-मात्र 35 दिनों में भी नॉर्मल (20 ग्राम) हुआ है 50 ग्राम वजन का प्रोस्टेट
-जीसीसीएचआर के डॉ गिरीश गुप्ता ने लंदन में स्टडी के हर पहलू को रखा मंच पर

सेहत टाइम्स
लखनऊ। गौरांग क्लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्योपैथिक रिसर्च के चीफ कन्सल्टेंट डॉ गिरीश गुप्ता ने प्रोस्टेट में वृद्धि यानी बिनाइन प्रोस्टेटिक हाईपरप्लेसिया (बीपीएच) के 33 वर्षों में साक्ष्य आधारित 756 केसेज के उपचार की स्टडी प्रस्तुत की है। इसके अनुसार कुल 444 मरीज (59 प्रतिशत) ऐसे हैं जिनके प्रोस्टेट का साइज घटकर या तो नॉर्मल आ गया या कम हुआ। ये सभी मरीज प्रोस्टेट के साइज के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित चारों कैटेगरी के हैं। प्रेजेन्टेशन में सबसे कम अवधि में उपचार, सबसे ज्यादा बड़े साइज के प्रोस्टेट का उपचार, सबसे ज्यादा उम्र वाले व्यक्ति का इलाज जैसे अनेक आंकड़ों का जिक्र किया गया है।
यह स्टडी बीती 10 एवं 11 अप्रैल, 2026 को लंदन में आयोजित विश्व होम्योपैथिक दिवस समारोह में प्रस्तुत की गयी। अप्रैल 1993 से मार्च 2026 तक की अवधि की इस स्टडी में मरीजों का पूरा रिकॉर्ड साक्ष्य सहित उपलब्ध है। प्रोस्टेट बढे होने की पुष्टि और उपचार के बाद प्रोस्टेट कम होने की पुष्टि के साक्ष्य के रूप में अल्ट्रासोनोग्राफी के
दस्तावेज मौजूद हैं।
इस स्टडी की व्याख्या करें तो एक बड़ा प्रश्न सामने आ रहा है कि आमतौर पर बीपीएच को बुजुर्गों की बीमारी यानी 50 वर्ष से ऊपर आयु के लोगों में होने वाली बीमारी माना जाता है, लेकिन डॉ गुप्ता द्वारा प्रस्तुत की गयी इस स्टडी के आंकड़े बयां कर रहे हैं कि 756 मरीजों में 50 वर्ष से कम आयु वाले मरीजों की संख्या भी 115 है, जबकि 50 वर्ष से ज्यादा आयु वाले मरीजों की संख्या 640 है (एक मरीज की आयु का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं)।
माना जा रहा है कि 33 वर्षों में 899 मरीजों पर की गयी प्रोस्टेट वृद्धि के उपचार की यह स्टडी होम्योपैथी क्षेत्र में अवधि और मरीजों की संख्या के दृष्टिकोण से दुनिया में पहली बार हुई है। स्टडी के प्रेजेन्टेशन में डॉ गिरीश ने मरीजों के लक्षण, उनकी पूरी हिस्ट्री लेने के दौरान पता चले कारणों, आदतों, उसकी प्रकृति की जानकारी के बाद उनके लिए दवा के चयन के बारे में की गयी प्रक्रिया की विस्तार से जानकारी दी। डॉ गुप्ता ने अपने प्रेजेन्टेशन में मॉडल केसेज भी प्रस्तुत किये।
चार कैटेगरी होती है बीपीएच की
उन्होंने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन, अमेरिकन यूरोलॉजिकल एसोसिएशन और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ, यूएसए द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार प्रोस्टेट में वृद्धि के रोग को प्रोस्टेट के वजन के अनुसार चार कैटेगरी में बांटा गया है। पहली कैटेगरी में 20 से 30 ग्राम, दूसरी कैटेगरी में 31 से 50 ग्राम, तीसरी कैटेगरी में 51 से 80 ग्राम तथा चौथी कैटेगरी में 80 से ज्यादा ग्राम के प्रोस्टेट वाले मरीजों को रखा जाता है। डॉ गिरीश ने कहा कि इस स्टडी में इन चारों कैटेगरी के क्रमशः 307, 316, 101 व 32 मरीज शामिल थे।
