-सामूहिक हित से ज्यादा व्यक्तिगत लाभ को महत्व देने वाले फैकल्टी मेम्बर्स पर उठाये सवाल

सेहत टाइम्स
लखनऊ। पिछले कुछ माह से विभिन्न प्रकरणों को लेकर चर्चा में रहने वाले किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय केजीएमयू में एक और बड़ा प्रकरण सामने आया है। संस्थान में कार्यरत टीचर्स के एक बड़े वर्ग के स्वार्थपरक रवैये और टीचर्स की दिक्कतों का समाधान लम्बे समय से न होने की स्थिति के बावजूद साथियों से अपेक्षित सहयोग न मिलने के चलते केजीएमयू की टीचर्स एसोसिएशन के महामंत्री प्रो संतोष कुमार ने महामंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है, उन्होंने अपना इस्तीफा एसोसिएशन के अध्यक्ष को भेजा है। उन्होंने कहा है कि टीचर्स वर्ग की समस्याओं को हल करने की दिशा में अगर मैं कार्य नहीं कर पा रहा हूं तो मुझे पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस्तीफे में प्रो संतोष ने अध्यक्ष को सम्बोधित करते हुए लिखा है कि मैं एक दशक से ज़्यादा समय से टीचर्स एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी के तौर पर काम कर रहा हूँ। टीचर्स एसोसिएशन के संघर्ष और कोशिशों की वजह से सभी टीचर्स को कई फ़ायदे मिले हैं, सबसे खास बात यह है कि SGPGI के बराबर सैलरी और अलाउंस में बढ़ोतरी हुई है।
लाभ चाहिये लेकिन योगदान देना मंजूर नहीं
प्रो संतोष ने एक गंभीर प्रश्न उठाते हुए लिखा है कि कई टीचर्स एसोसिएशन से तो फ़ायदे की उम्मीद करते हैं, लेकिन बदले में कोई योगदान देने को तैयार नहीं हैं, यहाँ तक कि दिवंगत हुए फ़ैकल्टी मेंबर के परिवार की सेवा के लिए टोकन के तौर पर आर्थिक मदद के रूप में एक दिन की सैलरी देने को तैयार नहीं होते हैं, जबकि मदद देने का निर्णय एसोसिएशन की आमसभा की बैठक में लिया गया था।
अपनी इस बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने यहां के तीन फैकल्टी मेम्बर की मृत्यु के बाद उनके परिवार को दी गयी मदद का जिक्र करते हुए कहा है कि सबसे पहले फैकल्टी की हुई मौत के बाद परिवार को सहायता देने के लिए कुल 486 टीचर्स में से 400, दूसरे टीचर्स के मामले में 326 और तीसरे टीचर्स के दिवंगत होने के बाद परिवार की मदद के लिए सिर्फ 211 टीचर्स ही सामने आये।
प्रो संतोष ने इस्तीफे के लिए लिखे पत्र में एसोसिएशन की अपेक्षा व्यक्तिगत हितों को महत्व देने की प्रवृत्ति पर सवाल खड़े किये हैं। उन्होंने लिखा है कि टीचरों से जुड़े कई मुद्दे जैसे अर्न्ड लीव, ग्रेच्युटी, कॉन्फ़्रेंस अलाउंस, टीचरों के रिप्रेज़ेंटेशन के लिए एडमिनिस्ट्रेटिव रिफ़ॉर्म, ट्रांसपेरेंसी और मौके की बराबरी वगैरह मुद्दों को कुलपति के समक्ष उठाया गया था। इसके साथ ही इन मांगों को पूरा कराने के लिए कुलपति के नजदीकी फैकल्टीज से भी अनुरोध किया था लेकिन नतीजा शून्य रहा।
न तो मांगें पूरी हो रही और न ही उठायी जा रही सामूहिक आवाज
उन्होंने लिखा है कि इससे यह साफ़ है कि न तो ये मुद्दे हल हुए हैं और न ही इन्हें पाने के लिए मिलकर लड़ने की कोई इच्छा दिख रही है, जबकि मुझे यकीन है कि अगर अच्छी पहुँच वाले टीचर सच में मन बना लें, तो सभी मुद्दे और माँगें एक महीने के अंदर हल हो सकती हैं। उन्होंने कहा है कि ऐसा लगता है कि अक्सर व्यक्तिगत लाभ सामूहिक हित से ज्यादा अहम हो जाते हैं। उन्होंने अपनी लाचारी का जिक्र करते हुए कहा है कि कई टीचर उनसे यह भी सवाल करते हैं कि क्या टीचर्स एसोसिएशन सिर्फ़ स्वागत और विदाई के कामों के लिए है, जिसका मेरे पास कोई जवाब नहीं है।
उन्होंने लिखा है कि इन हालात में, मेरे लिए KGMU टीचर्स एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी के तौर पर बने रहने का कोई मतलब नहीं रह जाता। इसलिए, मैं जनरल सेक्रेटरी के पद से अपना इस्तीफ़ा देता हूँ ताकि कोई दूसरा काबिल टीचर आगे आए और पेंडिंग मांगों को उनके लॉजिकल नतीजे तक सफलतापूर्वक पहुँचाए जिससे टीचर्स का भला हो।

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