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क्‍या आप जानते हैं कि एसिडिटी होने का मूल कारण पेट से नहीं, बल्कि आपकी सोच से है ?

–जीसीसीएचआर के कन्‍सल्‍टेंट डॉ गौरांग गुप्‍ता ने दीं साइकोसोमेटिक डिस्‍ऑर्डर पर महत्‍वपूर्ण जानकारियां

डॉ गौरांग गुप्‍ता


धर्मेन्‍द्र सक्‍सेना
लखनऊ।
साइकोसोमेटिक डिस्‍ऑर्डर (psychosomatic disorders) यानी मनोदैहि‍क विकार वे विकार हैं जो हमारी सोच से उत्‍पन्‍न होते हैं, यानी अगर हमारी सोच में डर है, घबराहट है, किसी घटना से हम दुखी हैं, अचानक कोई आघात पहुंचा है। ऐसी स्थिति में इस सोच के चलते हमारे मस्तिष्‍क से जो स्राव होता है, यही हमारी बीमारी का कारण बनता है। इसी के चलते ब्‍लड प्रेशर, थायरॉयड, डायबि‍टीज, कम उम्र में होने वाली अर्थराइटिस, विटिलिगो (सफेद दाग) सोरियासिस जैसे अनेक त्‍वचा रोग, स्त्रियों को होने वाली बच्‍चेदानी में गांठ, स्‍तन में गांठ जैसे अनेक प्रकार के स्‍त्री रोग सहित शरीर के विभिन्‍न अंगों में रोग हो जाते हैं।


यह महत्‍वपूर्ण जानकारी गौरांग क्‍लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्‍योपैथिक रिसर्च (जीसीसीएचआर) के कन्‍सल्‍टेंट डॉ गौरांग गुप्‍ता ने ‘सेहत टाइम्‍स’ के साथ विशेष भेंट में देते हुए बताया कि इन रोगों का इलाज चलता रहता है लेकिन चूंकि उस रोग के पीछे के उसके साइकोसोमेटिक कारण का इलाज नहीं होता है इसलिए रोग जड़ से समाप्‍त नहीं हो पाता है।


उदाहरण के तौर पे एसिडिटी को ले लीजिये। इस साधारण से रोग, जिससे अधिक लोग ग्रसित हैं, के पीछे भी मानसिक तनाव महत्वपूर्ण कारण है। लेकिन इस जानकारी के अभाव में लोग आजीवन प्रतिदिन दावा खाते रहते हैं। लेकिन अगर मानसिक तनाव के कारण के आधार पर दवा दी जाए तो इस रोग से सदा के लिए मुक्ति मिल सकती है।


डॉ गौरांग बताते हैं कि हमारे पास जो मरीज आते हैं वे यह प्रश्‍न पूछते हैं कि आखिर सोच का असर शरीर के दूसरे अंग की बीमारी पर कैसे पड़ सकता है। डॉ गौरांग कहते हैं कि इस बात को एक उदाहरण से समझें। अगर किसी शाकाहारी व्‍यक्ति के भोजन करते समय कोई यह कह दे कि आप जो सब्‍जी खा रहे हैं उसमें मांस पड़ा है, इसके बाद देखिये जो व्‍यक्ति अबतक चुपचाप मजे लेकर खाना खा रहा था, सब्जी में कोई मांस न होते हुए भी उसका मन विचलित हो उठेगा और उसको उल्टी हो जाएगी।

इसी प्रकार जीवन में बहुत सी ऐसी घटनाएं होती हैं जिनका असर व्‍यक्ति मन पर पड़ता है, जैसे रिश्तों में अनबन, अपने या परिवार के स्‍वास्‍थ्‍य की अत्यधिक चिंता, बच्चों के भविष्य की चिंता, आर्थिक संबन्धित चिंता या अचानक हुई दुर्घटनाओं से मन को आघात पहुंचने पर दिमाग में हार्मोन का स्राव होता है, जिसका असर शरीर पर आता है एवं परिणामस्‍वरूप शारीरिक रोग उत्‍पन्‍न हो जाते हैं।

ज्ञात हो डॉ गौरांग ने बैचलर ऑफ होम्‍योपैथिक मेडिसिन एंड सर्जरी (बीएचएमएस) के बाद एमडी साइकाइट्री से की है जिसमें साइकोसोमेटिक टॉपिक मुख्‍य है। डॉ गौरांग ने अपनी थीसिस में यूट्रीन फाइब्रॉयड, ओवेरियन सिस्‍ट, पीसीओएस, फाइब्रॉडेनोमा ऑफ ब्रेस्‍ट, बिनाइन प्रोस्‍टेटिक हाईपरप्‍लासिया (बीपीएच), थायरॉयड डिस्‍ऑर्डर, रिह्यूमेटॉयड अर्थराइटिस, विटिलिगो, सोरियासिस, लाइकेन प्‍लेनेस के केस को होम्‍योपैथिक दवाओं से क्‍योर करने के पेपर प्रस्‍तुत किये हैं।


क्रमश: …
(अगले अंक में मानसिक सोच के चलते शरीर के विभिन्‍न हिस्‍सों में हुए अनेक प्रकार के रोगों के इलाज के बारे में जानकारी )
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