ऐसे किया दवा का चुनाव
उन्होंने बताया कि दवाओं का चुनाव होम्योपैथी के सिद्धांतों के आधार पर किया गया, ज्ञात हो होम्योपैथी का सिद्धांत कहता है कि बीमारी में पूरे मरीज को केंद्र मानकर की सभी दिक्कतों को ध्यान में रखकर दवा का चुनाव करना चाहिये न कि सिर्फ मरीज में मौजूद बीमारी को ध्यान में रखकर। इसीलिए रोग के कारण को जानने के लिए मरीज की सामान्य मनःस्थिति, सामान्य भौतिक स्थिति और विशेष भौतिक स्थिति का आकलन किया जाता है।
98 वर्ष के बुजुर्ग को भी मिला है लाभ
डॉ गिरीश ने बताया कि इन मरीजों में सबसे कम समय में नॉर्मल होने वाले मरीज का प्रोस्टेट 50 ग्राम का था जो कि 35 दिनों के इलाज के बाद 20 ग्राम का हो गया। इसी प्रकार सर्वाधिक आयु वाले मरीज की उम्र 98 वर्ष थी जिसका प्रोस्टेट 51 ग्राम का था, जो 100 दिनों के इलाज में 43 ग्राम आ गया। इसके अलावा सबसे बड़ा साइज का प्रोस्टेट जो 66 दिनों के उपचार के बाद नॉर्मल साइज का हो गया वह 60 ग्राम का था, इसके अतिरिक्त सबसे बड़े साइज का प्रोस्टेट जो उपचार के बाद नॉर्मल तो नहीं हुआ लेकिन कम हुआ वह 185 ग्राम का था जो कि कम होकर 151 ग्राम हो गया।
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राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशन
डॉ गुप्ता ने बताया कि प्रोस्टेट केसेज की समय-समय पर की गयी स्टडी का प्रकाशन विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय जर्नल्स में होता रहा है। सबसे पहली स्टडी का प्रकाशन एशियन होम्योपैथिक जर्नल में 1994 में जुलाई से सितम्बर अंक में हुआ था। इसके बाद आयुष विभाग, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय भारत सरकार के अंतर्गत केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद और डॉ गिरीश द्वारा स्थापित होम्योपैथिक रिसर्च फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में अगस्त 2006 से सितम्बर 2009 तक एक रिसर्च स्टडी की गयी थी। 2010 में इंडियन जर्नल ऑफ रिसर्च इन होम्योपैथी के अक्टूबर-दिसम्बर अंक में, 2012 में अमेरिकन जर्नल ऑफ होम्योपैथिक मेडिसिन के समर 2012 के अंक में, 2016 में इंडियन जर्नल ऑफ रिसर्च इन होम्योपैथी में अक्टूबर-दिसम्बर के अंक में स्टडीज का प्रकाशन हुआ, इसके बाद 2018 में इंटरनेशनल जर्नल फॉर क्लासिकल होम्योपैथी ’होम्योपैथिक लिंक्स’ में प्रोस्टेट के मॉडल केसेज की शृंखला का प्रकाशन हुआ।
उन्होंने बताया कि रिसर्च का उद्देश्य बिना सर्जरी के प्रोस्टेट के साइज को होम्योपैथिक दवाओं से कम करना, और उपचार के दौरान व उपचार के बाद की अल्ट्रासोनोग्राफी रिपोर्ट को साक्ष्य के रूप में रखना था। डॉ गिरीश ने कहा कि मुझे इस बात का संतोष है कि साइंटिफिक सबूत के साथ मैं उपचार की सफलता को प्रमाणित कर पाया।

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