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इलियाना आखिर क्यों आत्महत्या करने के बारे में सोचने लगी थी

 

अभिनेत्री इलियाना डीक्रूज ने साझा किये अपनी जिंदगी के खास अनुभव

प्रो. आदर्श त्रिपाठी

लखनऊ. शोख, खूबसूरत और ग्लैमरस बॉलीवुड अदाकारा इलियाना डीक्रूज भी एक बार अवसाद यानी डिप्रेशन की इतनी शिकार हो गयी थीं कि उनके दिमाग में आत्महत्या के ख्याल आने लगे थे. ऐसा इसलिए हुआ कि इलियाना बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर की शिकार हो गयी थी. ज्ञात हो बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर बीमारी में व्यक्ति को यह गलतफहमी हो जाती है कि उसके शरीर का फलां अंग ठीक नहीं दीखता है. विशेषकर सुंदर दिखने में अहम् भूमिका निभाने वाले अंगों जैसे नाक, होठ आदि अंगों को लेकर व्यक्ति बहुत ही फिक्रमंद हो जाता है.

पिछले दिनों अपने बारे में इलियाना ने यह बात 21वीं वर्ल्ड कॉन्ग्रेस ऑफ मेंटल हेल्थ के एक इवेंट में मौजूद लोगों के साथ साझा की. अभिनेत्री इलियाना डिक्रूज ने अपनी जिंदगी से जुडी कई बातों को लोगों को बताया. साथ ही उन्होंने डिप्रेशन से अपनी लड़ाई के बारे में काफी कुछ कहा. उसने साथ ही बताया कि डिप्रेशन से इस लड़ाई में उसकी मां ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी थीं.

इलियाना ने कहा कि ‘मैं हमेशा से ही सेल्फ कॉन्शियस पर्सन रही हूं और अपनी बॉडी टाइप को लेकर गंभीर रही हूं, मैं हमेशा ही लो फील करती थी और उदास रहती थी, लेकिन मुझे पता नहीं था कि मैं डिप्रेशन और बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर से परेशान हूं, मैं सिर्फ यह चाहती थी कि सब मुझे स्वीकार करें. इलियाना ने आगे कहा कि एक मौके पर तो मेरे दिमाग में आत्महत्या के ख्याल आने लगे थे, मैं सब खत्म कर लेना चाहती थी.

उन्होंने बताया कि यह सब तब बदला जब मैंने खुद को स्वीकार किया और जाना कि मैं किस दौर से गुजर रही हूं, यही डिप्रेशन से लड़ाई का पहला कदम होता है’ इलियाना ने यह भी कहा कि डिप्रेशन वाकई होता है और लोगों को इससे लड़ने के लिए मदद मांगने में नहीं शरमाना चाहिए, वे बताती हैं ‘ये दिमाग का केमिकल लोचा है और इसका इलाज जरूरी होता है.

इस बीमारी के बारे में सेहत टाइम्स को केजीएमयू के मनोचिकित्सक प्रो. आदर्श त्रिपाठी ने बताया कि यह बीमारी कुछ ऐसे लोगों को हो जाती है जो अपनी सुन्दरता को लेकर बहुत ज्यादा ही संवेदनशील होती हैं. उन्होंने बताया कि दरअसल इस बीमारी के बारे में मरीज को यह समझाना बहुत जरूरी है कि यह बीमारी है और सिर्फ उसकी सोच है कि अंग ठीक नहीं दीखता है. उन्होंने बताया कि  ऐसे में घरवालों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो जाती है. उन्हें चाहिए के वे मनोचिकित्सक से मिलें और मरीज का इलाज कराएं. इलाज के बारे में डॉ. त्रिपाठी ने बताया कि दवाओं और काउंसिलिंग से इस बीमारी का इलाज संभव है, उन्होंने कहा कि अच्छा हो ऐसे मरीज का जल्दी से जल्दी इलाज करा लिया जाये

 

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