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‘सुबह और शाम, रहें सावधान’ कहीं हमला न कर दे डेंगू का मच्छर

-डॉ आशुतोष दुबे ने डेंगू रोग से बचाव से लेकर उपचार तक की  विस्तार से दी जानकारी

डॉ आशुतोष कुमार दुबे

सेहत टाइम्स

लखनऊ। मानसून की हल्की फुहारें और हल्की ठंड की शुरुआत जहां मौसम को खुशनुमा बनाती हैं, वहीं यह समय मच्छर-जनित बीमारियों के प्रसार के लिए सबसे अनुकूल होता है। इनमें डेंगू सबसे तेजी से फैलने वाला एक खतरनाक वायरल संक्रमण है। हर साल भारत में लाखों लोग इसकी चपेट में आते हैं। डेंगू से जुड़ी भ्रांतियों और अफवाहों से बचकर वैज्ञानिक तथ्यों को समझना ही इससे बचाव की पहली सीढ़ी है।

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी (​सिविल) हॉस्पिटल के परामर्शी चिकित्सक डॉ आशुतोष दुबे का कहना है कि डेंगू फ्लेविविरिडे वायरस के संक्रमण से होता है। इसके मुख्य रूप से 4 स्ट्रेन (डेन 1,2,3,4 ) होते हैं। यह वायरस ऐडीज एजिप्टी नामक संक्रमित मादा मच्छर के काटने से व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करता है। ऐडीज मच्छर के शरीर पर काली और सफेद धारियां होती हैं। इस कारण इसको टाइगर मॉस्कीटो भी कहते हैं। यह मच्छर मुख्य रूप से दिन के समय विशेषकर सुबह और शाम को ही काटता है। यह मच्छर साफ और स्थिर पानी में अंडे देता है, जैसे कूलर, गमले और गमले की ट्रे, फ्रिज की ट्रे, पुरानी टायरों, पक्षियों के पानी के बर्तन, सड़क के किनारे पड़ी पोलिथीन, प्लास्टिक के गिलास, कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलें, नारियल के खोल और छत पर खुली पानी की टंकियों में या जहां भी कहीं साफ पानी एकत्र होता हो, ये सब कृत्रिम जलाशय बन कर डेंगू के मच्छरों के पनपने के उत्तम स्थान बन जाते हैं।

हेमोरेजिक फीवर के लक्षणों दिखें तो लें आपातकालीन चिकित्सा

डेंगू से संक्रमित मच्छर के काटने के 4 से 10 दिनों के भीतर डेंगू के लक्षण दिखाई देने लगते हैं जैसे अचानक तेज बुखार आना, आंखों के पीछे तेज दर्द, मांसपेशियों, जोड़ों और हड्डियों में असहनीय दर्द होना। इसलिए इसे हड्डी तोड़ बुखार भी कहते हैं। अत्यधिक थकान, जी मिचलाना और उल्टी होना, शरीर पर लाल चकत्ते या दानें पड़ना। इसके अलावा सबसे अधिक खतरनाक लक्षण हैं- मसूड़ों या नाक से खून आना, लगातार उल्टी होना, पेट में तेज दर्द होना या सांस लेने में तकलीफ होना, ये सब लक्षण डेंगू हेमोरेजिक फीवर का संकेतक हो सकता है। ऐसी दशा में तत्काल आपातकालीन चिकित्सीय सहायता लेनी चाहिए।

ये जांचें अत्यन्त आवश्यक​

डॉ आशुतोष बताते हैं कि उपरोक्त लक्षण होने पर डेंगू का संदेह व्यक्त कर चिकित्सक से परामर्श लेकर सही समय पर रक्त की जांच कराना अति आवश्यक है। आवश्यक जांचोें में शामिल हैं-

1. रक्त में एनएस-1 की जांच, यह बुखार आने के शुरुआती 1 से 5 दिनों के भीतर, यह टेस्ट किया जाता है, जो वायरस के प्रोटीन की पहचान करता है।
2. आईजीजी और आईजीएम एंटीबॉडी, यह बुखार के 5 से 7 दिनों के बाद शरीर में बने एंटीबॉडीज की जांच के लिए, यह टेस्ट किया जाता है।
3. सीवीसी इसमें प्लेटलेट् की संख्या और हीमैटोक्रिट स्तर की जांच की जाती है, जिससे शरीर में खून के गाढ़ेपन और प्लेटलेट्स की गिरावट का पता चल सके।
4. सीने का एक्स रे
5. पेट का अल्ट्रासाउंड आदि जांचें भी की जाती हैं।

डेंगू का उपचार

वैज्ञानिक रूप से डेंगू की कोई विशिष्ट एंटीवायरल दवा अभी उपलब्ध नहीं है। अभी इसका इलाज लक्षणों के आधार पर ही किया जाता है।

