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Exclusive : हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, इलाज के लिए आर्थिक मदद की प्रक्रिया को बाधारहित बनायें

जरूरी इस्‍टीमेट बनवाने की जिम्‍मेदारी मरीज या तीमारदार पर न डाली जाये

लखनऊ। कैंसर के एक मरीज की इलाज के अभाव में मौत के मामले पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि गरीबों के इलाज के लिए आर्थिक मदद देने की व्यवस्था को सरल और बाधा रहित बनाया जाए। कोर्ट ने कहा है कि इलाज में आने वाले खर्च का इस्टीमेट बनवाने की जिम्मेदारी मरीज या तीमारदार पर न डाली जाए और यदि जरूरत पड़े तो सम्बंधित रूल्स- 2013 को संशोधित किया जाए।

 

इलाज के अभाव में हुई मौत के मामले को लेकर मृतक की मां ने किया था मुकदमा

यह आदेश जस्टिस राजन रॉय व जस्टिस आरएस चौहान की बेंच ने सीतापुर की कांती देवी की याचिका पर दिया। याचिका में कांती देवी ने कैंसर पीड़ित अपने बेटे की मौत का कारण सरकारी सहायता न मिल पाने को बताते हुए, मुआवजे की मांग की थी। मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने यह बात तो स्वीकार की कि याची ने मदद के लिए प्रार्थना पत्र दिया था व उसकी प्रार्थना को आंशिक तौर पर निस्तारित करते हुए, उसके बेटे को पीजीआई रेफर कर दिया गया था, लेकिन पीजीआई से खर्च का इस्टीमेट लाने की जिम्मेदारी याची की थी जिसे न ला पाने के कारण याची के बेटे के इलाज में मदद नहीं हो सकी।

 

वर्तमान जटिल प्रक्रिया में उलझे रहने के कारण नहीं मिल पायी थी मरीज को मदद

अपनी बहस के दौरान याची के अधिवक्ता चन्दन श्रीवास्तव की दलील थी कि याची ने इस्टीमेट देने का अनुरोध पीजीआई में किया था लेकिन वहां याची के बेटे को मात्र ओपीडी में देखा गया। एक कैंसर के मरीज को मात्र ओपीडी में देखकर बिना जांच और बिना भर्ती के इस्टीमेट बनाया भी नहीं जा सकता। कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद इसे दुर्भाग्यपूर्ण मामला करार दिया। कोर्ट ने कहा कि निरक्षर और गरीब लोगों की ऐसे मामलों में मदद के लिए उचित तंत्र का अभाव है। गरीब और निरक्षर लोगों में जटिल औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए आवश्यक जानकारी और कुशलता नहीं होती, जैसा कि इस मामले में हुआ।

 

कोर्ट की सख्‍त टिप्‍पणी

कोर्ट ने कहा कि आश्चर्य की बात है संचार और तकनीकी के इस युग में ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं है कि जिम्मेदार अधिकारी ऑनलाइन आदि माध्यम से उस अस्पताल से इलाज के खर्च का इस्टीमेट मंगवा सके जहां मरीज को रेफर किया गया है। इससे मरीज और तीमारदार नौकरशाही झमेलों से बच जाएंगे। कोर्ट ने कहा कि सभी सरकारी जिला चिकित्सालयों, मेडिकल कॉलेजों व चिकित्सीय संस्थानों में यह प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। न्यायालय ने आगे कहा कि इस मामले में हम देख रहे हैं कि असाध्य रोगों से उपचार के लिए नियमावली- 2013 में रेफर और इस्टीमेट बनवाने के बीच एक वैक्यूम है। जिसे भरने की आवश्यकता है। हमारी टिप्पणियों की रोशनी में नियमावली- 2013 पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। कोर्ट ने राज्य सरकार व खास तौर पर मुख्यमंत्री सचिवालय को आदेश दिया कि उपरोक्त टिप्पणियों के आलोक में छह माह के भीतर ऐसे सभी आवश्यक उपाय किए जाएं जिनसे मरीजों के आर्थिक सहायता के लिए सरल व बाधा रहित तंत्र विकसित हो सके। कोर्ट ने निर्णय के अनुपालन के लिए सभी सम्बंधित अधिकारियों को सूचित करने का निर्देश अपर मुख्य स्थाई अधिवक्ता को दिया।

 

याची को आर्थिक सहायता देने पर निर्णय लेने के आदेश

कोर्ट ने कहा कि एक नौजवान आवश्यक इलाज के अभाव में मर गया। उसकी मां हमारे सामने आंखों में आंसू भरे खड़ी है। हम समय को पीछे नहीं ले जा सकते और न ही उसके बेटे को वापस ला सकते हैं लेकिन हम यह सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे कि ऐसी घटना दोबारा न हो। उचित चिकित्सीय सुविधा एक सभ्य समाज की आधारभूत आवश्यकता है। कोर्ट ने याची के आर्थिक सहायता के अनुरोध पर दो माह में निर्णय लेने का आदेश राज्य सरकार को दिया है।

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