वह ‘चुभती हुई बात’ जिसने डॉ गिरीश गुप्‍ता को शोधकर्ता बना दिया…

-ऐलोपैथिक डॉक्‍टर ने विटिलिगो (सफेद दाग) को ठीक करने की दी थी चुनौती

डॉ गिरीश गुप्‍ता

सेहत टाइम्‍स ब्‍यूरो

लखनऊ। गोस्‍वामी तुलसीदास अपनी पत्‍नी से बेहद प्‍यार करते थे। हालत यह थी कि एक बार पत्‍नी के मायके में होने पर उनसे मिलने की अपनी तीव्र इच्‍छा को तुलसीदास दबा नहीं सके, और भारी बरसात के बीच अपनी ससुराल पहुंच गये, रात्रि में देर होने के कारण घर के दरवाजे बंद हो चुके थे, तो ऊपर के कक्ष में मौजूद अपनी पत्‍नी से मिलने को व्‍याकुल गोस्‍वामी तुलसीदास लटकते सांप को रस्‍सी समझकर उसकी पूंछ पकड़ कर चढ़ गये। पत्‍नी ने उन्‍हें देखा तो बोली हाड़-मांस की देह से इतना लगाव करते हो, इतना लगाव अगर प्रभु से किया होता तो जीवन सुधर जाता, बस यही बात उन्‍हें लग गयी और फि‍र उनका जीवन यहीं से बदल गया और रामचरित मानस जैसा ग्रंथ लिखकर महान कवि हो गये। यहां इस प्रसंग को सुनाने का आशय यह है कि समय की बात होती है कि किस समय कौन सी बात किसे लग जाये, जिससे कुछ अच्‍छे की उत्‍पत्ति हो जाती है। ऐसी ही बात लगने की एक घटना ने लखनऊ के होम्‍योपैथिक के एक निजी चिकित्‍सक को शोधकर्ता बना दिया। आज स्थिति यह है कि आधुनिक चिकित्‍सा पद्धति में जिन रोगों का इलाज सिर्फ सर्जरी है, ऐसे स्‍त्री रोगों तथा त्‍वचा के जटिल रोगों पर रिसर्च, सबूत सहित होम्‍योपैथिक इलाज पर इस शोधकर्ता द्वारा लिखीं दो किताबें विदेशों में रहने वाले होम्‍योपैथिक चिकित्‍सकों में भी तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं। यह शोधकर्ता हैं राजधानी लखनऊ स्थित गौरांग क्‍लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्‍योपैथिक रिसर्च के संस्‍थापक डॉ गिरीश गुप्‍ता।

डॉ गिरीश गुप्‍ता लिखित पुस्‍तक Evidence based Research of Homeopathy in Dermatology की अमेरिका की कविता होलिस्टिक की डॉ कविता कुकुनूर व ब्राजील की प्रो रेगिना रियानेली द्वारा समीक्षा की गयी है। अंग्रेजी में प्रसारित इस समीक्षा में डॉ गिरीश ने अपनी शोधयात्रा की रोचक जानकारी के बारे में भी बताया है। इस विषय पर ‘सेहत टाइम्‍स’ ने डॉ गिरीश गुप्‍ता ने बात की। डॉ गुप्‍ता ने बताया कि वर्ष 1992 में लखनऊ में प्रख्यात होम्योपैथी डॉक्टरों की एक बैठक लखनऊ में डॉ नरेश अरोड़ा के घर पर आयोजित हुई थी इस बैठक में होम्‍योपैथी दवाओं पर विश्‍वास रखने वाले आधुनिक चिकित्सा पद्धति के चिकित्सक ईएनटी सर्जन डॉ सीवी पांडेय भी उपस्थित थे। उस बैठक में डॉ पांडेय ने कहा कि होम्योपैथिक डॉक्टर्स रोगों के ठीक होने के दावे तो बहुत करते हैं लेकिन असलियत में इसके परिणाम बहुत कम हैं, विशेषकर त्वचा रोगों में। डॉ पाण्‍डेय ने चुनौती दी कि इस पृथ्वी पर एक भी डॉक्टर ऐसा नहीं है जो विटिलिगो (सफेद दाग) का एक भी केस ठीक कर सके। उन्होंने कहा कि मैंने आज तक विटिलिगो या सोरियासिस का एक भी केस नहीं देखा जो होम्‍योपैथी से ठीक हुआ हो, जबकि डॉक्‍टर्स दावे बड़े-बड़े करते हैं। 

डॉ गुप्‍ता ने बताया कि मुझे उनकी यह बात चुभ गयी, उस रात मैं सोया नहीं, मैं यह सोचता रहा कि होम्योपैथी दवाओं पर विश्वास रखने वाले डॉ सीवी पांडेय ने ऐसी बात क्यों कह दी। इसके बाद मैंने सोचा कि दुनिया में तब तक इस पर कोई विश्वास नहीं करेगा जब तक कि सबूत नहीं देख लेगा। इसके बाद मैंने एक रिसर्च सेंटर स्थापित किया और सभी केस की फोटोग्राफी करना और रिकॉर्ड रखना शुरू कर दिया, उस जमाने में कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल का इतना प्रचलन नहीं था इसलिए मैंने हार्ड कॉपी में ही सारे रिकॉर्ड रखने शुरू किए, हालांकि इस पर मेरा काफी धन और मेहनत लगी। डॉ गिरीश गुप्‍ता बताते हैं कि जब करीब 100 से ज्यादा केस हो गए तो मैंने विश्‍लेषण किया कि केस ठीक तो होते हैं। इसके बाद मेरा विश्‍वास और बढ़ता गया, मैं रोगियों को ठीक करता रहा, रिकॉर्ड रखता रहा। उन्‍होंने बताया कि विटिलिगो का ठीक हुआ केस पहली बार वर्ष 2002 में जर्नल में छपा इसके बाद सोरियासिस तथा अन्य त्वचा रोग के जटिल केसेस ठीक होने के पेपर भी छपे।

डॉ गिरीश गुप्ता बताते हैं कि इसके बाद उन्होंने विटिलिगो विषय पर ही एक सेमिनार का आयोजन किया और उसमें डॉ सीवी पांडेय को चीफ गेस्ट के रुप में बुलाया और तब उन्होंने डॉ सीवी पांडेय को इस रिसर्च और सफलता की स्टोरी सुनाई तो उन्होंने कहा कि अरे मैं तो भूल चुका था,  लेकिन तुम उसको याद रखे रहे। डॉ गुप्‍ता ने उस समारोह में कहा कि इस रिसर्च की सफलता के लिए मैं डॉ पांडेय का शुक्रिया अदा करता हूं कि उस दिन उन्‍होंने अगर ऐसी चुनौती न दी होती तो शायद ऐसी सफलता मुझे न मिली होती।