-अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (21 जून 2026) पर स्वस्थ जीवन में योग का महत्व बताता डॉ सूर्यकान्त का विशेष लेख

योग में भगवान शिव को आदि योगी और आदि गुरु की संज्ञा दी गई है क्योंकि भगवान शिव ही योग विज्ञान के प्रथम गुरु हैं। उन्होंने योग की सबसे पहली शिक्षा अपनी पत्नी देवी पार्वती को दी, तत्पश्चात लोगों की भलाई के लिए यह योग ज्ञान प्राचीन ऋषियों को दिया, जिन्होंने इस ज्ञान को आगे बढ़ाया। महर्षि हिरण्यगर्भ उन ऋषियों में से एक हैं, जिन्हें योग परंपरा का मूल प्रवर्तक माना जाता है।
योग शब्द संस्कृत की ‘युज’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है – बाँधना, युक्त करना, जोड़ना, ध्यान को नियंत्रित या केंद्रित करना। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित भगवद्गीता के छठे अध्याय में, जो कि योगदर्शन का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण है, श्रीकृष्ण अर्जुन को योग का अर्थ वेदना और दुःख से मुक्ति बताते हैं –
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप्य इति मे मतिः।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥
अर्थात् जिस व्यक्ति का मन नियंत्रित नहीं होता, उसके लिए योग और आत्मिक उन्नति प्राप्त करना कठिन होता है, लेकिन जो व्यक्ति अपने मन को काबू में रखकर नियमित रूप से अभ्यास करता है, वह योग में सफलता प्राप्त कर लेता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन में सफलता और आध्यात्मिक प्रगति के लिए आत्मसंयम, नियमित अभ्यास और दृढ़ संकल्प बहुत आवश्यक हैं।
सम्पूर्ण भगवद्गीता में समाहित हैं योगतत्त्व
भगवद्गीता कर्म योग पर भी आधारित है, जिसके अनुसार – ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ अर्थात् मनुष्य को अपने प्रत्येक कार्य को पूरी लगन, दक्षता, ईमानदारी और एकाग्रता के साथ करना चाहिए। बिना फल की चिंता किए श्रेष्ठ ढंग से कर्म करना ही योग कहलाता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि कार्य में उत्कृष्टता, संतुलन और समर्पण ही सच्चा योग है। सम्पूर्ण भगवद्गीता में योगतत्त्व समाहित हैं।
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को ही क्यों
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों से 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव स्वीकार किया। इस प्रस्ताव को 177 देशों का समर्थन मिला, जो संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है। 21 जून उत्तरी गोलार्ध का सबसे लंबा दिन होता है। भारतीय संस्कृति और योग परंपरा में इस दिन का विशेष महत्व है। माना जाता है कि यह दिन स्वास्थ्य, आत्म-विकास और आध्यात्मिक उन्नति के लिए शुभ होता है। इस निर्णय से भारत की प्राचीन योग परंपरा को वैश्विक पहचान मिली। यह केवल भारतीय संस्कृति की स्वीकृति का प्रतीक नहीं बना, बल्कि योग को एक वैश्विक स्वास्थ्य आंदोलन के रूप में स्थापित करने में भी सहायक सिद्ध हुआ। वर्ष 2026 में 12वाँ अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस “स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योग” विषय के साथ मनाया जा रहा है। यह थीम यह संदेश देती है कि बढ़ती उम्र में भी योग के माध्यम से व्यक्ति स्वस्थ, ऊर्जावान और सकारात्मक जीवन जी सकता है।
भारत में 41 फीसदी से ज्यादा लोग करते हैं योग
भारत में 1990 से पहले तक योग मुख्य रूप से आश्रमों, योग संस्थानों और पारंपरिक गुरुओं तक ही सीमित था। उस समय योग का अभ्यास समाज के एक अपेक्षाकृत छोटे वर्ग द्वारा किया जाता था। 1990 से 2014 के बीच टेलीविजन कार्यक्रमों, योग शिविरों और विभिन्न योग गुरुओं के प्रयासों से योग की लोकप्रियता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई तथा यह आम लोगों तक पहुँचने लगा। विश्व में जहाँ वर्ष 2008 में लगभग डेढ़ करोड़ लोग योग करते थे, वही इसके बाद 21 जून 2015 को पहले अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के आयोजन में लगभग 85 लाख लोगों ने भाग लिया, जिससे योग को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली। लेकिन 2016 में यह संख्या बढ़कर 3.67 करोड़ पर पहुंच गई थी और वर्तमान में यह 10 करोड़ के आस-पास है। इसके बाद योग के प्रति लोगों का रुझान लगातार बढ़ता गया और 2019 तक लगभग 9 करोड़ लोगों तक इसकी पहुँच और प्रभाव दर्ज किया गया। 2022 में यह संख्या बढ़कर लगभग 22.13 करोड़ लोगों तक पहुँच गई। हाल ही में 2025 में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में लगभग 41 प्रतिशत लोगों ने योग को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बताया। यह दर्शाता है कि योग अब केवल एक पारंपरिक साधना नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण अंग बन चुका है।
योग अब कारोबार भी
