सहारा देने वाली छड़ी को जब चाहें बना लीजिये कुर्सी

केजीएमयू के डीपीएमआर वर्कशॉप ने रिसर्च के तहत बनायी स्टिक-कम-चेयर

लखनऊ। विकलांगों के सहायतार्थ तरह-तरह के कृत्रिम अंग और उपकरण की रिसर्च करने वाले  डिपार्टमेंट ऑफ फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैबिलिटेशन डीपीएमआर के ऑर्थोटिक्स एंड प्रॉस्थोटिक वर्कशॉप ने अपने अनुसंधान कार्यक्रम के तहत एक ऐसी छड़ी बनायी है जिसे जब चाहे कुर्सी का भी रूप दिया जा सकता है। इससे उन लोगों को आराम मिलेगा जो छड़ी लेकर चलते हैं और साथ ही गठिया आदि बीमारी से ग्रस्त हैं, या फिर काफी बुजुर्ग हैं, उन्हें कहीं भी बैठने के लिए बस छड़ी में लगी सीट खोलने की जरूरत है और अगले ही पल तैयार है कुर्सी।

स्टेशन हो या मॉल कहीं भी टहलना-घूमना मुश्किल नहीं

विभाग के वर्कशॉप प्रभारी अरविन्द निगम ने बताया कि इस छड़ी को बनाने का उद्देश्य यह है कि ऐसे कई वृद्धजन या अन्य लोग जो टहलना तो चाहते हैं लेकिन उन्हें लगता है कि कुछ कदम चलने के बाद उन्हें बैठने की जरूरत महसूस होगी, इस कारण वह टहलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। यही नहीं रेलवे में रिजर्वेशन की लाइन हो, बाजार हो, मॉल हो, रेलवे या बस स्टेशन हो या अन्य कोई जगह लगातार ज्यादा खड़े होने और चलने की हिम्मत न रखने वाले लोगों के लिए यह स्टिक-कम-चेयर बहुत ही लाभदायक है।  उन्होंने बताया कि इस तरह की चेयर डिजाइन करने के बाद लखनऊ के रहने वाले एक वरिष्ठ नागरिक को दी गयी है इसके उपयोग का उनका अनुभव अच्छा रहा है।

जरूरतमंदों के लिए नायाब तोहफा

यह पूछने पर कि इस स्टिक-कम-चेयर की लागत कितनी आयी तो उन्होंने बताया कि अभी तो चूंकि यह अनुसंधान के तहत एक ही स्टिक-कम-चेयर बनायी गयी है तो इसके लिए सामान कम मात्रा में खरीदने के कारण इसकी लागत लगभग 1300 रुपये आयी है लेकिन यदि इसका निर्माण नियमित रूप से ज्यादा मात्रा में किया जायेगा तो जाहिर है कच्चा माल भी इकट्ठा ही क्रय होगा, ऐसी स्थिति में इस पर लागत लगभग 600 रुपये आने का अनुमान है। उन्होंने कहा कि विभाग के वर्कशॉप में इसके निर्मित होने का एक यह लाभ जरूर है कि अन्य अंग और उपकरण की तरह इसमें लागत ही लागत के दाम होंगे, लेबर चार्जेस और लाभ नहीं होगा। कुछ भी हो अगर इस तरह की स्टिक-कम-चेयर का नियमित उत्पादन शुरू हो गया तो निश्चित ही जरूरतमंदों के लिए यह नायाब तोहफा होगा।