेगेरियन केलेण्डर को ही राष्ट्रीय केलेण्डर के रूप में स्वीकार लिया गया।

उन्‍होंने बताया कि ग्रेगेरियन केलेण्ड़र की काल गणना मात्र दो हजार वर्षो की अति अल्प समय को दर्शाती है। जबकि यूनान की काल गणना 1582 वर्ष, रोम की 2757 वर्ष, यहूदी 5768, मिस्त्र की 28691, पारसी 198875 तथा चीन की 96002305 वर्ष पुरानी है।

भारतीय काल गणना पंथनिरपेक्ष

इन सबसे अलग यदि भारतीय काल गणना की बात करें तो हमारे ज्योतिष के अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 110 वर्ष है। जिसके व्यापक प्रमाण हमारे पास उपलब्ध हैं। डॉ अजय दत्‍त बताते हैं कि हमारे प्राचीन ग्रंथों में एक-एक पल की गणना की गई है। जिस प्रकार ईस्वी संवत् का सम्बन्ध ईसा से है उसी प्रकार हिजरी सम्वत् का सम्बन्ध मुस्लिम जगत और हजरत मोहम्मद से है। किन्तु विक्रम संवत् का सम्बन्ध किसी भी धर्म से न होकर सारे विश्व की प्रकृति, खगोल सिद्धांत व ब्रम्हाण्ड के ग्रहों व नक्षत्रों से है। इसलिए भारतीय काल गणना पंथ निरपेक्ष होने के साथ सृष्टि की रचना व राष्ट्र की गौरवशाली परम्पराओं को दर्शाती है।

आज भी सभी को रहता है अच्‍छे मुहूर्त का इंतजार

डॉ शर्मा बताते हैं कि इतना ही नहीं, ब्रम्हाण्ड़ के सबसे पुरातन ग्रंथों वेदों में भी इसका वर्णन है। नव संवत् यानि संवत्सरों का वर्णन यजुर्वेद के 27 वें व 30 वें अध्याय के मंत्र क्रमांक क्रमशः 45 व 15 में विस्तार से दिया गया है। विश्व को सौर मण्डल के ग्रहों व नक्षत्रों की चाल व निरन्तर बदलती उनकी स्थिति पर ही हमारे दिन, महीने, साल और उनके सूक्ष्मतम भाग पर आधारित है इसी वैज्ञानिक आधार के कारण ही पाश्यात्य देशों के अंधानुकरण के बावजूद, चाहे बच्चे के गर्भाधान की बात हो, जन्म की बात हो, नामकरण की बात हो, गृह प्रवेश या व्यापार प्रारंभ करने की बात हो, हम एक कुशल पंडित के पास जाकर शुभ मुहूर्त पुछते हैं। और तो और, देश के बड़े से बड़े राजनेता भी सत्तासीन होने के लिए सबसे पहले एक अच्छे मुहूर्त का इंतज़ार करते हैं जो कि विशुद्ध रूप से विक्रमी संवत् के पंचाग पर आधारित होता है।

डॉ शर्मा कहते हैं कि भारतीय शास्त्ररीत्या कोई भी काम शुभ मुहूर्त में किया जाए तो उसकी सफलता में चार चाँद लग जाते हैं। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा वर्ष प्रतिपदा कहलाती है। इस दिन से ही नया वर्ष प्रारंभ होता है। ‘युग‘ और ‘आदि‘ शब्दों की संधि से बना है ‘युगादि‘ । आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में ‘उगादि‘ और महाराष्ट्र में यह पर्व ‘ग़ुड़ी पड़वा‘ के रूप में मनाया जाता है। उन्‍होंने बताया कि गुड़ी पड़वा के साथ ही नौ दिन की चैत्र की नवरात्रि शुरु हो जाती है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के प्रात: सूर्योदय की प्रथम रश्मि के दर्शन के साथ नववर्ष का आरंभ होता है।

कहा जाता है कि इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था। इसमें मुख्यतया ब्रह्माजी और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गंधवारें, ऋषि-मुनियों, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षि‍यों और कीट-पतंगों का ही नहीं, रोगों और उनके उपचारों तक का भी पूजन किया जाता है। इसी दिन से नया संवत्सर शुरू होता है। अत: इस तिथि को ‘नवसंवत्सर‘ भी कहते हैं।

डॉ शर्मा कहते हैं कि शुक्ल प्रतिपदा का दिन चंद्रमा की कला का प्रथम दिवस माना जाता है। जीवन का मुख्य आधार वनस्पतियों को सोमरस चंद्रमा ही प्रदान करता है। इसे औषधियों और वनस्पतियों का राजा कहा गया है। इसीलिए इस दिन को वर्षारंभ माना जाता है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में सारे घरों को आम के पेड़ की पत्तियों के बंदनवार से सजाया जाता है। सुखद जीवन की अभिलाषा के साथ-साथ यह बंदनवार समृद्धि व अच्छी फसल की भी परिचायक है। ‘उगादि‘ के दिन ही पंचांग तैयार होता है। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना और वर्ष की गणना करते हुए ‘पंचांग ‘ की रचना की थी।

उन्‍होंने बताया कि चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को महाराष्ट्र में गुड़ीपड़वा कहा जाता है। वर्ष के साढ़े तीन मुहुर्तों में गुड़ीपड़वा की गिनती होती है। शालिवाहन शक का प्रारंभ इसी दिन से होता है। इस अवसर पर आंध्र प्रदेश में घरों में ‘पच्चड़ी/प्रसादम‘ के रूप में बांटा जाता है। कहा जाता है कि इसका निराहार सेवन करने से मानव निरोगी बना रहता है। चर्म रोग भी दूर होता है।  इस पेय में मिली वस्तुएं स्वादिष्ट होने के साथ-साथ आरोग्यप्रद भी होती हैं। महाराष्ट्र में पूरन पोली या मीठी रोटी बनाई जाती है। इसमें—गुड़, नमक, नीम के फूल, इमली और कच्चा आम मिलाया जाता है। गुड़ मिठास के लिए, नीम के फूल कड़वाहट मिटाने के लिए और इमली व आम जीवन के खट्टे-मीठे स्वाद चखने का प्रतीक के रूप में होते हैं। भारतीय परंपरा में घरों में इसी दिन से आम खाने की आम का रस बनाने की और आम के रस की मिठाई बनाने की शुरुआत होती है।