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22 सितम्बर तक शासनादेश न हुआ तो आंदोलन करेगा राजकीय नर्सेस संघ

-लंबित मांगों पर राजकीय नर्सेस संघ उत्तर प्रदेश ने उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक को पत्र लिखा

सेहत टाइम्स

लखनऊ। राजकीय नर्सेस संघ उत्तर प्रदेश ने नर्सों की मांगों पर 11 माह पूर्व नवम्बर 2025 में उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक की स्पष्ट सहमति एवं फरवरी 2026 में अपर मुख्य सचिव द्वारा शासन स्तर पर बनी सहमति के बावजूद अब तक शासनादेश न किये जाने पर रोष जताते हुए कहा है कि अब नर्सिंग संवर्ग को केवल आश्वासन नहीं, लिखित शासनादेश चाहिए, यदि 22 सितम्बर तक मांगों पर शासनादेश निर्गत नहीं किया गया, तो संघ बाध्य होकर 26 सितम्बर को होने वाली कार्यकारिणी बैठक में आगामी रणनीति तय करेगा और चरणबद्ध आंदोलन की घोषणा करेगा, आंदोलन किस रूप में और कितने व्यापक स्तर पर होगा, इसका निर्णय कार्यकारिणी करेगी।

धैर्य की भी एक सीमा

इस आशय का पत्र संघ की ओर से उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक को भेजा गया है। इसकी जानकारी एक प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से देते हुए संघ के महामंत्री अशोक कुमार ने कहा है कि नर्सिंग संवर्ग ने हमेशा धैर्य रखा है। सरकार के हर आश्वासन का सम्मान किया है, लेकिन धैर्य की भी एक सीमा होती है। राजकीय नर्सेस संघ स्पष्ट कर देना चाहता है कि नर्सिंग संवर्ग अपने अधिकारों, सम्मान और न्याय के लिए पीछे हटने वाला नहीं है। उन्होंने कहा है कि 8 नवम्बर 2025 को राजकीय नर्सेस संघ उत्तर प्रदेश के अधिवेशन में उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने संघ की 13 सूत्रीय मांगों में से 5 मांगों पर अपनी स्पष्ट सहमति व्यक्त की थी। इसके बाद महानिदेशक, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं, उत्तर प्रदेश द्वारा इन पांचों मांगों पर अपनी लिखित आख्या शासन को भेजी गई।

उन्होंने बताया है कि इसके बाद 2 फरवरी 2026 को अपर मुख्य सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अमित घोष जी के साथ संघ के प्रतिनिधिमंडल की बैठक हुई। बैठक में शासन स्तर पर भी मांगों पर सहमति बनी और आश्वासन दिया गया कि शीघ्र शासनादेश जारी किया जाएगा, लेकिन आज तक शासनादेश जारी नहीं हुआ।

समान कार्य के लिए समान भत्ते

नर्सिंग संवर्ग की मांगों के सम्बन्ध में उनका कहना है कि इनमें सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा समान कार्य के लिए समान भत्ते है। जब एसजीपीजीआई लखनऊ, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान लखनऊ, केजीएमयू लखनऊ और सैफई आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय में कार्यरत नर्सिंग संवर्ग का वेतनमान, शैक्षिक अर्हता, कार्य की प्रकृति एवं जिम्मेदारियां समान हैं, तो फिर भत्तों में इतनी बड़ी असमानता क्यों? उन्होंने कहा कि यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि कल्याण सिंह सुपर स्पेशलिस्ट कैंसर संस्थान, लखनऊ को भी उच्च संस्थानो के बराबर भत्ते नहीं प्रदान किए जा रहे हैं।

संघ ने कहा है कि एक ही प्रदेश में एक ही कार्य करने वाले नर्सिंग कर्मचारियों के साथ दोहरे मापदंड क्यों?राजकीय नर्सेस संघ उत्तर प्रदेश की मांग है कि चिकित्सा एवं स्वास्थ्य तथा चिकित्सा शिक्षा विभाग में कार्यरत नर्सिंग संवर्ग को भी उच्च संस्थानों के समान भत्ते तत्काल प्रदान किए जाएं। उन्होंने कहा कि नर्सिंग संवर्ग लंबे समय से गृह जनपद में नियुक्ति एवं स्थानांतरण की मांग कर रहा है। इस मांग पर भी सकारात्मक सहमति के बावजूद शासनादेश अभी तक लंबित है। जबकि स्थानांतरण सत्र में चुनिन्दा लोगो के स्थानांतरण गृह जनपद में की गयी शिकायत पर अभी तक जांच ही चल रही है।

उच्च पदों पर नियुक्ति

खाली पड़े उच्च पदों पर नियुक्ति की मांग के बारे में उन्होंने कहा कि वर्ष 2010 से निदेशालय स्तर से लेकर चिकित्सालय स्तर तक नर्सिंग संवर्ग के महत्वपूर्ण उच्च पद रिक्त हैं। निदेशालय स्तर के चार महत्वपूर्ण पद लगातार रिक्त चल रहे हैं। नर्सिंग सेवाओं का नेतृत्व नर्सिंग संवर्ग के अधिकारियों के हाथों में होना चाहिए। वर्षों तक उच्च पदों को रिक्त रखना नर्सिंग व्यवस्था को कमजोर करने वाला कदम है। उन्होंने कहा कि इसके अलावा साल में दो बार लगाया जाने वाला ए सी पी भी नहीं लगाया जा रहा है।

क्रेच/पालनाघर की व्यवस्था

विज्ञप्ति में कहा गया है कि जहां महिला कर्मचारी कार्यरत हैं, वहां क्रेच/पालनाघर की व्यवस्था सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है। निर्देश होने के बावजूद अधिकांश स्थानों पर यह व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित है।
अब कागजी आदेश नहीं, धरातल पर व्यवस्था चाहिए। इसी प्रकार सवेतन अध्ययन अवकाश की सुविधा की मांग पर कहा गया है कि जब B.Sc. Nursing (Post Basic) के लिए दो वर्ष का सवेतन अध्ययन अवकाश दिया जा सकता है, तो M.Sc. Nursing करने वाले नर्सिंग कर्मचारियों के लिए सवेतन अध्ययन अवकाश क्यों नहीं?

विज्ञप्ति में मेडिकल कॉलेजों में समायोजन की मांग पर कहा गया है कि जिन जिला चिकित्सालयों को उच्चीकृत कर मेडिकल कॉलेज बनाया जा रहा है, वहां कार्यरत नर्सिंग संवर्ग के कर्मचारियों के संबंध में शासन स्तर पर यह सहमति बनी थी कि उन्हें वहीं समायोजित किया जाए अथवा पद सहित चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग में वापस किया जाए। शासन के निर्देश के बावजूद यदि निदेशालय स्तर पर कार्रवाई नहीं होती है तो यह अत्यंत गंभीर विषय है।