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दहेज मृत्यु : जब पितृसत्ता विवाह को आघात में बदल देती है

– सुलगता सवाल- ‘उसे सहने के लिए मजबूर क्यों किया गया’?

-ज्वलंत मुद्दे पर क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट सावनी गुप्ता का लेख

क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट सावनी गुप्ता

हाल के समाचारों में भारत के विभिन्न हिस्सों से एक चिंताजनक पैटर्न सामने आ रहा है—युवा नवविवाहित महिलाओं को लगातार दहेज उत्पीड़न, शारीरिक हिंसा और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है, जो अक्सर आत्महत्या या संदिग्ध मृत्यु में बदल जाता है।

हाल ही में दिल्ली के एक मामले में, एक महिला ने अपनी मृत्यु से कुछ क्षण पहले फोन पर कहा—
“मुझे बचाओ, ये मुझे मार रहे हैं”,
जबकि वह वर्षों से दहेज के लिए हो रहे अत्याचार का सामना कर रही थी।
दिल्ली, नोएडा से लेकर नागपुर तक के कई मामलों में एक समानता दिखाई देती है—लगातार दबाव, हिंसा और भावनात्मक टूटन, जो दहेज की अपेक्षाओं से जुड़ी होती है।

दहेज हिंसा के पीछे का मनोविज्ञान

क्लिनिकल मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से, दहेज से जुड़ी मौतें अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि यह एक पितृसत्तात्मक व्यवस्था के भीतर लंबे समय तक चले मनोवैज्ञानिक आघात का परिणाम हैं।

1. पितृसत्तात्मक सोच और वस्तुकरण (Objectification)

कई परिवारों में महिलाओं को अवचेतन रूप से “आर्थिक लेन-देन” के रूप में देखा जाता है, न कि एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में।

मनोवैज्ञानिक प्रभाव:

अमानवीकरण (Dehumanization)
सहानुभूति की कमी
नैतिक अलगाव (Moral disengagement)

2. दुर्व्यवहार का चक्र (Trauma Bonding)

दहेज उत्पीड़न अक्सर एक चक्र में चलता है:
तनाव → हिंसा → माफी → अस्थायी शांति → फिर से हिंसा
पीड़िता अक्सर इन कारणों से संबंध में बनी रहती हैं:
बदलाव की उम्मीद
भावनात्मक निर्भरता
सामाजिक बदनामी का डर

यह स्थिति ट्रॉमा बॉन्डिंग पैदा करती है, जिससे बाहर निकलना और कठिन हो जाता है।

3. सीखी हुई लाचारी (Learned Helplessness)

लगातार अत्याचार और कोई रास्ता न दिखने पर पीड़ित के मन में यह भाव आने लगता है:
“कुछ भी बदलने वाला नहीं है”
“मेरे पास कोई नियंत्रण नहीं है”
यह स्थिति अवसाद और आत्मघाती विचारों से गहराई से जुड़ी होती है।

4. परिवार और समाज की भूमिका

एक महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर नजरअंदाज किया जाने वाला पहलू:
कई बार परिवार ही महिलाओं को “समझौता करने” की सलाह देते हैं।
इसका प्रभाव:
आत्म-दोष (Internalized guilt)
शर्म
भावनाओं का दमन

5. लगातार तनाव और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

लगातार अपमान, धमकी और हिंसा के कारण:
मेजर डिप्रेसिव डिसऑर्डर
एंग्जायटी डिसऑर्डर
PTSD जैसे लक्षण
समय के साथ, आत्महत्या पीड़ित के लिए असहनीय मानसिक पीड़ा से बचने का एकमात्र रास्ता लगने लगती है—यह “चुनाव” नहीं, बल्कि मजबूरी होती है।

यह समस्या अभी भी क्यों बनी हुई है?

कानून होने के बावजूद, भारत में हर साल हजारों दहेज मृत्यु के मामले सामने आते हैं।

इसके पीछे कारण हैं:

पितृसत्तात्मक सोच का सामान्यीकरण
सामाजिक चुप्पी जो अपराधियों को बचाती है
मानसिक उत्पीड़न को कम आंकना
क्लिनिकल संदेश (Awareness Takeaway)
दहेज मृत्यु केवल सामाजिक अपराध नहीं हैं—ये मनोवैज्ञानिक त्रासदी हैं, जिनकी जड़ें हैं:
शक्ति असंतुलन
भावनात्मक शोषण
सामाजिक और सांस्कृतिक conditioning
समय पर मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेप, जागरूकता और सशक्तिकरण बेहद आवश्यक हैं।

अंतिम विचार
जब किसी महिला की दहेज के कारण मृत्यु होती है, तो वह अचानक नहीं होती—यह अक्सर लंबे समय तक चले अदृश्य दर्द का अंतिम चरण होती है।

हमें अपना दृष्टिकोण बदलना होगा:
“वह क्यों नहीं चली गई?” की जगह “उसे सहने के लिए मजबूर क्यों किया गया?”

(लेखिका सावनी गुप्ता एक रजिस्टर्ड क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट हैं तथा अलीगंज, लखनऊ में मानसिक स्वास्थ्य केन्द्र फेदर्स की संचालिका हैं)