श्रीराम के लिए निशानी के रूप में केश चूड़ामणि दी सीताजी ने

ऐशबाग की ऐतिहासिक रामलीला का हो रहा भव्‍य मंचन

लखनऊ। श्री रामलीला समिति ऐशबाग लखनऊ के तत्वावधान में रामलीला ग्राउण्ड में चल रही रामलीला के आज आठवें दिन अशोक वाटिका में रावण सीता संवाद, त्रिजटा सीता संवाद, राम लक्ष्मण संवाद, क्रोधित लक्ष्मण का सुग्रीव के पास जाना, सीता खोज, सम्पाती मिलन, हनुमान का लंका प्रस्थान, समुद्र लांघना, विभीषण हनुमान संवाद, रावण सीता संवाद, हनुमान सीता संवाद, अशोक वाटिका विध्वंस, अक्षय वध, हनुमान का ब्रह्मफांस में बंधना, रावण हनुमान संवाद और लंका दहन लीला हुई।

रामलीला में आज मुख्य अतिथि के रूप में लखनऊ की महापौर संयुक्ता भाटिया को श्री रामलीला समिति के अध्यक्ष हरीशचन्द्र अग्रवाल और सचिव पं0 आदित्य द्विवेदी ने पुष्प गुच्छ, अंगवस्त्र, रामायण और स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया। आज की रामलीला का आरम्भ रावण-सीता संवाद, त्रिजटा-सीता संवाद लीला का मंचन से हुआ, इस प्रसंग में अशोक वाटिका में रावण, सीता जी से कहता है कि वह उसकी बात मान ले और उसकी पत्नी बन जायें, इस पर सीता जी कहती हैं कि वह राम के सिवा किसी और की नहीं हो सकती हैं। इसी बीच त्रिजटा, अशोक वाटिका में प्रवेश करती है तभी रावण उससे कहते हैं कि वह सीता को समझाये कि वह मेरी बात मान ले और पत्नी बन जाये, इस पर त्रिजटा कहती है कि ठीक है इतना कहकर रावण वहां से चला जाता है और त्रिजटा सीता जी से कहती है कि उन्हें ज्ञात हुआ है कि आपके स्वामी श्री राम जी लंका की सीमा के पास हैं, इस बात को सुनकर सीता जी त्रिजटा के गले लग जाती हैं।

अगली प्रस्तुति में राम लक्ष्मण संवाद और क्रोधित लक्ष्मण का सुग्रीव के पास जाने सम्‍बन्‍धी लीला का मंचन हुआ, इस प्रसंग में भगवान राम और लक्ष्मण वन में बैठे आपस में बात करते हैं कि सुग्रीव को अपना राजपाट और पत्नी वापस मिल जाने के बाद वह सब कुछ भूल गया और उसे अपने वचन का ध्यान नहीं रहा। इस बात पर लक्ष्मण, राम से कहते हैं कि भइया मैं सुग्रीव के पास जाता हूं और उसे अपने वचनों को याद दिलाता हूं, जिसके लिए उसने वचन दिया था। आवेग में आकर लक्ष्मण, सुग्रीव की सभा में पहुंचते और कहते हैं कि आपको अपने वचनों का स्मरण नहीं है क्या? भयभीत होकर सुग्रीव कहते हैं कि किन्ही कारणोंवश ऐसा नहीं हो पाया। उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि आप चिंतित न हों मैं शीघ्र ही इस दिशा में कुछ करता हूं।

इस प्रस्तुति के उपरान्त सीता खोज, हनुमान का लंका प्रस्थान, समुद्र लांघना और विभीषण हनुमान संवाद लीला हुई, इस प्रसंग में हनुमान जी, अगंद, जामवंत और सारी वानर सेना सीता जी को ढूंढ़ने के लिए निकल पड़ते हैं और इसी दौरान पता चलता है कि माता सीता शायद लंका में है, इस बात का पता लगाने के लिए हनुमान जी लंका जाने के लिए समुद्र के ऊपर से उड़ कर लंका पहुंचते हैं।

