एक अच्‍छा कार्यक्रम, जिससे फायदे के बजाय नुकसान हो गया

विचारों की यह अभिव्‍यक्ति राजधानी लखनऊ के एक बड़े सरकारी अस्‍पताल में कार्यरत अजीत मिश्र की है। कृपया लेख के अंत में लिखा गया लेखक का निवेदन जरूर पढ़ लें।

 

अगर सोच कर देखा जाए तो ,यह बहुत विचित्र लगता है कि एक बहुत ही अच्छे कार्यक्रम से देश का बहुत बड़ा नुकसान हो गया! जी हां मैं परिवार नियोजन की बात कर रहा हूं ऐसा इस लिए नहीं हुआ ,कि ये कार्यक्रम ठीक से लागू नहीं हुआ बल्कि ऐसा इसलिए हुआ कि समाज के जिन वर्गों में ये  ठीक तरह से लागू होना चाहिए था वहां ये लागू नहीं हुआ,और जहां इसकी जरूरत नहीं थी, वहां ये सफल हो गया। जो लोग शिक्षित थे और धनवान थे और जो पाँच बच्चों की भी  अच्छी तरह से परिवरिश कर सकते थे, वो तो एक बच्चा और कभी-कभी कोई बच्चा नहीं की योजना बनाने में जुट गये,और जो अशिक्षित और निर्धन एक बच्चे को भी नहीं पाल सकते थे, वो लगातार पांच या अधिक बच्चे पैदा करते रहे।  ऐसे में सामाजिक संतुलन पूरी तरह से बिगड़ गया और सब्सिडी लेने वालों की जनसंख्या का विकास टैक्स देने वालों के विकास से कई गुना बढ़ गया। समस्या जनसंख्या की कभी भी नहीं होती, समस्या तब होती है जब बढ़ने वाली जनसँख्या की गुणवत्ता निम्न बौद्धिक  स्तर की हो। आज लगभग सारे देश परिवार नियोजन से अपना हाथ खींच चुके हैं। यहाँ तक कि जनसंख्या नियंत्रण की तरफ  सबसे कड़ा कानून बनाने वाले  चीन  को  भी अपनी गलती समझ में आ चुकी है। अब वो 40 साल के नीचे अपने नागरिकों को एक बच्चा या न बच्चा पैदा करने पर सजा देने का कानून बना रहा है।

 

प्रकृति का यह अनलिखा नियम है कि अंत में वही जीव जीतेंगे जिनकी प्रजनन क्षमता ज्यादा है! इसमें जीव की बाकी उत्कृष्ट क्षमताओं से कोई फर्क नहीं पड़ता। सारी दुनिया शेर को बचाना चाहती है मगर शेर कम हो रहे हैं, सारी दुनिया चूहों को मारना चाहती है मगर चूहे बढ़ रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या एक दुधारी तलवार है जो कौम इसे ढंग से इस्तेमाल करती हैं वो पूरी दुनिया में फैल जाती हैं। मगर जो कौमें इसका महत्व नहीं समझ पाती वो अपने घर में ही खत्म होने के लिए अभिशप्त हो जाती हैं।

अजीत मिश्र

 

हर वह इंसान चाहे कितने भी मजबूर और कमजोर हालात में पैदा हुआ हो, उसके पास एक ताकत तो होती ही है, और वो ताकत होती उसकी वोट की। लोकतंत्र पूरी तरह से नंबर गेम है इसमें वही जीतेगा जिसके पास नंबर है। इसमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह नंबर राजा का है या रंक का है। सरकार को उसी रास्ते पर चलना ही पड़ेगा (चाहे वह गलत हो या सही),जहां  उसके अशिक्षित मगर संख्या में ज्यादा वोटर ले जाना चाहें। ऐसे में ये सोचना मूर्खता होगी, कि कोई भी सरकार जनसंख्या नियंत्रण के लिए कड़े कदम उठा सकती है, क्योकि उनको जिनके खिलाफ कदम उठाना है वो ही तो उनके वोट बैंक हैं। अब सोचना यह है की ऐसी हालत में क्या किया जा सकता है?

1-सरकार को सुझाव 

 

–सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बजट बढ़ा कर और अनावश्यक सब्सिडी को बंद करके,  हर धर्म वर्ग या जाति के हर बच्चे को विश्व और भारत की रोजगार की आवश्यकता के अनुसार उचित और अनिवार्य रूप से शिक्षा प्रदान करे। सरकार को शिक्षित युवाओं को दूसरे देश में रोजगार करने का प्रोत्साहन भी देना चाहिए। इससे भारत के युवा भारत का प्रभुत्व दूसरे दूसरे देशों में फैलाने में भी सक्षम हो सकेंगे (याद रखिए अमेरिका  या दूसरे विदेशी देशों का नया भारत प्रेम भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों के वोटिंग पावर की वजह से भी है।

 

2 -व्यक्तिगत सुझाव–

 

यदि आप सक्षम है तो तीन या ज्यादा, या कम से कम दो बच्चे पैदा करने की योजना बनाएं। विश्वास कीजिए यदि आप अपने बच्चों को एक बहुत अच्छा नागरिक बना सकते हैं, तो आपका यह कदम देश को मजबूत बनायेगा। सक्षम होते हुए भी जानबूझकर एकल बच्चे का परिवार बनाने का कोई बहुत औचित्य नहीं है। इसके कुछ नुकसान है जैसे- A स्वाभाविक रूप से अकेला बच्चा मां-बाप की सारी उम्मीदों और आशाओं का केंद्र होता है। मां-बाप की आकांक्षाओं और जरूरत से ज्यादा निगरानी और प्यार की वजह से कई बार ऐसे बच्चों का  विकास सामान्य रूप से नहीं हो पाता।

B–अगर आपके एक बच्चा है तो वो आपके जाने के बाद वो संसार में अकेला रह जाता है। मैंने अस्पताल में काम करते हुए महसूस किया है कि मुसीबत के वक्त  आखिर अपना खून ही काम आता है। चाहे किसी के अपने भाई-बहनों से कितना भी मनमुटाव क्यों ना हो, कष्ट में चाहे अनचाहे वहीं आकर खड़े होते हैं। ज्यादातर परिस्थितियों में, सारे दोस्त और बाकी रिश्तेदार दस पंद्रह दिनों में भाग खड़े होते हैं मगर भाई बहन ही काम आते हैं। बड़े परिवार वाले मुसीबतों का सामना ज्यादा अच्छी तरह से कर पाते हैं!

C – जीवन की अनिश्चितता को आखिर कौन समझ पाया है?  अगर ऐसे में यदि एकल संतान के साथ कोई हादसा हो जाए तो फिर परिवार का संभल पाना असंभव होता है!

 

अंत में मेरा यह कहना है कि हम अगर बढ़ती जनसंख्या को शिक्षा के माध्यम से उच्चस्तरीय और योग्य लोगों के समूह में परिवर्तित कर सकें तो हमारा देश निश्चित ही पूरे विश्व का नेतृत्व करेगा और दुनिया के सभी देश भारत की युवा टेक्नोलॉजी में पारंगत जनशक्ति के आगे घुटने टेक देंगे।

 

लेखक का निवेदन–

यह पोस्ट आम विचारों  की धारा के विपरीत है, इसलिए इसकी आलोचना बहुत ही स्वाभाविक है। कृपया जाति धर्म के चश्मे उतार कर इस पोस्ट को पढ़ें और यदि सहमत न हों तो सभ्य शब्दों में इसकी आलोचना करें।