लोगों पर असर तो हुआ है पटाखों और उसके प्रदूषण पर जागरूकता का

दीपावली पर इस साल अस्‍पतालों में आने वाले पटाखों से जले मरीजों व गंभीर श्‍वास रोगियों की संख्‍या कम हुई

सेहत टाइम्‍स ब्‍यूरो   

लखनऊ। दीपावली पर बढ़ते प्रदूषण के बारे में जागरूकता फैलाने का असर दिखा है, जहां लोगों ने पटाखे छुड़ाने में अपने को नियंत्रित रखा वहीं श्‍वास के मरीजों ने भी अपने स्‍वास्‍थ्‍य को लेकर अहतियात बरतते हुए अपने आपको सुरक्षित रखने के उपाय किये। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं कि न तो पटाखा दुर्घटना में गंभीर घायल होने के और न ही श्‍वास के रोगियों की पटाखों के प्रदूषण के कारण गंभीर हालत होने के मामले बड़ी संख्‍या में आये हैं, जबकि पहले के सालों में ऐसा नहीं था। इस बार पटाखों से दुर्घटना में मामूली घायल होने और श्‍वास की दिक्‍कत बढ़ने के मामले ओपीडी स्‍तर पर ही मैनेज होने वाले मामले ही सामने आये हैं।

केजीएमयू के मीडिया प्रवक्‍ता डॉ सुधीर सिंह के अनुसार केजीएमयू के ट्रॉमा सेन्टर में बर्न के 24 मरीज आये इन सभी को भर्ती करने की जरूरत नहीं थी, किसी भी रोगी की दशा गंभीर नही थी, इसलिए प्राथमिक उपचार देकर इन्‍हें घर जाने दिया गया, इसी प्रकार डॉ श्‍यामा प्रसाद मुखर्जी (सिविल) अस्‍पताल के अधीक्षक डॉ आशुतोष दुबे ने बताया कि उनके अस्‍पताल में पटाखों से जले 35 मरीज आये इनमें एक मरीज को भर्ती करना पड़ा, बाकी को प्राथामिक उपचार की आवश्‍यकता थी। आपको बता दें कि केजीएमयू का  ट्रॉमा सेन्टर ऐसा स्‍थान है जहां प्रदेश भर के गंभीर मरीजों को रेफर किया जाता है।

इसी प्रकार बात अगर पटाखे के प्रदूषण से श्‍वास रोगियों के गंभीर होने की बात करें तो वहां भी ऐसा गंभीर मरीज आने की खबर नहीं है, हां यह जरूर है कि आम दिनों की अपेक्षा पल्‍मोनरी विभाग की ओपीडी में रोज की अपेक्षा 20 से 25 फीसदी मरीज ज्‍यादा दिखाने आये। विभागाध्‍यक्ष प्रो सूर्यकांत ने बताया कि 20 से 25 प्रतिशत मरीज जो पल्‍मोनरी ओपीडी में रोज की अपेक्षा ज्‍यादा आये उनमें कई मरीज ऐसे भी थे जो अहतियातन जांच कराने आये थे कि पटाखों के प्रदूषण का उन पर कोई असर तो नहीं पड़ा। डॉ सूर्यकांत ने कहा कि यह अच्‍छा संकेत है कि लोग जागरूक हो रहे हैं।

आपको बता दें कि दीपावली पर पटाखों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं और विशेषकर श्‍वास के रोगियों को प्रदूषण से बचाने के लिए विशेषज्ञों ने सलाह दी थी, जिसका समाचारों के माध्‍यम से व्‍यापक प्रचार-प्रसार का ही यह असर है कि विशेषज्ञों का मैसेज लोगों तक पहुंचा और उससे भी बड़ी बात यह है कि लोगों द्वारा इस पर अमल करने की कोशिश की गयी। हालांकि अभी इसमें और भी जागरूकता फैलाने की आवश्‍यकता है।