Thursday , August 18 2022

33 मौतों पर हायतोबा, तो तीन हजार मौतों की अनदेखी क्‍यों ?

-तम्‍बाकू के सेवन से होने वाली मौतों को लेकर जनता के लिए प्रो सूर्यकांत का महत्‍वपूर्ण संदेश

-कोरोना काल के बीच विश्‍व तम्‍बाकू निषेध दिवस पर सरकारों को भी आत्‍मचिंतन करने की जरूरत

-विश्‍व तम्‍बाकू निषेध दिवस के मौके पर तम्‍बाकू को पूर्ण निषेध करने का किया अनुरोध

डॉ. सूर्यकांत

धर्मेन्‍द्र सक्‍सेना

लखनऊ। वैश्विक महामारी कोरोना का डंका इस समय पूरी दुनिया में बजा हुआ है, इससे स्‍वास्‍थ्‍य को होने वाले खतरों से निपटने और इससे बचाव के लिए सभी देश लगे हुए हैं, कोविड-19 के इलाज के लिए दवा, वैक्‍सीन पर रिसर्च चल रही है। भारत की बात करें तो जबकि इससे होने वाली मौतों का प्रतिशत मात्र दो फीसदी है, भारत में यह वायरस आये लगभग पांच माह हो रहे हैं और इससे पांच हजार मौतें हुई हैं (यानी रोज करीब 33 मौतें)।। इसका आशय यह नहीं है कि कोविड को लेकर की जा रही कोशिशें बेमानी हैं। अब बात करते हैं तम्‍बाकू के सेवन की। तम्‍बाकू के सेवन से भारत में 12 लाख लोग वर्ष भर में दम तोड़ देते हैं, यानी रोज 3000 से ज्‍यादा लोग दम तोड़ देते हैं, जबकि इन मौतों को बचाया जा सकता है, इसके लिए न ही किसी वैक्‍सीन की खोज करनी है और न ही दवा की, इसके लिए सिर्फ इच्‍छा शक्ति को तेज कर तम्‍बाकू का सेवन बंद करने की जरूरत है। ऐसा करके हम रोज की 3000 मौतों को बचा सकते हैं। कोरोना काल के बीच आज मनाये जा रहे विश्‍व तम्‍बाकू निषेध दिवस पर हमें, हमारी सरकारों सभी को इस पर विचार करने की जरूरत है।

यह बात विश्‍व तम्‍बा‍कू निषेध दिवस पर स्टेट टोबैको कंट्रोल सेल के सदस्य व किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के रेस्परेटरी मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष डॉ. सूर्यकांत ने सेहत टाइम्‍स से बात करते हुए कही। उन्‍होंने कहा कि भारत में तम्बाकू का प्रचलन अकबर के कार्यकाल के समय 1556 में शुरू हुआ था, जब‍ पुर्तगाली व्‍यापार करने यहां आये। यहां इसकी सबसे पहले शुरुआत हुक्‍के से हुई। धीरे-धीरे इसकी लत बढ़ गयी और जब इसकी खपत काफी मात्रा में होने लगी तो शासक अकबर के पुत्र जहांगीर ने इसे राजस्‍व प्राप्ति का अच्‍छा स्रोत मानकर इस पर टैक्‍स लगाना शुरू कर दिया। और स्थिति यह हो गयी कि कई शताब्‍दी बीतने के बाद भी तम्‍बाकू सरकारों की आय का बड़ा स्रोत बना हुआ है। हालांकि सच यह है कि आय का बड़ा स्रोत होने के बावजूद यह सरकार को घाटा ही पहुंचाता है, क्‍योंकि इससे जितना राजस्‍व मिलता है उससे कई गुना ज्‍यादा इससे होने वाली बीमारियों के प्रबंधन पर सरकार का खर्च हो जाता है।

उन्‍होंने बताया कि भारत विश्‍व का दूसरा बड़ा तम्‍बाकू उत्‍पादक देश है, चीन का स्‍थान पहले नम्‍बर पर है। भारत में मुख्‍यत: तीन राज्‍यों आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में प्रति वर्ष करीब 300 मिलियन किलोग्राम तम्‍बाकू का उत्‍पादन होता है, तथा इसके लिए 0.25 प्रतिशत भूमि का प्रयोग किया जाता है। 26 मिलियन भारतीय तम्‍बाकू उद्योगों से जुड़े हुए हैं। उन्‍होंने कहा कि कुछ भी हो लेकिन गलत चीज तो गलत चीज ही है, इसे निषेध करने की पहल तो करनी ही पड़ेगी।

उन्‍होंने कहा कि हालात ये हैं कि बीड़ी-सिगरेट व अन्य तम्बाकू उत्पादों का सेवन करने वाले लोग न केवल अपने जीवन से खिलवाड़ करते हैं बल्कि घर-परिवार की जमा पूँजी को भी इलाज पर फूंक देते हैं। इस पर काबू पाने के लिए सरकार और स्वास्थ्य महकमे के साथ ही विभिन्न संस्थाएं भी लोगों को जागरूक करने में जुटी हैं। यह समस्या केवल भारत की नहीं बल्कि पूरे विश्व की समस्या बन चुकी है। इसी को ध्यान में रखते हुए हर साल 31 मई को विश्व तम्बाकू निषेध दिवस मनाया जाता है, जिसके जरिये लोगों को तम्बाकू के खतरों के प्रति सचेत किया जाता है।  इस बार कार्यक्रम की थीम युवाओं पर आधारित है- “प्रोटेक्टिंग यूथ फ्रॉम इंडस्ट्री मैनिपुलेशन एंड प्रिवेंटिंग देम फ्रॉम टोबैको एंड निकोटिन यूज” ।

​डॉ. सूर्यकांत का कहना है कि बीड़ी-सिगरेट व अन्य तम्बाकू उत्पादों के सेवन से होने वाली इतनी बड़ी संख्‍या में मौत के आंकड़ों को देखते हुए सार्वजनिक स्थलों और स्कूलों के आस-पास बीड़ी-सिगरेट व अन्य तम्बाकू उत्पादों की बिक्री पर रोक के लिए केंद्र सरकार सन 2003 में सिगरेट एवं अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम (कोटपा) ले आई है, जिस पर सख्ती से अमल की जरूरत है, तभी स्थिति में सुधार देखने को मिल सकता है। ​डॉ. सूर्यकांत का कहना है कि हमारा युवा शुरू-शुरू में महज दिखावा के चक्कर में सिगरेट व अन्य तम्बाकू उत्पादों की गिरफ्त में आता है जो कि उसे इस कदर जकड़ लेती है कि उससे छुटकारा पाना उसके लिए बड़ा कठिन हो जाता है