योग अब स्वस्थ रहने के प्रभावी उपाय के साथ-साथ कारोबार भी है। ब्रिटेन में पहला योग स्कूल भारत में ब्रिटिश राज के एक अधिकारी रह चुके सर पास ड्युक्स ने 1949 में एपिंग में खोला था। विश्व की श्रेष्ठ नौकरियों की सूची में योग शिक्षक-प्रशिक्षक भी शामिल हैं। आज तमाम देशों में योग प्रशिक्षकों के लिए नौकरी के मौके बढ़ रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में योग सीखने वालों की संख्या करीब 25 करोड़ है। अमेरिका में एक अनुभवी योग टीचर की औसतन सालाना कमाई 42 हजार डालर से अधिक होती है। भारत में योग का बाजार 490 अरब रुपये का हो चुका है। एक शोध के अनुसार यह जल्द ही 875 अरब डालर तक पहुंच सकता है। विश्व में योग परिधानों का बाजार करीब 31.1 अरब डालर का और योग मैट का कारोबार 13 अरब डालर का है। योग में वेलनेस टूरिज्म, योग रिट्रीट आदि को 915 अरब डालर का कारोबार है। इसके अलावा योग को लेकर दुनिया भर में तरह-तरह के एप विकसित कर लिए गए हैं, जिनसे अच्छी कमाई हो रही है। योग की बढ़ती लोकप्रियता से प्रभावित होकर संस्कृत और हिंदी सीखने वालों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। कुल मिलाकर योग स्वास्थ्य के साथ-साथ पूंजी निर्माण का भी साधन बन चुका है।
रेस्पिरेट्री मेडिसिन विभाग, केजीएमयू में योग पर हुए हैं 25 शोध
1990 के प्रारंभ में पश्चिमी देशों में हुए वैज्ञानिक शोधों से यह निकलकर आया था कि आधुनिक जीवनशैली के कारण होने वाली अनेक बीमारियों के प्रभावी उपचार में योग अचूक है। इसलिए 1990 से पहले लेखक ने योग से होने वाले स्वास्थ्य लाभों को देखते हुए रोगियों के हित पर अस्थमा से पीड़ित रोगियों हेतु योग से होने वाले लाभों पर शोध किया। साथ ही लेखक द्वारा योग के क्षेत्र में किए गए अन्य कार्यों योग व नेचुरोपैथी के क्षेत्र में रेस्पिरेट्री मेडिसिन विभाग, केजीएमयू लखनऊ अग्रणी भूमिका निभा रहा है। विभाग में अब तक योग से संबंधित विभिन्न शोध कार्य हो चुके हैं व 25 शोध पत्र राष्ट्रीय वह अंतरराष्ट्रीय जनरल में प्रकाशित हो चुके हैं। लेखक के दिशा निर्देशन में जो अनुसंधान कार्य किया गया, वह विश्व का अद्वितीय अनुसंधान कार्य था। इस शोध को प्रख्यात अवार्ड चार्ल्स रिके प्राइज़ भी इंडियन कॉलेज ऑफ़ एलर्जी अस्थमा एंड इम्यूनोलॉजी द्वारा प्रदान किया जा चुका है। वर्तमान में विभाग में जलनेति पर अनुसंधान कार्य किया जा रहा है, जो इंडियन कौंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च द्वारा अनुदानित है। अब तक हजारों रोगी इसका लाभ उठा चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नई शिक्षा नीति की तीसरी वर्षगांठ के अवसर पर विमोचित 100 हिंदी पुस्तकों में डॉ. सूर्यकान्त की दो पुस्तकें शामिल थीं, जिनमें से एक पुस्तक योग पर लिखी गई है।
तीन रूपों में सहायक है योग चिकित्सा
आधुनिक जीवनशैली ने जहाँ हमें आराम प्रदान किया है, वहीं अनेक बीमारियाँ भी दी हैं। आधुनिक युग में मानव जीवन दुःख व तनाव से परिपूर्ण है, अतः किसी भी व्यक्ति को पूर्णतः स्वस्थ कहना अत्यंत कठिन है। मोटापा, अनिद्रा, कब्ज, चिंता, उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन) और श्वसन संबंधी रोग आज के समय में प्रमुख बीमारियाँ बन चुकी हैं। भारतीय परिप्रेक्ष्य में जो बीमारियाँ सामान्यतः 40-45 वर्ष की आयु के बाद होती थीं, वे अब 25-30 वर्ष की उम्र में ही देखी जा रही हैं। एक अध्ययन के अनुसार देश में लगभग 12 करोड़ लोग उच्च रक्तचाप, 10 करोड़ मधुमेह (डायबिटीज), 10 करोड़ लोग सांस की बीमारी से ग्रसित हैं। कुछ लोग तो एक साथ अनेक बीमारियों से ग्रस्त हैं। इसका मूल कारण है – प्रकृति से दूरी। योग जीवनशैली में सुधार लाने का एकमात्र साधन है, जिससे सभी प्रकार की व्याधियों से मुक्ति मिलती है और व्यक्ति स्वस्थ रहता है। आसन, प्राणायाम, ध्यान और अन्य शुद्धिकरण क्रियाएं शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त बनाती हैं और रोगों से लड़ने में शरीर को सक्षम करती हैं। योग चिकित्सा तीन रूपों में सहायक है – प्रमोटिव, प्रिवेन्टिव और क्यूरेटिव। योग इन तीनों में समान रूप से समन्वय बनाता है।
सह चिकित्सा के रूप में अहम भूमिका
कई शोधों से यह निष्कर्ष निकल चुका है कि यदि योग को सह-चिकित्सा के रूप में आधुनिक चिकित्सा पद्धति के साथ सम्मिलित कर लिया जाए, तो कई रोगों पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। इससे व्यक्ति की जीवन गुणवत्ता में सुधार होता है और वह अपने कार्यों को सुचारु रूप से करने में सक्षम होता है। यदि योग को जीवनशैली का एक अंग बना लिया जाए तो व्यक्ति काफी हद तक रोगमुक्त रह सकता है और एक स्वस्थ शरीर व स्वस्थ भारत की परिकल्पना साकार हो सकती है।
(डॉ.सूर्यकान्त केजीएमयू लखनऊ में रेस्पिरेटरी मेडिसिन के विभागाध्यक्ष हैं)

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