धुआं सिगरेट का हो या ईंधन का, फेफड़ों में जाता रहा तो जीवन कर देगा धुआं-धुआं

-विश्‍व सीओपीडी दिवस पर प्रो राजेन्‍द्र प्रसाद ने कहा, संभव है इससे बचाव

प्रो राजेन्‍द्र प्रसाद

सेहत टाइम्‍स ब्‍यूरो

लखनऊ। डायरेक्टर मेडिकल एजुकेशन एवं विभागाध्यक्ष, पल्मोनरी मेडिसिन, एराज लखनऊ मेडिकल कॉलेज, पूर्व विभागाध्यक्ष, पल्मोनरी मेडिसिन, किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी एवं पूर्व निदेशक वल्लभ भाई पटेल चेस्ट इंस्‍टीट्यूट दिल्ली. प्रो राजेन्‍द्र प्रसाद ने कहा है कि सी.ओ.पी.डी.का सबसे बड़ा कारण धूम्रपान, बायोमास फ्यूल का प्रयोग एवं वायु प्रदूषण हैं। भारत वर्ष में सिगरेट एवं बीड़ी का प्रचलन आम है और जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा बीड़ी का उपयोग करता है। अनुसंधानों से ज्ञात हुआ है कि बीड़ी, सिगरेट जैसी ही खतरनाक है। विश्व भर में 3 अरब व्यक्ति बायोमास फ्यूल के सम्पर्क में हैं एवं भारत में 75 प्रतिशत से ज्यादा घरों में अभी भी लकड़ी, कन्डे एवं कोयला का इस्तेमाल खाना पकाने के लिए होता है, यह एक बड़ी समस्या है।

प्रो राजेन्‍द्र प्रसाद ने यह बात सी.ओ. पी. डी. पर जानकारी देते हुए बताया कि सीओपीडी दिवस प्रति वर्ष नवम्बर माह के तीसरे बुधवार को मनाया जाता है। उन्‍होंने बताया कि विश्व सी.ओ.पी.डी. दिवस विश्व भर में ग्लोबल इनिशियेटिव फॉर क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव लंग डिजीज (गोल्ड) एवं विभिन्न संस्थाओं की सहभागिता के साथ मनाया जाता है।

उन्‍होंने बताया कि सी.ओ.पी.डी. एक आम सांस की बीमारी है जिससे बचाव संभव है जिसमें फेफड़े के अन्दर हवा का प्रवाह बाधित होता है, इसमें फेफड़ों में दूषित हवा और विभिन्न प्रकार की गैसेज सांस द्वारा फेफड़े में पहुंच जाती हैं। सी. ओ. पी. डी. सबसे ज्यादा प्रचलित सांस की बीमारी है। लगभग 38.4 करोड़ व्यक्ति विश्व भर में सी.ओ.पी.डी. से पीड़ित हैं। सी.ओ.पी.डी. का प्रचलन दर 0.2 प्रतिशत से 37 प्रतिशत है। हर वर्ष 32 लाख लोगो की पूरे संसार में सी. ओ. पी. डी. के कारण मृत्यु हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार सी. ओ. पी. डी. दुनिया में मृत्यु का दूसरा कारण है। भारत में लगभग 5 करोड़ 50 लाख व्यक्ति सी.ओ.पी.डी. से पीड़ित है और 8 लाख से अधिक व्यक्तियों की मृत्यु प्रति वर्ष इस कारण होती है। सी.ओ.पी.डी. एक नॉन कम्युनिकेबल डिसीज है और महिलाओं की तुलना में पुरुषों में ज्यादा पायी जाती है।

शुरू में सी.ओ.पी.डी. को पहचाना नहीं जाता क्योंकि इसके लक्षणों को बढ़ती आयु के साथ होने वाले बदलाव की तरह समझा जाता है। सी.ओ.पी.डी.का सबसे बड़ा कारण धूम्रपान, बायोमास फ्यूल का प्रयोग एवं वायु प्रदूषण हैं। भारत वर्ष में सिगरेट एवं बीड़ी का प्रचलन आम है और जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा बीड़ी का उपयोग करता है। अनुसंधानों से ज्ञात हुआ है कि बीड़ी, सिगरेट जैसा ही खतरनाक है। विश्व भर में 3 अरब व्यक्ति बायोमास फ्यूल के सम्पर्क में हैं एवं भारत में 75 प्रतिशत से ज्यादा घरों में अभी भी लकड़ी, कन्डे एवं कोयला का इस्तेमाल खाना पकाने के लिए होता है, यह एक बड़ी समस्या है।

प्रों. राजेन्द्र प्रसाद ने जोर देकर कहा कि सी.ओ.पी.डी. की रोकथाम संभव है। परन्तु इसके लिए कड़े प्रयास करने होंगे। सिगरेट एवं बीड़ी के प्रयोग को रोकना होगा और खाना पकाने के लिए लकड़ी, कन्डे एवं कोयले के स्थान पर एल.पी.जी.और बिजली के प्रयोग पर जोर देने की आवश्यकता है। यह साबित हो चुका है कि इस रोग की पहचान जल्दी कर लेने से एवं उचित दवा के सेवन से बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सकता है लेकिन इसको पूर्णतया समाप्त नहीं किया जा सकता।