-जीसीसीएचआर के कंसल्टेंट डॉ गौरांग गुप्ता ने खोले अतीत के पन्ने

सेहत टाइम्स
लखनऊ। गौरांग क्लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्योपैथिक रिसर्च (जीसीसीएचआर) के कंसल्टेंट डॉ गौरांग गुप्ता इंजीनियर बन कर मर्चेंट नेवी में जाना चाहते थे, इसके लिए 11वीं में फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथमैटिक्स ग्रुप में एडमिशन भी ले लिया था, लेकिन अचानक इनके मस्तिष्क में उठे झंझावातों ने इन्हें झकझोर कर रख दिया, और फिर फैसला लिया कि माता-पिता के साथ रहते हुए डॉक्टर बनकर पिता डॉ गिरीश गुप्ता द्वारा कड़े संघर्षों के बाद स्थापित किये गए क्लीनिक व रिसर्च सेंटर के कार्यों में उनका हाथ बंटाने का, उन कार्यों को आगे ले जाने का।
राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस के मौके पर ‘सेहत टाइम्स’ ने डॉ गौरांग के अतीत के पन्नों पर लिखी इबारत को पढ़ने की कोशिश की, इसके लिए सीधे डॉ गौरांग से बात की। बड़ी ही बेबाकी के साथ डॉ गौरांग ने बताया कि बचपन से पापा को सुबह से लेकर रात तक काम करते देखता था, यहां तक कि कई बार ऐसा हो जाता था कि मैं उनसे एक-एक हफ्ते बाद छुट्टी वाले दिन ही मिल पाता था, क्योंकि जब मैं घर पर होता था तो पापा क्लीनिक में व्यस्त रहते थे और जब रात में वे लौटते थे तब तक मैं सो जाता था, सुबह मेरे उठने पर स्कूल जाने तक पापा सो रहे होते थे। मेरे मन में यह पीड़ा इतना घर कर गयी थी कि मैंने सोचा था कि कुछ भी बन जाऊंगा लेकिन डॉक्टर नहीं बनूंगा।

डॉ गौरांग बताते हैं कि समय बीतता गया और मैं 11वीं कक्षा में पहुंच गया, अपनी सोच के मुताबिक मेरा पीसीएम (फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथमैटिक्स) ग्रुप में एडमिशन भी हो गया। एक दिन अचानक मेरे मन में आया कि पापा, जिनके खून में होम्योपैथी बसी हुई है, ने कितनी मेहनत से शून्य से उठते हुए क्लीनिक का सेटअप तैयार किया है और कल जब पापा प्रेक्टिस नहीं करेंगे तो इसका क्या होगा, वर्षों की कड़ी मेहनत एक झटके में समाप्त हो जाएगी, बेकार चली जाएगी, यह मैं नहीं होने दूंगा। इसके अतिरिक्त एक और कारण था कि मैं मम्मी-पापा को छोड़कर बाहर दूर जाकर नौकरी करना नहीं चाहता था क्योंकि मेरा मानना था कि जब मां-बाप को आपके साथ की जरूरत होती है, उस समय अगर आप उनके साथ नहीं हैं तो ऐसी परिस्थितियां बहुत कष्ट देती हैं। इन्हीं सब बातों को सोचकर मुझसे रहा नहीं गया और मैंने फैसला ले लिया कि मुझे अब डॉक्टर बनना है। मैंने पापा से कहा कि मुझे बायोलॉजी लेनी है क्योंकि मुझे डॉक्टर बनना है। हालांकि मेरे इस फैसले से घर में पापा-मम्मी का चौंकना स्वाभाविक था। उन्होंने कहा भी कि तुम पर कोई दबाव नहीं है, लेकिन मैंने स्पष्ट कह दिया कि मैंने सोच लिया है कि मैं डॉक्टर ही बनूंगा।
यह पूछने पर कि आप अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं उन्होंने बताया कि अपना पहला पेपर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करना मैं बड़ी उपलब्धि मानता हूं। साइकियाट्री में एमडी करते समय अपनी थीसिस के विषय होम्योपैथी में मन की भूमिका पर तैयार किये पेपर को अलमाटी (कजाकिस्तान) में प्रेजेंट किया था। इसके अलावा पापा के शोध कार्यों को प्रस्तुत करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार प्रभावी तरीके से आंकड़ों (जैसे किडनी के मरीजों पर शोध में क्रिएटिनिन और ब्लड यूरिया के साथ ही ई जी एफ आर के आंकड़े को भी दर्शाना ) को तैयार करने को भी मैं अपनी उपलब्धि मानता हूं क्योंकि यह कार्य मैंने 2015 में तब किया जब मैंने एमडी भी नहीं की थी। डॉ गौरांग के अब तक रिसर्च 12 पेपर्स ऱाष्ट्रीय -अंतर्राष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हो चुके हैं।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि डॉक्टर माता-पिता होने भर से ही संतान का डॉक्टर बनना आसान नहीं होता है क्योंकि उनसे बच्चों को मोटिवेशन तो मिल सकता है लेकिन अपना मुकाम हासिल करने और उसे कायम रखने के लिए मेहनत तो बच्चों को ही करनी पड़ती है।
