वास्तव में चिकित्सक ही हैं असली कोरोना योद्धा

राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस (1 जुलाई) पर लेख डॉ अनुरुद्ध वर्मा की कलम से

डॉ अनुरुद्ध वर्मा, वरिष्‍ठ होम्‍योपैथिक चिकित्‍सक
 

विश्व में चिकित्सकों के सेवाओं का स्मरण करने एवं सम्मान प्रदर्शित करने के लिए अलग अलग देशों में विभिन्न तिथियों में चिकित्सक दिवस (डॉक्टर्स डे)  का आयोजन किया जाता है।

भारत में राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस का आयोजन 1 जुलाई  को पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री एवं प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ बिधान चंद्र राय  की स्मृति में उनके निर्वाण दिवस के अवसर पर किया जाता है। डॉ बिधान चंद्र राय का जन्म 1 जुलाई 1882 एवँ निधन 1 जुलाई 1962 को हुआ था। चिकित्सा क्षेत्र में डॉ राय के उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार द्वारा 1961 में देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया। भारत सरकार द्वारा डॉ बी सी राय की स्मृति में ही 1991 में राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस उनकी पुण्य तिथि 1 जुलाई को मनाने का निर्णय लिया गया तब से इस दिवस का लगातार आयोजन किया जाता है।

इस वर्ष डॉक्टर्ड दिवस का महत्व और अधिक बढ़ जाता है क्योंकि पूरी दुनिया कोविड 19 के संक्रमण से परेशान है और इसके बचाव एवँ उपचार में चिकित्सक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। कोरोना संक्रमण की देश में अब तक लगभग साढ़े पांच लाख लोग कोविड 19 से संक्रमित हो चुकें है तथा 16 हजार से अधिक लोग असमय मौत का शिकार हो चुके हैं और अभी संक्रमण की तेज रफ्तार जारी है।

इस वैश्विक महामारी से निपटने के लिए चिकित्सक एवं स्वास्थ्यकर्मी अपनी जान दावं पर लगा कर अपनी सेवाएं दे रहें हैं यहां तक कि उन्हें अपने परिवार से भी दूर रहना पड़ता है। इस बीमारी से निपटने के लिए अपनी सेवाएं दे रहे चिकित्सक आम लोगों की अपेक्षा 4 गुना ज्यादा संक्रमण के खतरे में रहते हैं सैकड़ों चिकित्सक ऐसे हैं जो मरीजों की सेवा करते हुए संक्रमण का शिकार हो गए और अपनी जान गंवा चुके हैं। सभी चिकित्सकों का केवल एक ही मकसद है कोरोना को हराना और जिंदगी को बचाना।

इस महामारी में चिकित्सक भगवान का रूप बनकर प्रकट हुए हैं। तमाम विपरीत परिस्थितियों में काम करते वक्त चिकित्सक शारिरिक तौर पर भी मुश्किल स्थितियों से गुजर रहे हैं क्योंकि इस दौरान उनकी जिंदगी काफी थकान भरी रहती है। पी पी ई किट पहनने एवं उतारने में ही लगभग आधा घंटा लगता है तथा यह उपकरण केवल एक बार ही प्रयोग किया जा सकता है। सबसे मुश्किल तब आती है जब शरीर में एक दम चुस्त हो जाने वाली किट के पहनने के बाद सांस लेने में भी मुश्किल होती है ,घुटन महसूस होने लगती है। स्थिति यह है कि चिकित्सक 6 घंटे की ड्यूटी के दौरान भोजन, पानी, ताजी हवा और यहां तक की वाश रूम का प्रयोग भी नहीं कर पाते हैं। आपातस्थिति के दौरान चिकित्सकों को और अधिक सतर्क रहने की जरूरत पड़ती है क्योंकि एक छोटी सी गलती भी जिंदगी के लिए भारी पड़ सकती है और जान लेवा साबित हो सकती है।

कोरोना ड्यूटी के दौरान चिकित्सकों को अनेक स्थानों पर जनता के तीव्र विरोध का भी सामना करना पड़ा है औऱ कुछ स्थानों पर उनके ऊपर जानलेवा हमला भी किया गया तथा उन्हें जान जोखिम में डालकर अपना कार्य करना पड़ा। चिकित्सकों के साथ कई जगहों पर क्‍वारंटाइन किये गए लोगों की अभद्रता एवं मारपीट की शिकायतें भी सामने आई हैं, यहां तक की पुलिस की मदद भी लेनी पड़ी। चिकित्सकों तथा चिकित्साकर्मियों के साथ मारपीट एवं हिंसा की घटनाओं को देखते हुए उसे रोकने के लिए सरकार को चिकित्सकों की हिंसा के विरुद्ध कानून बनाना पड़ा और अनेक जगहों पर पुलिस को कार्यवाही भी करनी पड़ी।

क्‍वारंटाइन एवं आइसोलेशन किये गये मरीजों के उपचार एवं देखरेख करना भी बहुत कठिन है क्योंकि इस के दौरान भी संक्रमण का खतरा लगातार बना रहता है। सबसे बड़ी परेशानी तो तब होती है जब 14 दिन की लगातार क्‍वारंटाइन एवम आइसोलेशन की ड्यूटी करने के बाद उसे 14 दिन क्‍वारंटाइन रहना पड़ता है इस अवधि में भी वह परिवार वालों से मिल नहीं पता है। उसे लगातार डर बना रहता है कि कहीं उसके परिवार के लोगों को संक्रमण न हो जाये इसलिए इन विकट परिस्थितियों में चिकित्सक को अनेक मानसिक परेशानियों से भी जूझना पड़ता है।

कोरोना ड्यूटी के दौरान उन्हें संसाधनों जैसे उपकरणों ,दवाईओं एवँ अन्य सुविधाओं के अभाव का भी सामना करना पड़ता है क्योंकि देश के अस्पतालों की दुर्दशा किसी से छि‍पी नहीं है ऐसी विपरीत स्थितियों में भी  उन्हें अपने कार्यों का पूरी निष्ठा के साथ संपादन करना पड़ता है क्योंकि चिकित्सक को हर कीमत में अपने रोगी के स्वास्थ्य की देखभाल करनी है यही उनका उद्देश्य होता है। कोरोना ड्यूटी के कारण अनेक स्थानों सामाजिक तिरस्कार का भी सामना करना पड़ता है क्योकि लोगों को डर लगता है कि कहीं इनसे वह भी संक्रमित ना हो जाएं यहां तक की उनसे किराए के मकान भी खाली कराये जाने की घटनाएं सामने आयीं हैं।

कोरोना के इस काल के दौरान सभी चिकित्सा पद्धतियों के चिकित्सक कोरोना को हराने के अभियान में कंधे से कंधा मिलाकर कार्य कर रहें हैं। कोरोना के संकट के दौरान चिकित्सकों ने जिस साहस, लगन,  मेहनत ,निष्ठा और बिना जान की परवाह किये कार्य किया है वह वास्तव में कोरोना योद्धा हैं समाज को उनके प्रति अपने नजरिये को बदलना होगा। राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस पर हम सभी को को उनका नमन करना चाहिए उनका सम्मान करना चाहिए तथा उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए क्योकि संकट की इस घड़ी में उन्होंने अपनी जान दांव पर लगा कर हमारी जान की परवाह की।