-GCCHR के चीफ कंसलटेंट डॉ गिरीश गुप्ता से विशेष वार्ता
-विश्व किडनी दिवस 12 मार्च पर विशेष रिपोर्ट

सेहत टाइम्स
लखनऊ। किडनी रोग आज पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल है। इस गंभीर बीमारी के उपचार में होम्योपैथी की संभावनाओं को लेकर लखनऊ के गौरांग क्लिनिक एंड सेंटर फॉर होम्योपैथिक रिसर्च GCCHR के चीफ कंसलटेंट वरिष्ठ होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ गिरीश गुप्ता द्वारा किए गए शोध कार्यों ने चिकित्सा जगत का ध्यान आकर्षित किया है। इन अध्ययनों का प्रकाशन प्रतिष्ठित राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय जनरल्स में किया जा चुका है।
विश्व किडनी दिवस (12 मार्च) के मौके पर सेहत टाइम्स ने डॉक्टर गिरीश गुप्ता से विशेष बातचीत की।
डॉ. गिरीश गुप्ता पिछले कई वर्षों से किडनी रोगों, विशेष रूप से Chronic Kidney Disease (सीकेडी) के होम्योपैथिक उपचार पर शोध कर रहे हैं। उनके द्वारा किए गए अध्ययनों में यह देखा गया है कि उचित होम्योपैथिक दवाओं, नियंत्रित आहार और नियमित चिकित्सकीय निगरानी के साथ किडनी की कार्यक्षमता में सुधार या स्थिरता आ सकती है।
डॉ. गुप्ता और उनकी टीम द्वारा किडनी रोगियों पर कई केस-सीरीज़ अध्ययन किए गए हैं। इन अध्ययनों में क्रिएटिनिन और यूरिया जैसे महत्वपूर्ण बायोकेमिकल पैरामीटर का दीर्घकालिक अध्ययन किया गया। इसके परिणामस्वरूप रोगियों में सीरम क्रिएटिनिन, यूरिया और eGFR जैसे पैरामीटर में सुधार देखा गया। कुछ मामलों में मरीजों की स्थिति स्थिर बनी रही और बीमारी की प्रगति को धीमा किया जा सका।
डॉ गिरीश गुप्ता बताते हैं कि होम्योपैथिक इलाज से क्रॉनिक किडनी डिजीज के रोगियों को पांच-पांच साल तक डायलिसिस/ट्रांसप्लांट से दूर रखने में सफलता मिली है, यहाँ तक कि एक मरीज को 15 वर्षों तक ट्रांसप्लांट की जरूरत नहीं पड़ी। 160 मरीजों पर हुई इस रिसर्च का प्रकाशन नेशनल जर्नल ऑफ होम्योपैथी में वर्ष 2015 वॉल्यूम 17, संख्या 6 के 189वें अंक में हो चुका है।
डॉ. गुप्ता का कहना है कि किडनी रोगों के उपचार में होम्योपैथी को सहायक चिकित्सा के रूप में और अधिक वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है। उनका मानना है कि समग्र उपचार पद्धति, संतुलित आहार और नियमित जांच के साथ होम्योपैथिक चिकित्सा किडनी रोगियों के लिए उपयोगी विकल्प साबित हो सकती है।
किडनी रोगों पर किए गए ये शोध होम्योपैथी को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं और इससे इस पद्धति में आगे और अनुसंधान के लिए भी प्रेरणा मिल रही है।

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