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क्रॉनिक अर्थराइटिस से ग्रस्त युवक के अत्याधुनिक विधि से एकसाथ बदले दोनों कूल्हे

-एसजीपीजीआई में डॉ कुमार केशव ने किया डायरेक्ट एंटीरियर अप्रोच का इस्तेमाल

डॉ. कुमार केशव

सेहत टाइम्स

लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान लखनऊ के ऑर्थोपेडिक्स विभाग के चिकित्सकों ने गाजीपुर के एक 20 वर्षीय मरीज के दोनों कूल्हों का एक ही बार में ‘टोटल हिप रिप्लेसमेंट’ सफलतापूर्वक किया। मरीज के दोनों कूल्हे ‘एंकिलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस’ के कारण बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे। यह एक तरह का क्रॉनिक इन्फ्लेमेटरी अर्थराइटिस (गठिया) है, जो मुख्य रूप से युवाओं में रीढ़ की हड्डी और बड़े जोड़ों को प्रभावित करता है। सर्जरी के बाद मरीज अब अपने पैरों पर पूरा वजन डाल सकता है, उसके घाव ठीक हो रहे हैं और उसकी स्थिति अस्पताल से छुट्टी देने लायक है।

संस्थान के मीडिया सेल द्वारा जारी विज्ञप्ति में यह जानकारी देते हुए बताया गया है कि मरीज को सबसे पहले एसजीपीजीआई के इम्युनोलॉजी विभाग में भेजा गया था। वहां एंकिलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस के लिए उसे ‘बायोलॉजिक’ दवाएं दी गईं, लेकिन उसका दर्द कम नहीं हुआ। जब उसे ऑर्थोपेडिक्स विभाग में भेजा गया, तो पता चला कि उसका दायां कूल्हा पूरी तरह से और बायां कूल्हा आंशिक रूप से जुड़ (fused) गया था। उसका दायां कूल्हा लगभग 40 डिग्री और बायां कूल्हा लगभग 10 डिग्री के कोण पर मुड़ी हुई स्थिति में फिक्स हो गया था, जिससे उसके लिए खड़े होना, चलना और बैठना मुश्किल हो गया था। इसलिए, दोनों कूल्हों को बदलने (रिप्लेसमेंट) की योजना बनाई गई।

इस सर्जरी का नेतृत्व ऑर्थोपेडिक्स विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. कुमार केशव ने किया। उन्होंने ‘डायरेक्ट एंटीरियर अप्रोच’ (DAA) तकनीक का इस्तेमाल करते हुए लगभग चार घंटे की एक ही सर्जरी में दोनों कूल्हों को बदल दिया (इसे ‘अनसीमेंटेड सिरेमिक-ऑन-पॉली टोटल हिप रिप्लेसमेंट’ कहा जाता है)। इस तकनीक में, मांसपेशियों को काटे बिना, उनके बीच से होते हुए कूल्हे तक पहुंचा जाता है।

ऐसे मरीजों के लिए ‘डायरेक्ट एंटीरियर अप्रोच’ (DAA) क्यों मददगार है?

आसान पोज़िशनिंग: एंकिलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस में कूल्हे अक्सर मुड़ी हुई, बाहर की ओर घूमी हुई और बाहर की तरफ फैली हुई स्थिति में फिक्स हो जाते हैं। इस वजह से मरीज को करवट दिलाना बहुत मुश्किल होता है। DAA तकनीक में मरीज को सीधे पीठ के बल लिटाया जाता है।

दोनों कूल्हों का एक साथ इलाज: दोनों पैरों को एक साथ तैयार (drape) किया जा सकता है और एक ही सर्जरी में दोनों कूल्हों का ऑपरेशन किया जा सकता है।

पैरों की लंबाई पर नियंत्रण: सर्जरी के दौरान दोनों पैरों की लंबाई की सीधे तुलना की जा सकती है, जिससे सर्जन को दोनों पैरों की लंबाई में अंतर को ठीक करने में मदद मिलती है।

