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विश्व अर्थराइटिस दिवस : दर्द को दबाने के बजाय उसके कारण को पहचान कर स्थायी राहत जरूरी

-दीर्घकालिक ऑटोइम्यून बीमारी है रूमेटाइड अर्थराइटिस : डॉ गिरीश गुप्ता

सेहत टाइम्स

लखनऊ। रूमेटाइड अर्थराइटिस दुनिया भर में बढ़ते स्वास्थ्य बोझ से जुड़ी एक दीर्घकालिक ऑटोइम्यून बीमारी है। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज के 2021 के अनुमान के अनुसार, विश्व में करीब 1.79 करोड़ लोग इससे प्रभावित थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वर्ष 2019 में लगभग 70 प्रतिशत मरीज महिलाएं थीं। भारत में इसके प्रसार के अलग-अलग क्षेत्रीय अध्ययनों में अंतर मिला है। वर्ष 2024 में प्रकाशित एक समीक्षा के मुताबिक, भारत में उपलब्ध अध्ययनों में इसका प्रसार प्रति 1,000 आबादी पर 1.6 से 7.5 तक दर्ज किया गया। शुरुआती पहचान और प्रभावी उपचार बीमारी से होने वाले स्थायी जोड़ों के नुकसान तथा विकलांगता के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण हैं।

विश्व अर्थराइटिस दिवस के मौके पर ‘सेहत टाइम्स’ के साथ विशेष वार्ता में लखनऊ स्थित गौरांग क्लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्योपैथिक रिसर्च (जीसीसीएचआर) के संस्थापक एवं मुख्य परामर्शदाता वरिष्ठ होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ गिरीश गुप्ता ने कहा कि रूमेटाइड अर्थराइटिस में शुरुआती पहचान करना उचित होता है क्योंकि देर होने पर जोड़ों में टेढ़ापन आ सकता है।

डॉ गिरीश गुप्ता

विश्व अर्थराइटिस दिवस के मौके पर ‘सेहत टाइम्स’ के साथ विशेष वार्ता में लखनऊ स्थित गौरांग क्लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्योपैथिक रिसर्च (जीसीसीएचआर) के संस्थापक एवं मुख्य परामर्शदाता वरिष्ठ होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ गिरीश गुप्ता ने कहा कि दर्द होने पर कई मरीज लंबे समय तक दर्द निवारक दवाओं का सहारा लेते रहते हैं। इनसे अस्थायी राहत मिल सकती है, लेकिन बिना चिकित्सकीय निगरानी के इनका लंबे समय तक सेवन पेट में परेशानी, अल्सर और गुर्दों को नुकसान पहुंचाने जैसे दुष्प्रभाव पैदा कर सकता है। इसलिए दर्द को दबाने के बजाय उसके कारण की पहचान कराना और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार उपचार लेना आवश्यक है।

क्या है रूमेटाइड अर्थराइटिस

डॉ गिरीश ने बताया कि रूमेटाइड अर्थराइटिस (आरए) एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली गलती से अपने ही जोड़ों के ऊतकों पर हमला करने लगती है। इससे जोड़ों में दर्द, सूजन और अकड़न की समस्या होती है। यह बीमारी केवल वयस्कों तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों और किशोरों को भी प्रभावित कर सकती है।

पीअर रिव्यू जर्नल में प्रकाशित हुआ है डॉ गिरीश का शोध

डॉ गिरीश ने बताया कि रूमेटाइड अर्थराइटिस से संबंधित उनका शोध एशियन जर्नल ऑफ होम्योपैथी के फरवरी-अप्रैल 2014 अंक में प्रकाशित हुआ था। उनके अनुसार, नवंबर 1996 से जुलाई 2013 के बीच उपचार के लिए आए आरए फैक्टर पॉजिटिव 250 मरीजों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया था। उपचार के बाद आरए फैक्टर के स्तर में हुए बदलाव को आकलन का आधार बनाया गया। डॉ गुप्ता के मुताबिक, इन 250 मामलों में 98 मरीजों का आरए फैक्टर सामान्य स्तर पर आ गया, जबकि 72 मरीजों में इसका स्तर पहले की तुलना में कम हुआ। शेष 80 मरीजों में लाभ दर्ज नहीं किया गया।

डॉ गुप्ता ने बताया कि मरीज के उपचार की योजना बनाते समय उसकी विस्तृत हिस्ट्री और शारीरिक एवं मानसिक स्थिति को समझना महत्वपूर्ण है। होम्योपैथिक के सिद्धान्त अनुरूप इलाज रोग का नहीं रोगी का किया जाता है। समग्र रूप से शारीरिक-मानसिक लक्षणों और आदत, पसंद-नापसंद, स्वभाव आदि का इतिहास लेकर ही दवा का निर्धारण किया जाता है।