क्या करें:- भरपूर तरल पदार्थ लें जिससे शरीर में पानी की कमी न होने पाए। जैसे नारियल पानी, ओआरएस का घोल, नींबू पानी, छाछ और सूप आदि पीएं।

पर्याप्त आराम करें जिससे शरीर को पूरी तरह विश्राम मिले।

डॉक्टर की सलाह पर बुखार नियंत्रित करने के लिए केवल डॉक्टर द्वारा बताई गई पैरासिटामोल लें।

हर डेंगू मरीज को प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत नहीं होती। जब तक प्लेटलेट्स बहुत ज्यादा नीचे न गिरें या शरीर से ब्लीडिंग न हो।

एंटीबायोटिक होती है बेअसर

क्या न करें:- डॉक्टर की सलाह के बिना पेनकिलर जैसे एस्पिरिन, एस्पिरिन युक्त दवाएं, इबूप्रोफेन या नेप्रोक्सिन का सेवन कदापि न करें। ये दवाएं खून को पतला करती हैं और अंदरूनी ब्लीडिंग का खतरा बढ़ा सकती हैं।
डेंगू एक वायरल इंफेक्शन है, इसलिए इसमें एंटीबायोटिक्स बेअसर होती हैं। स्वयं से दवाइयां न लें।

बन चुकी है वैक्सीन

डॉ आशुतोष बताते हैं कि डेंगू की वैक्सीन बन गई है। शीघ्र ही यह बाजार में उपलब्ध भी हो जाएगी, तब इसे वैक्सीन की गाइडलाइन के अनुसार ही लगवाना हितकारी होगा। डेंगू से बचाव ही सबसे बड़ा संदेश और समाधान है। जब तक हम मच्छरों के पनपने की प्रक्रिया को नहीं रोकेंगे, तब तक डेंगू पर नियंत्रण पाना असंभव है।

इस तरह बच सकते हैं डेंगू से

1. सोर्स रिडक्शन:- “हर रविवार मच्छर पर वार” हफ्ते में एक बार कूलर का पानी खाली करके उसे सुखाएं (ड्राई डे मनाएं), गमलों की ट्रे, पक्षियों के बर्तन, टूटे डिब्बों में पानी जमा न होने दें। पानी की टंकियों को हमेशा एयरटाइट ढक्कन से बंद रखें। घर की छत पर रखे कबाड़ को ऐसा रखें कि उसमें पानी एकत्र न हो तथा उसे किसी पालीथीन से ढक दें, पंक्चर और टायर की दुकानों में रद्दी टायरों को ढक कर रखा जाए, सड़क के किनारे पड़े प्लास्टिक की पन्नियों एवं प्लास्टिक की बोतलों तथा नारियल के खोल को एकत्र करके बेस्ट निस्तारित करने वाली जगह पर भेजा जाए तथा इस बात का ध्यान रखा जाए कि भवन निर्माण की जगह पर स्वच्छ जल इकट्ठा न होने पाए। अपने घरों के चारों तरफ यदि कहीं पर स्वच्छ जल इकट्ठा हो रहा है तो उसको पाट दिया जाए तथा जिसे पाटा नहीं जा सकता हो उसमें मोबिआयल या डीजल डाल दिया जाए यदि घर के अगल-बगल कोई छोटा तालाब है तो उसमें जले हुए मोबिआयल में बुरादे की बाल भिगो कर डाल दें और यह प्रक्रिया प्रत्येक 10-12 दिन में एक बार अवश्य करें। एक बाल 8 से 10 मी के तालाब के लिए पर्याप्त होती है। इससे आपके आबादी क्षेत्र में मच्छरों का घनत्व काफी कम हो जाएगा।

2. अपनी सुरक्षा के लिए दिन के समय भी पूरी बांह के कपड़े और पैंट पहनें। त्वचा पर मच्छर रोधी क्रीम लगाएं। घरों की खिड़कियों और दरवाजों पर महीन जाली लगवाएं और रात में सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग करें। याद रखिये- ”कचरा कचरादानी में, सोए मच्छरदानी में”

डॉ आशुतोष ने लोगों को सलाह दी है कि इतना याद रखें कि डेंगू एक गंभीर बीमारी जरूर है, लेकिन यदि सही जानकारी, समय पर जांच और व्यक्तिगत व सामाजिक सतर्कता से इसे पूरी तरह हराया जा सकता है। याद रखें स्वच्छता ही डेंगू का सबसे बड़ा इलाज है। आइए, जागरूक नागरिक बनें और अपने घर व समाज को डेंगू-मुक्त बनाने का संकल्प लें।