मोबाइल फोन, लैपटॉप दे रहे हैं बच्‍चों को, तो अपनी जिम्‍मेदारी भी निभायें

मनोवैज्ञानिक डॉ शाजिया ने बतायीं माता-पिता के ध्‍यान देने योग्‍य बातें

लखनऊ। 16 वर्षीय रोहन पढाई मैं बहुत अच्छा था और खेलकूद में भी उसने कई उपाधियाँ प्राप्‍त की थीं। दसवीं की परीक्षा में 90% मार्क्स लाने पर उसको एक बढ़िया एंड्रॉयड फ़ोन उपहार के रूप में मिला और उसके बड़े भाई ने उसको प्ले स्टेशन भी दिया। धीरे-धीरे उसने सारे सोशल मीडिया की साइट्स पर अपना अकाउंट खोल लिए और प्ले स्टेशन पर भी हर समय खेल खेलना शुरू कर दिया। जब घर वाले टोकते थे तब घर में चीखना-चिल्लाना और मारपीट की नौबत आ जाती थी। 6 महीने बाद, इम्तिहानों में रोहन के 40% मार्क्स आये। उसकी सेहत भी ख़राब हो गई और वह हमेशा चिडचिडा रहने लगा. उसकी नींद भी पूरी नहीं होती थी। परिवार वालों ने फिर मनोचिकित्सक और मनोविज्ञानिक की सलाह ली और आज रोहन बेहतर है।

 

यह बात मनोवैज्ञानिक डॉ शाजिया ने सेहत टाइम्‍स से एक विशेष वार्ता में कही। उन्‍होंने कहा कि यह किसी के घर में भी हो सकता है। बच्चों को मोबाइल, आईपैड, लैपटॉप देने के बाद कड़ी निगाह रखें। उनके सोशल मीडिया के साइट्स पर नियमित रूप से चेक करें। उनको दोस्तों के साथ बाहर निकलने के लिए प्रोत्साहित करें। उनको  पार्क जाना,  साइकिल  चलाना  आदि  शारीरिक व्यायामों  के लिए प्रेरित करें। अगर घर का माहौल अच्छा है और परिवार के सदस्य नियमित रूप से व्यायाम करते हैं और सोशल मीडिया पर सिर्फ ज़रूरी समय बिताते हैं तो बच्‍चों को भी अपने आपको सेहतमंद रखने की प्रेरणा मिलती है।

 

डॉ शाजिया का कहना है कि अपना समय बच्चों के साथ व्यतीत करें। वर्चुअल और रियल दुनिया का फ़र्क़ उनको बतायें। अगर आपको लगता है कि‍ बच्चे आपसे भावनात्मक रूप से थोड़ा अलग हो रहे हैं तो उनके पीछे न पड़के उनकी ज़रूरतों को समझें। यह उम्र का एक पड़ाव भी हो सकता है।  इंटरनेट की दुनिया कभी न ख़त्म होने वाली है इसलिए उसके फायदे और नुकसान दोनों बताएं। रात को सोने से पहले सारे गैजेट्स बच्चों से लें लें। बचपन से ही उनको कहानि‍यां किताबें पढ़ने की आदत डालें ताकि खाली समय में फ़ोन के बदले किताब पढ़ें। प्यार से माहौल को संभालें और अगर आपको लगता है कि‍ दिक्कत बढ़ रही है तो डॉक्टर की सलाह लें।