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फेफड़ों के कैंसर के इलाज में मानसिक स्वास्थ्य पर भी रखना होगा ध्यान : डॉ सूर्यकान्त

-केजीएमयू के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग में शोध- बड़ी संख्या में मरीज चिंता, अवसाद और तनाव के शिकार

डॉ सूर्यकान्त

सेहत टाइम्स

लखनऊ। विश्व फेफड़ा कैंसर दिवस के अवसर पर किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू), लखनऊ के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के विशेषज्ञों ने कहा है कि फेफड़ों के कैंसर के इलाज के साथ मरीजों के मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है। विभाग के शोधकर्ताओं का यह अध्ययन ’’जर्नल ऑफ द इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (जीमा) में प्रकाशित हुआ है।

90 मरीजों पर किया गया शोध

अध्ययन में फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित 90 मरीजों का मूल्यांकन किया गया। शोध में पाया गया कि बड़ी संख्या में मरीज चिंता, अवसाद और मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं। अध्ययन में सामने आया कि फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित बड़ी संख्या में मरीज मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। शोध के अनुसार 55.56 प्रतिशत मरीजों में मध्यम स्तर की चिंता, 26.67 प्रतिशत में मध्यम स्तर का अवसाद, 34.44 प्रतिशत में हल्का अवसाद तथा 12 प्रतिशत मरीजों में मानसिक तनाव के लक्षण पाए गए।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि अधिक उम्र, धूम्रपान की आदत, कैंसर की बढ़ी हुई स्टेज तथा बीमारी के गंभीर लक्षण मानसिक समस्याओं के खतरे को बढ़ाते हैं। इसलिए फेफड़ों के कैंसर के प्रत्येक मरीज की नियमित मानसिक स्वास्थ्य जांच की जानी चाहिए।

मानसिक स्वास्थ्य का नियमित मूल्यांकन जरूरी

अध्ययन के वरिष्ठ लेखक ’’ डॉ. सूर्यकान्त’’ ने कहा कि फेफड़ों के कैंसर के समग्र उपचार में मानसिक स्वास्थ्य का मूल्यांकन नियमित प्रक्रिया का हिस्सा होना चाहिए। कैंसर एवं श्वसन रोग क्लीनिकों में मनोवैज्ञानिक सेवाओं को शामिल करने से मरीजों का मानसिक तनाव कम किया जा सकता है और उन्हें बेहतर एवं समग्र उपचार मिल सकता है।

इण्डियन सोसाइटी फॉर स्टडी ऑफ लंग कैंसर की राष्ट्रीय कार्यकारणी सदस्य डॉ. सूर्यकान्त ने बताया कि देश में प्रतिवर्ष लगभग एक लाख फेफड़े के कैंसर के रोगी चिन्हित किये जाते हैं, लेकिन सबसे दुखत बात यह है कि प्रतिवर्ष 85 हजार रोगी की मौत फेफड़े के कैंसर के कारण हो जाती है। डॉ. सूर्यकान्त ने आगे बताया कि धूम्रपान, लकड़ी के चूल्हे का धुआँ, फैक्टरी का धुआँ, वायु प्रदूषण आदि प्रमुख कारक हैं जिनसे देश में फेफड़े के कैंसर के रोगी बढ़ रहे हैं। डॉ सूर्यकान्त ने बताया कि इस वर्ष की थीम “फेफड़ों के कैंसर का सामना साथ मिलकर” है। उन्होंने कहा की फेफड़ों के कैंसर से लड़ने के लिए समाज में जागरूकता हेतु सभी लोगों की भागीदारी की आवश्यकता है।

मानसिक स्वास्थ्य की हो जाती है अनदेखी

रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर ’’डॉ. ज्योति बाजपेयी’’ ने कहा कि फेफड़ों के कैंसर के उपचार में आमतौर पर सर्जरी, कीमोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी पर अधिक ध्यान दिया जाता है, जबकि मरीज के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य की अक्सर अनदेखी हो जाती है। यदि अवसाद और चिंता की समय रहते पहचान कर उनका उपचार किया जाए तो मरीज का जीवन स्तर बेहतर होता है और इलाज के अच्छे परिणाम मिलते हैं।

शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया कि जिन मरीजों में हल्का मानसिक तनाव हो, उन्हें समय पर मनोवैज्ञानिक परामर्श दिया जाए, जबकि मध्यम या गंभीर मानसिक परेशानी वाले मरीजों को आवश्यकतानुसार मनोवैज्ञानिक परामर्श के साथ दवाओं का भी उपचार उपलब्ध कराया जाए। विश्व फेफड़ा कैंसर दिवस के अवसर पर विशेषज्ञों ने चिकित्सकों, नीति-निर्माताओं और आम जनता से अपील की कि फेफड़ों के कैंसर का सफल उपचार केवल बीमारी को नियंत्रित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि मरीजों और उनके परिवारों की मानसिक एवं भावनात्मक समस्याओं का समाधान भी उतना ही जरूरी है।

यह शोध डॉ. अरुण कुमार, डॉ. अजय कुमार वर्मा, डॉ. ज्योति बाजपेयी, डॉ. अनुज कुमार पाण्डेय, डॉ. सूर्यकान्त, डॉ. सुजिता कुमार कर, डॉ. एस.के. वर्मा, डॉ. आर.ए.एस. कुशवाहा, डॉ. संतोष कुमार, डॉ. राजीव गर्ग, डॉ. आनंद श्रीवास्तव, डॉ. दर्शन कुमार बजाज, डॉ. अंकित कुमार तथा डॉ. प्रांजल त्रिपाठी द्वारा रेस्पिरेटरी मेडिसिन एवं मनोरोग विभाग के सहयोग से किया गया।