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अस्‍पताल में होने वाले संक्रमण से बचाकर बचायी जा सकती हैं 50 फीसदी मौतें

-केजीएमयू इंस्टीट्यूट ऑफ़ पैरामेडिकल साइंसेज में पंचम सीपीएमई का आयोजन

सेहत टाइम्‍स ब्‍यूरो

लखनऊ। अस्पताल में भर्ती होने पर मरीजों को वहां के वातावरण के चलते होने वाले संक्रमण को बचाकर इससे होने वाली 50 फीसदी मौतों को रोका जा सकता है। यह महत्वपूर्ण जानकारी किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय केजीएमयू के कुलपति लेफ्टिनेंट जनरल डॉ बिपिन पुरी ने आज 19 मार्च को केजीएमयू इंस्टीट्यूट ऑफ़ पैरामेडिकल साइंसेज द्वारा आयोजित पांचवी सीपीएमई (continuing paramedical education) के मौके पर मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए कही।

कुलपति ने कहा कि इस प्रकार के संक्रमण से बचाव करके न सिर्फ रोगी की जान बचाई जा सकती है, बल्कि उसकी चिकित्सा पर होने वाले व्यय को भी कम किया जा सकता है। कुलपति ने उपस्थित छात्र-छात्राओं से आह्वान किया कि वे केजीएमयू के ब्रांड एंबेसडर के रूप में कार्य करें और डॉ विनोद जैन के नेतृत्व में टीम वर्क व लीडरशिप की भावना के साथ ही लोगों के प्रति सहानुभूति एवं मृदु व्यवहार रखते हुए अपने कार्य में दक्षता प्रदान करें। सीपीएमई की मुख्य वक्ता माइक्रोबायोलॉजी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर अमिता जैन ने अपने संबोधन में कहा कि चिकित्सालय में भर्ती होने के 48 घंटे के अंदर अथवा चिकित्सालय से डिस्चार्ज होने के 30  दिन बाद तक जो संक्रमण होता है उसे Nosocomial Infection या अस्‍पताल से उत्‍पन्‍न इनफेक्शन कहते हैं ऐसा इंफेक्शन जो रोगी में पहले से ना हो। नोसोकॉमियल इनफेक्शन होने से रोगी को हॉस्पिटल में ज्यादा अवधि तक रखना पड़ता है उसकी बीमारी बढ़ती है और उसकी मृत्यु दर बढ़ जाती है, साथ ही इलाज में होने वाले व्यय में वृद्धि होती है। उन्होंने बताया कि यह इंफेक्शन ऐसे रोगियों में ज्यादा होता है जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कम होती है या जो कम अथवा अधिक आयु वाले हैं अथवा वे रोगी जिनका हॉस्पिटल उपचार के दौरान संक्रमण बचाने के लिए उचित प्रयास न किया गया हो प्रो अमिता ने यह भी बताया कि नोसोकॉमियल इनफेक्शन मुख्यतः चार प्रकार का होता है, मूत्र संक्रमण, सर्जरी के स्थान पर संक्रमण, वेंटीलेटर जनित निमोनिया और रक्त में होने वाला संक्रमण जिसे सेप्टीसीमिया भी कहते हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि इस संक्रमण से बचने के लिए सभी अस्पतालों को यूनिवर्सल सेफ्टी प्रिकॉशन रखने की आवश्यकता है। उन्‍होंने कहा कि इलाज के साथ ही उनकी इनफेक्शन प्रीवेंशन ट्रेनिंग भी होती रहनी चाहिए। प्रो अमिता ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि बहुधा चिकित्सा कर्मी संक्रमण रहित वातावरण उत्पन्न करने के लिए छोटी-छोटी चीजें जैसे हाथ धोना दस्ताना पहनना या कचरे का निस्तारण भली-भांति न करना इत्यादि का ध्यान नहीं देते हैं जिससे यह स्थिति और भयावह हो जाती है।

कार्यक्रम के निर्देशक एवं अधिष्ठाता पैरामेडिकल विज्ञान संकाय प्रो विनोद जैन ने कहा कि इस चिकित्सा विश्वविद्यालय में वर्ष 2015 से  व्यवस्थित रूप से पैरामेडिकल शिक्षण-प्रशिक्षण कार्य संपादित किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य ऐसे पैरामेडिकल कर्मियों को तैयार करना है जो समाज में कुशल एवं त्रुटि रहित सेवाएं प्रदान कर सकें। इस मौके पर प्रो विनोद जैन द्वारा परिकल्पित एवं लिखित पुस्तक Nosocomial Infection  एवं एक पोस्टर का भी विमोचन हुआ, इस पुस्तक का सह लेखन राघवेंद्र कुमार, वीनू दुबे एवं मंजरी शुक्ला द्वारा किया गया है। कार्यक्रम में आए हुए लोगों का स्वागत संबोधन प्रो अनित परिहार तथा धन्यवाद ज्ञापन अतिन सिंह द्वारा दिया गया। कार्यक्रम में 450  छात्र-छात्राएं उपस्थित रहीं जबकि 41  छात्र-छात्राओं ने नोसोकॉमियल इनफेक्शन विषय पर प्रेजेंटेशन के माध्यम से चर्चा की। कार्यक्रम में प्रति कुलपति प्रो विनीत शर्मा भी उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का संचालन शिवानी वर्मा, वीनू दुबे द्वारा किया गया तथा इस को सफल बनाने में पैरामेडिकल विज्ञान संकाय के एकेडमिक  कोऑर्डिनेटर राघवेंद्र कुमार के साथ श्याम जी रमन मिश्रा, अनामिका, महिमा वर्मा एवं अन्य पैरामेडिकल शिक्षकों का भी विशेष योगदान रहा।

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