फि‍ल्‍म इंडस्‍ट्री में जातिवाद तो नहीं, लेकिन क्षेत्रवाद जरूर चलता है

-संघर्षों के बाद बॉलीवुड में मुकाम पाये लखनऊ के संदीप यादव ने खोले दिल के पन्‍ने

सेहत टाइम्‍स ब्‍यूरो

लखनऊ। लखनऊ के ग्रामीण परिवार से निकलकर अभिनय की दुनिया मे धीरे धीरे अपनी पैठ जमाने वाले संदीप यादव आज बॉलीवुड के लिए नये नहीं रह गये हैं, पहली बार पीपली लाइव जैसी फि‍ल्‍म में अभिनय करने के बाद वे कई बड़े कलाकारों और निर्माताओं की पसंद बन चुके हैं। संदीप का  कहना है कि फि‍ल्‍म इंडस्‍ट्री में जातिवाद तो ज्‍यादा नहीं, लेकिन क्षेत्रवाद जरूर चलता है।

अपने बचपन से लेकर अब तक की कहानी बताते हुए संदीप कहते हैं कि गॉव में बचपन बीता, बचपन में मैं बहुत शैतान था। खेतीबाड़ी करना, खेलकूद यही सब काम था। वहीं के स्कूल में शुरुआती शिक्षा दीक्षा हुई। पिता जी सरकारी नौकरी में रहे। उनका ट्रांसफर नैनीताल(अब उधमसिंह नगर) हो गया तो ट्रासंफर के एक वर्ष के बाद वे मुझे भी अपने साथ ले गए कक्षा छह से लेकर नौवीं तक वहीं पढ़ाई की फिर बाद में पिता का ट्रासंफर फ़ैज़ाबाद हो गया तो 12वीं तक की पढ़ाई फिर फ़ैज़ाबाद(अब अयोध्या) से हुई। संदीप बताते हैं कि 12वीं में एक बार फेल हो गया था उस दौरान समझ में आया कि पढ़ाई मेरे वश की नहीं है फिर लखनऊ आये तथा भारतेन्दु नाट्य अकादमी में रंगमंच की कार्यशाला में एडमिशन मिल गया और यहीं फिर नाटकों से अभिनय की शुरुआत हो गयी।

घरवाले नहीं चाहते थे कि रंगमंच के क्षेत्र में जाऊं

संदीप बताते हैं कि घर वाले पूरी तरह से मेरे इस फैसले से नाराज़ थे उन्होंने मुझे रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन मैं उनसे लड़ते-झगडते निरन्तर थिएटर करता रहा। धीरे-धीरे रंगमंच के क्षेत्र में लखनऊ के सभी बड़े निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिला। इस बीच मैंने प्राइवेट बी ए और एम ए भी कर लिया।

2006 में मुझे स्पिक मैके की स्कॉलरशिप मिली जिसमें मुझे हबीब तनवीर साहब से थिएटर सीखने का मौका मिला फिर मैंने उनके साथ करीब चार साल लागातार फिर बाद के वर्षों में समय समय पर नाटक करता रहा। वहाँ रहते हुए पूरा देश घूमने का मौक़ा मिला साथ ही साथ अभिनय के प्रति समझ बढ़ी।

आमिर खान ने दिया पीपली लाइव में काम

‘पीपली लाइव’ में काम मिलने के बारे में संदीप बताते हैं कि हबीब साहब के साथ थिएटर करते हुए ही मुझे आमिर खान की फ़िल्म ‘पीपली लाइव’ मिली। दरअसल हमारा एक नाटक आमिर खान ने मुम्बई में देखा था नाटक देखने के बाद वे सभी कलाकारों से ख़ूब प्रभावित हुए थे और कहा था कि आपके एक्टर्स के साथ एक फ़िल्म ज़रूर बनाऊंगा उसी का नतीजा था फ़िल्म पीपली लाइव। जिसे हमारी सीनियर अनुषा रिज़वी और महमूद फारुखी ने डायरेक्टर किया। इन दोनों निर्देशकों से भी काफी सीखने का मौका मिला।

मैं थिएटर में लगातार काम करता रहा उसी दौरान हबीब साहब का इंतकाल हो गया उसके बाद वहाँ मन नहीं लगा तो मैं लखनऊ आ गया यहाँ कुछ दिन पत्रकारिता की लेकिन फिर उसमें थोड़े ही दिन बाद मन भरने लगा, लखनऊ थिएटर से रोज़ी-रोटी चला पाना मुश्किल था, अंततः मैंने मुम्बई की राह पकड़ी।