इस लीला के उपरान्त विभीषण हनुमान संवाद, हनुमान सीता संवाद और अशोक वाटिका विध्वंस लीला हुई, इस प्रसंग में हनुमान जी जब लंका पहुंचते हैं तो विभीषण से उनकी मुलाकात होती है और विभीषण हनुमान जी को देखकर काफी प्रसन्न होते हैं और सीता जी के बारे में पूरा वृतान्त बताते हैं। इस बात को सुनकर हनुमान जी इस डाल से उस डाल कूदते हुए अशोक वाटिका में अशोक के पेड़ पर बैठकर ऊपर से भगवान राम की अंगूठी, सीता जी की गोद में गिरा देते हैं, भगवान राम की चूड़ामणि देखकर सीता जी काफी प्रसन्न होती हैं और इधर-उधर देखती है तभी पेड़ से हनुमान जी नीचे उतरकर सीता जी के पास जाकर हाथ जोड़कर खड़े होते हैं और सीता जी को अपने और राम जी के बारें में पूरी बात बताते हैं इस बात से प्रसन्न होकर सीता, हनुमान से राम जी के बारे में पूछती हैं।

इस लीला के बाद अशोक वाटिका विध्वंस लीला, अक्षय वध, हनुमान का ब्रह्मफांस में बंधना, रावण हनुमान संवाद और लंका दहन लीला हुई, इन प्रसंगों में जब हनुमान जी, सीता जी से कहते हैं कि माता रास्ते में आते हुए मुझे काफी भूख लगी है अगर आपकी आज्ञा हों तो मैं कुछ फल खा लूं इस पर वह कहती हैं कि ठीक है आप फल खा लीजिए, सीता जी के कहने पर हनुमान जी अशोक वाटिका में लगे फलों को खाकर इधर-उधर भी फेंकने लगते हैं और हनुमान के इस कृत्य को देखकर रावण के सैनिक हनुमान को पकड़ने की कोशिश करते हैं लेकिन वह असफल होकर अपने राजा को जानकारी देते है, इस बात की भनक जब रावण को लगती है तब रावण कहता है कि उस वानर को पकड़ कर मेरे पास लाओ। मैं भी देखूं कि वह इतना बड़ा कैसे है? कि वह किसी की पकड़ में नहीं आ रहा है, इस पर रावण के सैनिक हनुमान जी को पकड़ने के लिए कई प्रयास करते हैं लेकिन वह असफल होकर वापस रावण के पास जाकर बताते हैं कि वह किसी की पकड़ में नहीं आ रहा है, इस पर रावण अपने पुत्र अक्षय को भेजते हैं, लेकिन वह भी सफल नहीं होता है और अक्षय को वह पेड़ की डाल फेंककर मार देते हैं और इस घटना के बाद रावण अपने पुत्र मेघनाद को भेजते हैं और वह हनुमान जी को ब्रह्मफांस में बांधकर लंका ले जाता है।

रावण, हनुमान जी से लंका आने का कारण पूंछते हैं, इस पर हनुमान जी कहते हैं कि एक दूत को बंदी बनाकर उससे

यह सवाल पूछना उचित नहीं, तब रावण आदेश देते हैं कि इसको खोल दो, तब हनुमान जी अपने आने का प्रयोजन बताते हैं, इससे रावण कुपित होकर सैनिकों को आज्ञा देता है कि इस वानर की पूंछ में आग लगा दो और पूछ में आग लगते ही हनुमान जी पूरी लंका में आग लगाकर वापस सीता जी के पास पहुंचते हैं और उनसे आज्ञा लेते हैं कि वह अब जा रहें हैं इस पर सीता जी कहती हैं कि राम जी से कहना कि मुझे यथाशीघ्र यहां से ले चलें, तभी हनुमान जी को सीता जी अपने केश से केशचूड़ामणि हनुमान जी को देती हैं कि यह भगवान राम को दे दीजिएगा।