अफसोस, किस तरह प्रतिभाओं का रास्‍ता जिंदगी से मौत की तरफ मुड़ जाता है

केजीएमयू के स्‍त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की जूनियर डॉक्‍टर की आत्‍महत्‍या ने गमगीन कर दिया है साथी चिकित्‍सकों और संस्‍थान का माहौल

 

 फाइल फोटो डॉ मनीषा

धर्मेन्‍द्र सक्‍सेना

लखनऊ। परिस्थितियां कब कैसे किसे कहां ले जायें यह कहा नहीं जा सकता। जो चिकित्‍सक अपने मरीजों को जीवन जीने के लिए न सिर्फ स्‍वस्‍थ करता है बल्कि पॉजिटिव थिंकिंग के लिए प्रेरित भी करता है, वहीं चिकित्‍सक दबाव झेलते-झेलते जब थक जाता है तो उसका अंत किस तरह हो सकता है, इसका जीता-जागता सबूत किंग जॉर्ज चिकित्‍सा विश्‍व विद्यालय के स्‍त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की जूनियर डॉक्‍टर (जेआर थ्री) डॉ मनीषा की मौत से समझा जा सकता है। आपको बता दें कि शनिवार को खुदकुशी की कोशिश करने वाली डॉ. मनीषा ने 51 घंटे तक जीवन और मृत्‍यु के संघर्ष के बीच रहने के बाद सोमवार दोपहर को दम तोड़ दिया। हालांकि उसकी मौत के पीछे कोई एक वजह अभी सामने नहीं आयी है लेकिन जो परिस्थितियां हैं और उसके जीवन के उतार-चढ़ाव की जो कड़ियां हैं, उन्‍हें जोड़कर देखा जाये तो समझा जा सकता है कि एक मेधावी और समाजसेवा का भाव रखने वाली महिला चिकित्‍सक के जीवन में परिस्थितियों ने ऐसा मोड़ लाया जिसका रास्‍ता खुशहाल जिंदगी की तरफ न जाकर मौत की अंधेरी गलियों में खत्‍म हुआ।

 

आपको बता दें कि ‘सेहत टाइम्‍स’ का नजरिया न्‍यायालय में चल रहे व्यापमं घोटाले में मुकदमे पर टिप्‍पणी करने का कतई नहीं है। कयोंकि मनीषा का इन्‍वॉल्‍वमेंट था या नहीं था, या कितना था यह सब कोर्ट के निर्णय के बाद ही पता चलेगा लेकिन कुल मिलाकर देखा जाये तो एक ऐसी प्रतिभा, जिसकी चिकित्‍सा का लाभ न जाने कितनी महिलाओं को मिल सकता था, उसका समाप्‍त हो जाना निश्चित ही सोचने पर मजबूर करता है।

 

शनिवार को जब मनीषा ने एनेस्‍थीसिया के लिए दिया जाने वाले इंजेक्‍शन का ओवरडोज लिया था, उसके बाद ही ट्रॉमा सेंटर की वेंटिलेटर यूनिट में भर्ती मनीषा के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। मामले में जूनियर डॉक्टर की बहन ने ट्रामा सर्जरी विभाग में कार्यरत जूनियर डाक्टर उधम सिंह के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने की रिपोर्ट वजीरगंज थाने में दर्ज कराई है। पुलिस ने जांच शुरू कर दी है।

 

कानपुर के चकेरी थाना क्षेत्र के शिवनगर निवासी युवती केजीएमयू के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में एमएस कर रही थी। मनीषा ने अलीगढ़ मुस्लिम विवि से एमबीबीएस करने के बाद वह यहां क्‍वीनमेरी में प्रो. अंजू अग्रवाल की यूनिट पांच में बतौर जेआर थर्ड कार्यरत थी और बुद्धा हॉस्टल के रूम नंबर 309 डी में रहती थी। यह सिंगल बेड का कमरा है।

शनिवार की रात करीब 8:30 बजे वह दोस्तों को कमरे में बेहोश मिली। उसके साथी और ट्रामा सर्जरी विभाग के जूनियर डॉक्टर उधम सिंह ने उसे ट्रामा सेंटर पहुंचाया। उसे गंभीर हालत में वेंटिलेटर यूनिट में रखा गया था। चिकित्सकों के मुताबिक उसने नस में हाई डोज इंजेक्शन लगा लिया था। यह इंजेक्शन ऑपरेशन के दौरान शरीर को शिथिल करने के लिए लगाया जाता है। रविवार शाम से डॉ. मनीषा के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। सोमवार दोपहर डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

 

ट्रॉमा सेंटर से डॉ. मनीषा का शव पोस्टमॉर्टम हाउस पहुंचने पर रिश्तेदारों के साथ ही साथी डॉक्टर की आंखों से भी आंसू बह निकले। बड़ी बहन दीपा गर्भवती हैं। बहन की मौत पर बिलख रहीं दीपा की तबीयत भी बिगड़ने लगी। परिवार के लोगों के साथ ही मनीषा के साथी डॉक्टरों ने किसी तरह उन्हें संभाला। जानकारी के अनुसार पोस्टमॉर्टम के साथ ही विसरा भी सुरक्षित किया गया है।

 

साथी ने व्यापमं में लिया था नाम

मध्य प्रदेश के चर्चित व्यापमं घोटाले की आंच उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में साल 2015 में पहुंची थी। मप्र एसटीएफ को व्यापमं घोटाले की जांच का जिम्मा सौंपा गया था। एसटीएफ ने उप्र के विभिन्न जिलों से कई आरोपितों को गिरफ्तार किया था। पकड़े जाने पर संजय बघेल ने सॉल्वर गैंग में केजीएमयू की डॉ. मनीषा के शामिल होने की जानकारी दी थी। इसके बाद केजीएमयू से डॉ. मनीषा को गिरफ्तार किया गया था। बताया जाता है कि छापेमारी के दौरान उनके पास से पांच लाख रुपये बरामद हुए थे। इसकी जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंपा गया था। छह महीने बाद जमानत मिलने पर कोर्ट की अनुमति पर उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू की थी। हालांकि पूरे मामले में नाम आने के बाद से ही मनीषा तनाव में रहने लगीं थीं।

 

बताया जाता है कि व्‍यापमं घोटाले की सीबीआई जांच चल रही थी और आरोपित मनीषा को महीने में दो बार दूसरे और चौ‍थे रविवार को सीबीआई बुलाती थी। इसी कड़ी में उसे रविवार को भी मध्‍य प्रदेश के ग्‍वालियर स्थित सीबीआई कार्यालय में पेश होना था। लेकिन इससे पूर्व ही शनिवार को उसने आत्‍महत्‍या करने के लिए बेहोशी का इंजेक्‍शन लगा लिया। हालांकि मनीषा के परिजनों ने उसकी मौत के लिए साथी डॉ ऊधम सिंह को जिम्‍मेदार ठहराया है लेकिन बताया जा रहा है कि व्‍यापमं में नाम आने के बाद से ही वह तनाव में थी तथा छह माह जेल में रहने के बाद ही जमानत पर बाहर आने के बाद कोर्ट की परमीशन से एमएस में दाखिला लिया था।