Friday , October 22 2021

भारत में पहली बार टिशू इंजीनियरिंग टेक्‍नोलॉजी से अधूरी आहार नली को पेट तक बढ़ाया

केजीएमयू की रिकॉर्ड सफलता के झंडों में एक और परचम लहराया

प्रो एसएन कुरील ने ‘एसोफेजियल एट्रेसिया’ दोष को पांच सर्जरी में किया ठीक

लखनऊ। किंग जॉर्ज चिकित्‍सा विश्‍व विद्यालय (केजीएमयू) ने एक बार फि‍र इतिहास रचा है। यहां के पीडियाट्रि‍क सर्जरी विभाग के विभागाध्‍यक्ष प्रो एसएन कुरील ने एसोफेजियल एट्रेसिया नामक जन्‍म दोष की सर्जरी भारत में पहली बार किये जाने का गौरव प्राप्‍त किया है। इस तरह की सर्जरी पूरे विश्‍व में सिर्फ 19 हुई हैं। इस सर्जरी में शिशु में पैदाइश से ही भोजन की नली पूरी नहीं बनी होती है। इस दोष को डॉ कुरील ने छह साल के अंदर पांच बार सर्जरी करके दूर करने में सफलता प्राप्‍त की है। डॉ कुरील ने बताया कि 10000 बच्‍चों में एक को यह पैदाइशी बीमारी होती है।

 

बुधवार को केजीएमयू में आयोजित प्रेस वार्ता में डॉ कुरील ने बताया कि 2012 में जब यह बच्‍चा मेरे पास आया तो मैंने इसे देखकर चुनौती मानते हुए इसे टिशू इंजीनियरिंग टेक्‍नोलॉजी से विकसित करने का फैसला किया। उन्‍होंने बताया कि टिशू इंजीनियरिंग टेक्‍नोलॉजी में भोजन की नली के टिशू को खींचकर थोड़ा-थोड़ा बढ़ाया जाता है। उन्‍होंने बताया कि इस सर्जरी में बहुत ज्‍यादा खतरा होता है लेकिन ईश्‍वर हमारे साथ था, और हमें सफलता मिली। उन्‍होंने बताया कि इस बीमारी में शिशु की भोजन की नली, जो कि सामान्‍य रूप से पेट तक जाती है, पेट से जुड़ी नहीं होती है। उन्‍होंने बताया कि सुल्‍तानपुर से लाये गये इस बच्‍चे की आहार नली गर्दन तक ही थी। उन्‍होंने बताया कि 2012, 2013, 2015, 2017 और अभी 6 सितम्‍बर 2018 को सर्जरी करके इसकी नली (एसोफैगस) को हर सर्जरी में थोड़ा-थोड़ा बढ़ाकर पेट तक जोड़ने में सफलता प्राप्‍त हुई।

उन्‍होंने बताया कि अब पिछले एक सप्‍ताह से बच्‍चे ने दाल-चावल, दलिया आदि खाना प्रारम्‍भ कर दिया है। उन्‍होंने बताया कि वर्ना इससे पहले बच्‍चे को दूध, जूस जैसी लिक्विड डाइट ही नली द्वारा दी जा रही थी। प्रेस वार्ता के दौरान डॉ कुरील ने बच्‍चे को चॉकलेट खिलायी और पत्रकारों को दिखाया कि अब यह अर्धठोस और ठोस खाद्य पदार्थ लेने लायक हो गया है। इस सर्जरी के खतरे के बारे में उन्‍होंने बताया कि जिन टिशूस को बढ़ाया जाता है उसकी पर्त दशमलव 25 से दशमलव 3 मिली‍मीटर मोटी होती है, इसलिए इसके इंजरी होने का खतरा रहता है। उन्‍होंने फोटो के माध्‍यम से दिखाया कि जब आहार नली को पेट के पास ले जाया गया तो एक स्थिति यह थी दिल और लिवर दोनों को बचाते हुए नली को पेट तक पहुंचाया गया। उन्‍होंने बताया कि इस तकनीक का इजाद 1994 में जापान के डॉ किमूरा ने किया था तथा इस तकनीक से विश्‍व में अब तक 19 सफल ऑपरेशन हुए हैं, जबकि भारत में यह पहला केस है। डॉ कुरील ने बताया कि इसमें आवश्‍यक यह है कि पैदा होने के बाद जल्‍दी से जल्‍दी सर्जरी होनी चाहिये क्‍योंकि बच्‍चा लार या दूध निगलने में सक्षम नहीं होता है, नतीजा यह होता है कि ट्राइकिया में लार का स्पिल्‍स निमोनिया और मृत्‍यु की संभावना पैदा कर देता है।

 

इस मौके पर बच्‍चा और उसके माता-पिता भी उपस्थित थे। कूड़ेभार, सुल्‍तानपुर के रहने वाले पिता सुनील तिवारी प्राइवेट जॉब करते हैं जबकि मां स्‍वाती तिवारी गृहिणी हैं। स्‍वाती तिवारी ने बताया कि 6 फरवरी, 2012 को रात करीब साढ़े नौ बजे सुल्‍तानपुर के प्राइवेट अस्‍पताल में बेटा नॉर्मल डिलीवरी से पैदा हुआ तो उसके बाद बच्‍चे के मुंह से लार और झाग बहुत ज्‍यादा निकल रहा था। यह देखकर बच्‍चे को लखनऊ केजीएमयू ले जाने की सलाह दी गयी। हम लोग कुछ ही घंटों के अंदर सुबह केजीएमयू आ गये थे। डॉक्‍टर कुरील ने जब उन्‍हें इसके ऑपरेशन के बारे में बताया तो उन लोगों ने हामी भर दी। यह कहते हुए इस मां के चेहरे पर खुशी झलक रही थी, वह डॉक्‍टर को बार-बार धन्‍यवाद दे रही थी। अब बच्‍चा छह साल का हो चुका है और अपर केजी में पढ़ता है।

 

डॉ कुरील ने बताया कि सर्जरी की टीम में उनके साथ डॉ अर्चिका गुप्‍ता, डॉ विपुल बोथरा, डॉ सुनील कनौजिया व डॉ अखिलेश के साथ ही ऐनेस्‍थीसिया की डॉ अनीता मलिक, डॉ जीपी सिंह और डॉ सरिता सिंह शामिल रहे जबकि नर्सिंग टीम में सिस्‍टर वंदना तथा टेक्‍नीशियन संजय का योगदान रहा।