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पिता बनने की चाहत है, तो समझदारी से करें लैपटॉप का इस्तेमाल

-पुरुष बांझपन के कारण-निवारण पर अहम जानकारी दी डॉ गिरीश गुप्ता ने

सेहत टाइम्स

लखनऊ। क्या आप जानते हैं कि आजकल लगभग सभी लोगों के कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लैपटॉप का प्रयोग गोद (जांघों) में रखकर किया जाता है तो यह युवाओं को संतान पैदा करने में अक्षम यानी बांझ बना सकता है। यह कहना है लखनऊ स्थित गौरांग क्लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्योपैथिक रिसर्च के संस्थापक व मुख्य परामर्शदाता डॉ गिरीश गुप्ता का।

ज्ञात हो संतानोत्पत्ति के लिए पुरुष और स्त्री दोनों का ही प्रजनन के दृष्टिकोण से स्वस्थ होना आवश्यक है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि पुरुषों में किसी प्रकार की बीमारी या कमी होने से ऐसा संभव नहीं हो पाता है, जिसे पुरुष बांझपन की संज्ञा दी गयी है। इसकी शारीरिक स्थिति की बात करें तो पुरुषों में पाये जाने वाले शुक्राणुओं की संख्या शून्य होना, कम होना या फिर किसी भी अन्य कारण से प्रजनन में असमर्थ रहने की स्थिति पुरुष बांझपन कहलाती है।

डॉ गिरीश गुप्ता

डेस्क टॉप की तरह करें लैपटॉप का इस्तेमाल

इस महत्वपूर्ण विषय पर ‘सेहत टाइम्स’ से बात करते हुए डॉ गिरीश गुप्ता ने बताया कि अगर पुरुष लैपटॉप का इस्तेमाल अपनी लैप यानी जांघों पर रख कर करते हैं तो उससे निकलने वाली रेडियेशंस का प्रभाव शुक्राणुओं के निर्माण पर पड़ता है। उन्होंने बताया कि ऐसा देखा गया है कि ऐसे पुरुषों ने जब लैपटॉप को जांघों पर रखना बंद कर उसे मेज पर रखकर काम किया तो उनका स्पर्म काउंट बढ़ गया।

ऐसा इसलिए भी होता है

डॉ गुप्ता ने बताया कि लैपटॉप के गलत तरीके से इस्तेमाल के अलावा भी पुुरुष बांझपन के अनेक कारण हैं। इनमें एक कारण है Azoospermia एजूस्पर्मिया, इस स्थिति में वीर्य में शुक्राणु बिल्कुल नहीं बनते हैं। इसी प्रकार अगर पर्याप्त संख्या में (60 मिलियन या इससे ज्यादा) शुक्राणु नहीं बन रहे हैं, तो भी बांझपन की स्थिति हो जाती है। शुक्राणुओं की गतिशीलता में कमी होना, शुक्राणुओं की गुणवत्ता अच्छी न होना भी पुरुष बांझपन के बड़े कारण हैं। इसके अतिरिक्त अंडकोष से प्रोस्टेट तक के रास्ते में बाधा होने पर शुक्राणु वीर्य तक न पहुंच पाने के चलते भी पुरुष बांझपन हो जाता है।

उन्होंने बताया कि इसके अलावा जन्मजात एक स्थिति होती है जिसमें अंडकोष में मौजूद खून की नलियों में गुच्छे वैरिसेस (Varices) होते हैं, यह स्थिति भी शुक्राणु बनने में बाधा पैदा करती है। इसके अतिरिक्त मानसिक तनाव, डायबिटीज, मोटापा, दवाओं का कुप्रभाव भी कहीं न कहीं असर डालता है।

कैसे करायें डायग्नोस

डॉ गिरीश गुप्ता बताते हैं कि सर्वप्रथम तो ऐसी स्थिति की पुष्टि के लिए किसी विशेषज्ञ चिकित्सक से मिलना चाहिये, इसकी डायग्नोसिस के लिए मुख्य रूप से स्पर्म काउंट टेस्ट, अल्ट्रासाउंड टेस्ट, पुरुष टेस्टोस्ट्रोन की कमी का पता लगाने के लिए टेस्टोस्ट्रोन हार्मोन की जांच करायी जाती है।

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कैसे करें उपचार

डॉ गिरीश ने बताया कि डायग्नोसिस में अगर अंडकोष में खून की नलियों में गुच्छे, नसों में ब्लॉकेज जैसी स्थितियां, जो शुक्राणु के वीर्य तक पहुंचने के रास्ते में बाधक हो रही हैं, उनका इलाज तो सिर्फ सर्जरी ही है। लेकिन यदि ओलिगोस्पर्मिया (Oligospermia) की स्थिति है, जिसमें शुक्राणु कम संख्या में बनते हैं, तो इसमें होम्योपैथिक दवाओं से लाभ होता है, मैंने ट्रायल ट्रीटमेंट में पाया है कि होम्योपैथिक दवाओं से कम बनने वाले शुक्राणुओं की संख्या बढ़ गयी। लेकिन यहां मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि शुक्राणुओं की संख्या बढ़ाने की कोई एक विशेष दवा नहीं है।

उन्होंने बताया कि होम्योपैथिक उपचार से जिन मरीजों में लाभ होना पाया गया, उनका इलाज कॉन्सिट्यूशनल तरीके से किया गया। इस तरीके से उपचार के लिए हम मरीज के शारीरिक और व्यवहारिक, मन:स्थिति, उसकी आदतों, उसकी पसंद-नापसंद आदि के बारे में विस्तार से जानकर उसकी हिस्ट्री तैयार करते हैं। इसके बाद ही प्रत्येक मरीज के अनुकूल दवा का चुनाव करते हैं।

डॉ गिरीश ने बताया कि इस प्रकार कुछ मिलाकर समझा जाये तो कुछ कारणों का समाधान सर्जरी से हो सकता है, जबकि कुछ स्थितियों का इलाज होम्योपैथिक दवाओं से और कुछ का इलाज संभवत:किसी चिकित्सा पद्धति में नहीं है।