तकनीकी रूप से आसान चरण: इस स्थिति में सर्जरी के मुख्य चरण, जैसे कि ‘फीमोरल नेक’ (जांघ की हड्डी का ऊपरी हिस्सा) को काटना, काफी आसान हो जाते हैं।

मांसपेशियों को सुरक्षित रखना: इसमें मांसपेशियों को काटा नहीं जाता, जिससे मरीजों को ठीक होने और जल्दी चलने-फिरने में मदद मिल सकती है।

किन्हें फायदा मिल सकता है: जिन युवा मरीजों के दोनों कूल्हों (hips) में ऐसी बीमारी है जिसके लिए रिप्लेसमेंट की जरूरत है, और जो सर्जरी कराने के लिए शारीरिक रूप से पूरी तरह फिट हैं, उनका ‘बायलैटरल हिप रिप्लेसमेंट’ (दोनों कूल्हों का एक साथ रिप्लेसमेंट) किया जा सकता है।

डॉ. केशव ने बताया, “इसमें चार चीजें सबसे महत्वपूर्ण हैं: सर्जन की विशेषज्ञता, ‘डायरेक्ट एंटीरियर अप्रोच’ जैसी कम चीर-फाड़ वाली तकनीक, सही इम्प्लांट और उन्हें सही जगह पर लगाना, और एक अच्छी एनेस्थीसिया टीम।” उन्होंने आगे कहा, “ये मरीज युवा होते हैं, और कूल्हों में जकड़न के कारण इनकी पढ़ाई, काम और रोजमर्रा की जिंदगी पर बुरा असर पड़ता है। जिन मरीजों को दोनों कूल्हों के रिप्लेसमेंट की जरूरत होती है और जिनका शरीर इस सर्जरी के लिए तैयार होता है, उनके दोनों कूल्हों का इलाज एक साथ किया जा सकता है।”

एनेस्थीसिया टीम: ‘बायलैटरल टोटल हिप रिप्लेसमेंट’ में खून का नुकसान ज्यादा हो सकता है, इसलिए ब्लड प्रेशर को बहुत सावधानी से नियंत्रित करने की जरूरत होती है। एनेस्थीसिया टीम का नेतृत्व डॉ. वंश प्रिया (एडिशनल प्रोफेसर) ने किया, जिसमें डॉ. शिप्रा सिंह (असिस्टेंट प्रोफेसर) और डॉ. दीक्षा (सीनियर रेजिडेंट) शामिल थीं। उन्होंने ‘जनरल एनेस्थीसिया’ का इस्तेमाल किया, जिससे मांसपेशियां पूरी तरह रिलैक्स हो जाती हैं और सर्जन को सटीकता से काम करने में मदद मिलती है। इसके साथ ही, दर्द से राहत के लिए ‘एपिड्यूरल एनेस्थीसिया’ का भी उपयोग किया गया। इस तरह की बड़ी सर्जरी के लिए मरीज का हीमोग्लोबिन स्तर और उनकी कुल शारीरिक फिटनेस (खासकर दिल और फेफड़ों की स्थिति) का सही होना बहुत जरूरी है।

सर्जिकल और नर्सिंग टीम: डॉ. केशव ने अपने सीनियर रेजिडेंट्स, डॉ. उत्कर्ष और डॉ. शैलेंद्र के साथ मिलकर सर्जरी की। नर्सिंग टीम में सचिन और कमलेश शामिल थे। डॉ. केशव कुछ समय से ‘डायरेक्ट एंटीरियर अप्रोच’ तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। भारत में यह तकनीक अभी भी काफी नई है, और कई मरीजों को इससे फायदा मिला है। इस तकनीक में और निपुणता हासिल करने के लिए, उन्होंने अमेरिका के फिलाडेल्फिया स्थित ‘यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिलवेनिया’ में डॉ. नील सेठ के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण लिया है।