नया शहर, नए लोग नया कल्चर

फिल्म के नाम पर मेरे पास सिर्फ एक अनुभव था पीपली लाइव उसी के सहारे मुम्बई के प्रोड्यूसर्स के ऑफिस के चक्कर लगाने शुरू किए धीरे-धीरे सीरियल में छोटे मोटे रोल मिलने शुरू हुए और फिर धीरे-धीरे गाड़ी चल पड़ी।  फिर मैंने सी आई डी, सावधान इंडिया, क्राइम पेट्रोल,  चिड़ियाघर, न आना देश में लाडो समेत कई सीरियल में काम किया। दूरदर्शन के कई सीरियल मिले। सीरियल की दुनिया में सबसे ज़्यादा चर्चित सीरियल रहा ‘भाभी जी घर पर हैं’।

चक्रव्यूह, हेट स्टोरी, पीपली लाइव, बाटला हाउस मेरी चर्चित फिल्में हैं। अभी हाल ही में आयी जॉन अब्राहम स्टारर फ़िल्म से मुझे कैरियर में बहुत फायदा हुआ। इस साल आने वाली मेरी फिल्में हैं अमिताभ बच्चन संग गुलाबो-सिताबो, अभिनव सिन्हा निर्देशित थप्पड़। इसके अलावा निखिल आडवाणी प्रोडक्शन की वेब सीरीज़ हँसमुख, आईपीएस नवनीत सिकेरा के जीवन पर आधारित वेब सीरीज़ भौकाल प्रमुख हैं। इन दिनों प्रकाश झा के निर्देशन में वेब सीरीज़ आश्रम की शूटिंग कर रहा हूँ।

संदीप यादव का कहना है कि फ़िल्म इंडस्ट्री में जातिवाद तो नहीं हैं ज़्यादा लेकिन क्षेत्रवाद ज़रूर है। जो जिस स्कूल जिस संस्थान से है वो वहां के लोगों को पहली प्राथमिकता देता है अभिनय में मौका देने के लिए।

पैसों के लिए करता हूं घोस्‍ट राइटिंग

जब मैं फिल्मों में काम नहीं कर रहा होता हूँ तो मैं थिएटर वर्कशॉप लेता हूँ, बच्चों को थिएटर सिखाता हूँ, पैसों के लिए कुछ नए फिल्म राइटर्स के लिए घोस्ट राइटिंग करता हूँ, कभी-कभी दुःख होता है जब अपने लिखे संवाद सुनता हूँ लेकिन उसका क्रेडिट किसी और को मिल रहा होता है। ख़ैर…

मैं रोमांटिक आदमी हूँ जीवन में रोमांस की कोई कमी नहीं रही। एक नाम हो तो बताऊँ कई नाम हैं मुझे ये कहने में कोई झिझक नहीं है। मैं अपना अकेलापन इंजॉय करता हूँ।

अकेले रहना, खाना-पीना, लिखना-पढ़ना सिनेमाघरों में अकेले जाकर फ़िल्म देखना सब मुझे बहुत पसंद है। मैं अकेले लॉन्ग ड्राइव पर जाना भी खूब पसंद करता हूँ अगर कोई मुझे मेरे जैसा मिल जाता है तो तो कुछ दिन अच्छा पल उसके साथ जी लेता हूँ। खुले विचारों वाले लोगों को मैं पसंद करता हूँ। अपनी राजनीतिक पोस्ट सोशल मीडिया पर लिखने की वजह से मुझे मेरे कैरियर में बहुत नुकसान हुआ कई कास्टिंग डायरेक्टर्स, निर्देशक मुझसे नाराज़ हुए। अजीब दौर है यह जहाँ आप अपने विचारों को खुल कर कह नहीं सकते बोल नहीं सकते यदि आप ऐसा करते हैं तो आप अपने कैरियर में नुकसान उठाते हैं। ये दौर देश के लिए लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं हैं। नए लोगों के लिए यही संदेश है कि सिर्फ़ जिम जाने, महंगी गाड़ी, महँगे फ़ोन, लेट नाईट पार्टी से एक्टिंग नहीं आएगी। अभिनेता बनना है तो अभिनय सीखना होगा।

नये युवाओं से कहा…

किसी एक्टिंग स्कूल, थिएटर ग्रुप या किसी अच्छे अभिनय गुरु से सीख समझ कर ही फिल्मों में अभिनय के लिए कूच करें। जब आप डॉक्‍टर इंजीनियर बनने के लिए सालों की पढ़ाई, तैयारी के लिए समय देते हैं तो अभिनय के लिए उतना समय क्यों नहीं देते। अब बहुत स्कोप है नए लोगों के लिए क्यों कि अव वेबसीरीज़ का ज़माना है जहाँ बहुत ही रियलिस्टिक एप्रोच के साथ काम हो रहा है आने वाला वक़्त नए युवाओं का है। नए लेखक, अभिनेता, निर्देशक बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। नए नए विषय आ रहे हैं, यह समय नए सिनेमा का है।